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व्यंग्य: प्रेम से बुलाकर अपमानित करने वाले

कुछ कुटिल प्रवृत्ति के लोग यदि किसी से खुन्नस खाए हुए हों तो वे उसके अपमान का एक भी अवसर नहीं खोते। इनकी सारी कोशिशें उसे अपमानित करने के लिए होती हैं ये लोग खुलकर दुश्मनी नहीं करते बल्कि आपके हितैषी होने का दिखावा करते। हैं ये लोग इतना मीठा बोलते हैं कि सुनने वाला मोहित होकर इनके बिछाए जाल में फँस जाता है। जब वो जाल में फँस जाता है तो ये उसे तड़फता देखकर मन ही मन खुश होते हैं। ये दोहन करने में तो माहिर होते हैं पर दाना पानी कभी नहीं देते। दोहन करने के बाद ये दंड से प्रहार कर भगाने में जरा भी देर नहीं करते।
ऐसे लोग जब किसी से अत्यंत मीठे लहजे में बात कर रहे हैं तो समझ लेना कि उससे इनका कोई बहुत बड़ा मतलब हल होने वाला है । जिससे इनका काम नहीं होता उसकी तरफ देखना भी पसंद नहीं करते न ही उसके अभिवादन का कोई उत्तर देते। ऐसे ही शहर में एक व्यक्ति थे फतेह सिंह वो बहुत घटिया इंसान थे । लेकिन बड़े जुगाड़ू और चलते पुर्जे टाइप के थे। एक बार उनकी एक कार्यक्रम में खूब किरकिरी हुई। उन्हें उनके एक परिचित धनलाल पर शक हो गया वो यह समझ कि धनलाल की वज्ह से उनकी किरकिरी हुई है। जबकि इसमें धनलाल का कोई दोष नहीं था पर वे यह मानने को तैयार ही नहीं थे। धनलाल उनकी फितरत को अच्छी तरह जानते थे कि फतेह सिंह कसर निकाले बिना मानेंगे नहीं । ये सोचकर उन्होंने खुद को इस के लिए तैयार कर लिया था। इसके कुछ दिन बाद फतेह सिंह ने एक कार्यक्रम आयोजित किया उसमें धनलाल को विशेष रूप से बुलाया गया। वे जाना नहीं चाहते थे पर उनसे फतेह सिंह ने खूब मीठी बातें कही है ये तक कह दिया कि आयोजन कि शान तो आप ही रहेंगे धनलाल सब समझ रहे थे। और फिर जब धनलाल ने हाँ कर दी तो फतेह सिंह के चेहरे की खुशी और आँखों में कुटिलता देखने लायक थी। पर धनलाल भी कम नहीं थे उन्होंने वो चाल चली की फतेहसिंह की हर चाल उल्टी पड़ गई जलील धन लाल को करना चाहते थे और खुद जलील होकर रह गए थे। धनलाल ने जब चार पाँच बार ऐसा किया तब पस्त होकर उन्होंने धनलाल का पीछा छोड़ा। फतेह सिंह जैसे लोगों को दूसरों को अपमानित करने में बहुत मज़ा आता है। जो इनकी आदत जानते हैं वे कभी इनके घेरे में नहीं आते।



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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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