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व्यंग्य: नौकरी के माया जाल में फँसे

जो बड़े लोग खुशामद पसंद होते हैं उनमेंसे आधिकाँश अहंकारी होते हैं खुशामदी लोग इनकी खुशामद करके खुश कर लेते हैं खुश करने के बाद वे इनकी कृपा पाकर जो पद हथिया लेते हैं उससे दूसरो पर रौब गाँठकर बड़े खुश होते हैं ये खुशामदी लोग कई बार योग्य लोगों के हक पर भी डाका डाल देते हैं। 
प्रायः स्वाभिमानी लोग खुशामद नहीं करते न ही खुशाभद कराना पसंद करत हैं ऐसे लोग हर हाल में जीना सीख जाते हैं उन को ये खुशामदी लोग अपने से कम करके आँकते हैं।जितना बड़ासाहब होगा उसके खुशामदी उतते ही ज्यादा होंगे ये साहब की खुशामद तो करेंगी साहब के कुत्ते तक ची खुशामद करने में इन्हें कोई परहेज नहीं रहता ।
ऐसे ही एक खुशामदी टाइप के व्यक्ति थे चतर सिंह वे शिक्षा विभाग में नौकरी करते थे विभाग के जिलाधिकारी खुशामद पसंद थे उनकी खूब खुशामद कर के चतर सिंह ने योग प्रशिक्षण में अपना नाम का आदेश निकलवा कर पहले प्रशिक्षण प्राप्त किया उसमें भी उनकी खुशामद करने की कला काम आई वे सफलता पूर्वक प्रशिक्षण प्राप्त करके आ गए अब साहब की कृपा से इन्होंने जिला योग प्रशिक्षक का पद हथिया लिया और अपनी पोस्टिंग जिला कार्यालय में करा ली चतर सिंह को योग का ठीक ज्ञान नहीं था फिर भी वो जिला योग प्रशिक्षक थे जो ठीक से योग कना जानते थे आलोक जी वे सिर्फ स्कूल तीक सीमित रह गए थे। चतर सिंह क्या करते बाजार से देशी घी खरीदकर साहब को यह कहकर भेंट कर देते कि यह उनके गाँव का घी है। बाजार से सब्जी खरीदकर उन्हें अपने खेत की बताकर साहब को भेंट करते रहते थे। साहब उन से हमेशा खुश रहते थे उनका लाभ उठाकर चतर?सिंह मजे कर रहे थे आज लोग चतर सिंह बडे साहब को दूसरो से रिश्वत वसूल कर भी देने लगे थे। इसमें खुद का हिस्सा भी चतरसिंह निकाल लेते थे।आज के दौर में खुशामदियों की संख्या खूब बढ़ गई आजकल ऐसे लोग ही पद और अधिकार हासिल कर अपने आपको बड़ा समझने लगे है । नए साहब के आने के बाद ये अपनी निष्ठा बदलकर नए साहब को भी खुश करने में सफल होकर अपने पद पर जमें रहते हैं।साहब आते जाते रहते हैं पर इन्हें कोई अपने पद से नहीं 
हटा पाता है।



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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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