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व्यंग्य: वरिषूठता के बदलते हुए मापदण्ड

मतलबी लोगों से भरे हुए इस दौर में नैतिकता ईमानदारी सच्चाई योग्यता को ताक पर रख दिया गया है। इसका स्थान झूठ छल कपट चापलूसी चालाकी चोरी और सीना जोरी ने ली है यह जितने भी अवगुण हैं ये सफलता प्राप्त करने की खूबी बन गए हैं इन्हें पोषण देने वाले उस बिच्छू माँ की तरह है जो जिनको अपनी पीठ पर लादकर चलती है वे उसको ही मार कर खा जाते हैं तभी तो उनका दंश सबसे ज्यादा पीड़ा दायी होता है। जो बिच्छू माँ मारी जाती है उसने भी अपने बचपन में अपनी माँ को खाया था। 
शहर के एक वास्तविक वरिष्ठ कवि थे रोशन जी वे सीधे सरल साधारण हैसियत के अच्छे इंसान थे उनकी टेलर की छोटी सी दुकान थी। बहुत अच्छे गीत और ग़ज़ल लिखते थे। पर वो किसी अकादमी के कर्ता धर्ता नहीं थे कोई बड़ा पद उनके पास नहीं था न कोई राजनैतिक बैक ग्राउण्ड था न उन्हें किसी की चापलूसी करना आती थी वे चालीस साल से गीत ग़ज़ल लिख रहे थे । पर मतलबी लोग उन्हें अब भी जुनियर ही मानते थे जबकि वे आम लोगों के चहेते थे। जो उन्हें कोई लाभ तो दे नहीं सकते थे न उनको कभी रेडियो पर बुलवाया गया न दूरदर्शन पर न कवि सम्मेलनों में उनके गीत ग़ज़लों को चुरा चुराकर पढ़ने वाले पूरी दुनिया में छा गए खूब पैसा कमा लिया पर रोशन जी की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया। न उन्हें कभी कोई सम्मान प्राप्त हो सका । एक बार वे अपने पुराने गीत का पाठ कर रहे थे एक आधुनिक वरिष्ठ कवि ने उन पर ही कविता चोरी का आरोप लगा दिया क्योंकि उनका गीत शहर के एक चलते पुर्जे वरिष्ठ कवि पिछले तीस सालों से कवि सम्मेलन के मंचो पर पढ़कर खूब वाह वाही और धन लूट रहे थे । पता चला कि उनके बीस गीत और दस ग़ज़ले चुराकर वे चालू कवि दुनिया भर में चर्चित हो रहे थे रोशन जी अपनी सफाई में कुछ कहते भी तो कोई मानने को तैयार नहीं था। वो कवि बेशर्मी पर उतारू होकर उनकी रचना को अपनी रचना बताकर उन्हें जलील करने लगा। तबसे रोशन जी ने कवि गोष्ठियों में ही जाना बंद कर दिया था लेकिन लिखना बंद नहीं किया था उनकी कविता को पसंद करने वाले आम आदमी उनसे कविता सुन लेते थे और रोशन जी उसी में खुश हो जाते थे।  
कभी कभी लगता है इतना खोटा समय पहले कभी नहीं आया जितना अब आया है व्याख्या करने से क्या होगा समझदार को तो एक इशारा ही काफी होता है।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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