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रिश्वत के सुख में छिपे दुख (व्यंग्य)

जिस तरह साहूकार को मूल से ब्याज अधिक प्यारा होता है उसी तरह रिश्वतखोर को वेतन से अधिक रिश्वत प्यारी होती है। क्योंकि वेतन तो महीने में एक दिन मिलता है और रिश्वत तो रोज मिला करती है। इसलिए जो कामाऊ विभागों के कर्मचरारी हैं और अगर वे कुँवारे हैं तो उनके यहाँ बेटी का रिश्ता करने के इच्छुक लोगों की भीड़ लगी रहती है। वो लड़की अपने आपको खुशकिस्मत समझती है जिसे कमाऊ विभाग में काम करने वाला पति मिलता है। पति तो ऑफिस के काम में डूबा रहेगा उसकी कमाई पर आखिर उसे ही तो मौज करनी है।
ये रिश्वतखोर लोग जब तक रिश्वत में अच्छे खासे रुपये न ले लें तब तक इन्हें चैन नहीं पड़ता। इनके घर के खर्च भी अनाप शनाप होते हैं। रिश्वत लेते समय इनका यही कहना होता है कि रिश्वत नहीं लेंगे तो वे अपने परिवार का भरण पोषण कैसे करेंगे। एक तरफ तो लोग दस हजार रुपये महीने की कमाई में अपना परिवार पाल रहे हैं और इन्हें दो लाख रुपये महीना वेतन मिल रहा है फिर भी बिना रिश्वत का इनका परिवार की भूख से मरने की संभावन इन्हें नजर आती है। आखिर ऐसा ये क्या खाते हैं जो इन्हें इतने सारे रुपयों की आवश्यकता पड़ती है।
एक कमाऊ विभाग के रमेश बाबू कह रहे थे मैं चौबीस घंटे में सिर्फ एक बार खाना खाता हूँ वो भी रात के ग्यारह बजे फिर भी मेरा मोटापा कम नहीं हो रहा, सुबह सिर्फ चाय पी के आता हूँ। तभी एक दूसरा व्यक्ति बोला ये दिन भर पच्चीस से तीस चाय मुफ्त की पीते हैं, फिर गाजर का हलवा, भाजी बड़े, कचौड़ी, समोसों, रबड़ी रह मलाई का दिन भर ये मुफ्त में सेवन करते हैं। रात में ग्यारह बजे तो ये सिर्फ दो रोटी ही खाते हैं। शाम को जब घर जाते हैं तो रिश्वत के रुपयों से इनकी हर जेब ठसाठस भरी रहती है।एक कमाऊ विभाग के प्रथम श्रेणी अधिकारी के पद से रिटायर हुए अधिकारी की दशा का उदाहरण देकर इसे अच्छे से समझा जा सकता है। वो जब नौकरी पर थे तब उनका वेतन तो सवा तीन लाख रुपया था पर रिश्वत की कमाई उन्हें तीस लाख रुपये हर महीने होती थी। जिसे उनकी पत्नी, बेटी और बेटा बेरहमी से खर्च कर उड़ा देते थे। वे भी इस बात पर ध्यान नहीं देते थे। लड़का जर्मनी पढ़ने गया तो वहीं का होकर रह गया। उसने वहीं शादी भी कर ली। बेटी की शादी एन आर आई से हुई वो भी अमरिका में बस गई। वे रिटायर हो गए उनकी पैंशन बनी एक लाख सत्तर हजार रुपये महीना। यह रकम दोनों पति पत्नी के लिए बहुत थी। मगर उनकी पत्नी और वे इस स्थिति के लिए तैयार नहीं थे। पत्नी का साथ उनकी सखी सहेलियों ने छोड़ दिया था। वे भी गुमसुम होकर अकेले बड़े से घर में रह रहे थे। उनमें अभी भी अकड़ भरी हुई थी। कोई नौकर उनके यहाँ नहीं टिकता था। उनकी पेंशन हुई तो बेटे बेटी ने भी उनसे रिश्ता तोड़ दिया था। पत्नी ज्यादा दिन जीवित नहीं रही और एक दिन चल बसी। अब वे इतने बड़े घर में अकेले थे। एक नौकर था जो उनकी डाँट फटकार सुनकर भी उनकी सेवा कर रहा था। वो भी पंद्रह दिन की छुट्टी लेकर चला गया। अचानक उनकी तबियत खराब हुई वे चक्कर खाकर गिर पड़े और बेहोश हो गए। बेहोशी की हालत में ही उनका निधन हो गया। पाँच दिन बाद जब उनकी कोठी से दुर्गंध आई तब लोगों को पता चला कि वे तो पाँच दिन पूर्व ही चल बसे थे। उनके अंतिम संस्कार में न बेटा आया न बेटी आई। नगर निगम ने उनका अंतिम संस्कार लावारिस की तरह किया। बेटा उनके मरने के दो महीने बाद आया तथा उनकी पूरी जमीन जायदाद बेचकर तथा रकम लेकर चला गया। इस तरह उनकी कहानी खत्म हो गई। वे अपने साथ पापों का पहाड़ लेकर गए थे। आगे उनका अंजाम क्या हुआ होगा ये कोई कैसे जानेगा।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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