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व्यंग्य: रिश्तों पर हावी होता हुआ स्वार्थ

आज के इस दौर में कुछ लोग स्वार्थ में अंधें होकर इतने गिर गए हैं कि सगे रिशते वालों को भी वे अपने जरा से स्वार्थ के कारण बड़े से बड़ा नुक्सान पहौँचाने में भी देरी नही करते वे सिर्फ अपना फायदा देखते हैं । बाकी उन्हें किसी से कोई मतलब नहीं रहता बिना मतलब के वे किसी से बात तक करना पसंद नहीं करते जिससे मतलब हो उसकी खूब खुशामद करते हैं उसके तलवे चाटने में उन्हें परम सुख की प्राप्ति होती है।
अशोक जी को विवाह के लिए कपड़े खरीदना था तो वे अपने खास दोस्त की दुकान पर चले गए उसने उनकी खूब आव भगत की ये तक कहा कि आपकी अपनी दुकान है। घर की बात है । आपसे मुनाफा थोड़ी लूँगा लाभ कमाने के लिए दुनिया पड़ी है। अशोक जी अपने मित्र की बात सुनकर गदगद हो गए इस खुशी में उन्होंने ज्यादा ही खरीदारी कर ली। न भाव पूछे न मौलभाव किया उसने कसम खा खा कर सामान बेच दिया और वे पैसे देकर आ गए। दूसरे दिन वे एक परिचित को कपड़े दिखा रहे थे उसकी भी दुकान थी। उसने जब भाव पूछा तो चौंक गया उसने हिसाब जोड़कर बताया कि अशोक जी आपके जिगरी दोस्त ने आपको पूरे बारह हज़ार रुपये की चपत लगाई है ये छत्तीस हजार रुपये के कपड़े चौबीस हजार के हैं और थोक के रेट में तो बीस हजार के ही हैं अशोक जी सर पकड़कर बैठ गए फिर बोले मैं वापस कर देता हूँ सुनकर परिचित बोला यह असंभव है मैं उसकी फितरत अच्छी तरह जानता हूँ । आपका रिश्ता बिगड़ जाएगा पर वापस वो एक रुपया भी देने वाला नहीं है। ऐसे और भी उदाहरण हैं ।एक सगे भाई ने प्रापर्टी बिकवाने में महज एक लाख के लोभ में भाई को दस लाख का नुक्सान पहुँचा दिया। उसका खून सफेद हो गया था। ऑफिस में काम करने वाले सहकर्मी भी ऑफिस में सामान बेचते हुए मिल जाएँगे जो अपने ही सहकर्मी से जमकर मुनाफा वसूल करने में हिचक नहीं करेंगे अपनों से चोट खाए हुओं की संख्या में दिनोंदिन वृद्धि होती जा रही है लोगों का भरोसा टूट रहा है। 
ऐसी बात नहीं है कि अच्छे रिश्तेदार हो ही नहीं ये तो अभी भी हैं पर यह भी मतलबी रिश्तेदारों के कभी कभी शिकार हो ही जाते हैं।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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