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व्यंग्य: आम आदमी की हालत

देश का सबसे खास आम आदमी सबसे आम है उसकी हालत सबसे अधिक दयनीय है और उसकी गाढ़ी कमाई को लूटने वाले हर तरह के सुख भोग रहें हैं खूब साधन संपन्न है और आम आदमी उन्हे ठगा सा देखता रहता है इसके अलावा वो कुछ नहीं कर पाता।
आम आदमी को बड़े अफसर से बहस करने का अघोषित रूप से अधिकार नहीं है। इसके बाद भी अगर वो बहस करता है उसे बचाने वाला कोई नहीं उसका बुरा अंजाम उसे ही भोगना है। आम आदमी रिश्वत जरूर दे सकता है ये अधिकार तो उसे अघोषित रूप से मिला है उसके सारे काम रिश्वत के सहारे ही होते हैं रिश्वत देने के अधिकार के कारण ही वो ठीक से रह पा रहा है और जी रहा है। हमसे एक बहुत बड़े अधिकारी ने कहा था ये देश वी आई पी लोगों के लिए है हम लोग भी दिन रात उन्हीं की सेवा में लगे रहते है देश के नब्बे प्रतिशत संसाधनों सुख सुविधाओं पर उनका कब्जा है वो कुछ भी नहीं करते फिर भी उनका समय बहुत कीमती है उन्हें कहीं घण्टों लाइन में खड़े नही रहना पड़ता है हर जगह उनकी आव भगत होती है। 
एक वी आई पी जानबूझ के आम लोगों के पास आ गए और उनसे बातें करने लगे सब कुछ ठीक चल रहा था तभी एक आम आदमी ने भूल से उनसे ऐसी बात कह दी जो उन्हें बुरी लगी इसका नतीजा हुआ कि हजार से अधिक आम आदमियों की जमकर कुटाई हो गई कुछ गंभीर रूप से घायल होकर अस्पताल में भर्ती हो गए दो आम आदमी भगदड़ में दबकर मर गए। इसका दोषी वी आई पी साहब को नहीं ठहराया गया । जो मरे थे उनके परिजने मुआवजे के लिए चक्कर लग लगाकर थक गए हैं। वे नहीं जानते की इसके लिए उन्हें ओर कितने चक्कर लगाने होंगे। एक जगह सभा थी जिसमें हजारों की संख्या में आम आदमी जमा थे । बेचारे चुपचाप वी आई पी का झूठा और लुभावना भाषण सुन रहे थे उनका कोई कसूर नहीं था तभी वी आई पी जी के विरोधी जो कि खुद एक वी आई पी थे उन्होंने अपने समर्थकों के साथ उनके खिलाफ नारेबाजी कर दी उनका तो कुछ नहीं बिगड़ा आम आदमियों पर लाठी चार्ज हो गया इससे बचने के लिए आम आदमी घबराकर इधर उधर भागे पास में हो रेल की पटरी थी कुछ आम आदमी घबराकर उस पर चले गए तभी एक तेज रफ्तार ट्रेन आई जो पंद्रह से अधिक आम आदमियों का प्राणांत कर गुजर गई दोनों प्रकार के वी आई पी यों का बाल तक बाँका नहीं हुआ।
    आम आदमी मरता है तो मरे वी आई पि यों को खरोंच तक नहीं आना चाहिए। आम आदमी का सच्चा हिमायती कोई नहीं होता उनका हिमायती बनकर कौन खतरा मौल ले अरबों खरबों रुपये का कारोबार जिनके दम पर हो रहा हो जो देश की अर्थ व्यवस्था के आधार स्तंभ हैं वे आम आदमी बेबस दुखी लाचार हैं जिन्हें जीने के लिए कठोर संघर्ष करना पड़ रहा है। उनके लिए कुछ भी आसान नहीं है।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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