कोई माने यह न माने पर इसका अंदाजा तो लग ही जाता है कि रिश्वत की जड़ें बहुत मजबूत हैं। जिन्हें उखाड़ पाना संभव नहीं। ऐसी जेसीबी मशीन ही नहीं बनी जो रिश्वतों की जड़ों को पूरी तरह उखाड़कर नष्ट कर दे और न ही कोई ऐसा खरपतवार नाशक बना है जो रिश्वत के पौधे को उगने ही न दें। रिश्वत का लेन देन तब तक चलता रहेगा जब तक सूरज चाँद रहेंगे। जिनके पास रिश्वत लेने के अघोषित अवैध अधिकार नहीं हैं। वे रिश्वत नहीं ले सकते। लेकिन रिश्वत देना उनकी मजबूरी हो। शायद ही कोई ऐसा विरला होगा जिसने आज तक कभी किसी को रिश्वत का एक पैसा तक नहीं दिया है। अगर रिश्वत लेना और देना दोनों जुर्म है और इसे साबित करने में आसानी हो तो शायद देश में कोई विरेले ही बचेंगे जिन्हें सजा न मिले।
एक दुकानदार ने बताया कि अगर हमें रिश्वत न देना पड़े तो बीस प्रतिशत कीमत तो वैसे ही कम हो जाए। हम क्या जेब से रिश्वत देंगे। जो देते हैं वो भाव बढ़ाकर वसूल कर लेते हैं। एक होटल वाला साफ सुथरे मग को ट्रे में रखकर दो लोगों को चाय सर्व कर रहा था। उनके लिए नाश्ता भी साफ सुथरी मँजी क्राकरी में लगाया गया था। होटल मालिक वेटर का काम कर रहा था साथ ही उनकी जी हुजूरी भी। नाश्ते के बाद उनके लिए चाँदी के वर्क लगा स्पेशल पान तथा मँहगी सिगरेट भी लेकर आया। जब वे जाने लगे तो बोला साहब कोई भूल हो गई हो तो क्षमा कर देना मैं दो दिन बाद आपकी सेवा मैं उपस्थित होऊँगा। वे बोले ठीक है नहीं तो फिर समझ लेना तुम्हारा क्या होगा। उनके जाने के बाद उसने राहत की साँस ली। हमने उससे कहा यह क्या आपकी बेटी के ससुर और दूसरा आपका जँवाई था जो आप इनकी इतनी खातिरदारी कर रहे थे? वो दुकानदार बोला अगर वो होते तो कोई टेन्शन ही नहीं थी। तो हमने कहा फिर कौन थे ये? वे बोले ये वो मुफ्तखोर नौकरशाह थे कि अगर ये नाराज हो जाएँ तो हमारी दुकान एक दिन भी नहीं चलने दें। हमने कहा दो दिन में आप इनकी क्या सेवा करने वाले हैं? वे बोले इनका जो बँधा बँधाया रिश्वत का पैसा हो वो पहुँचाना है साथ ही दस किलो मावा और एकदम शुद्ध पाँच किलो गाय घी देकर आना है वो भी बिल्कुल मुफ्त। हमने कहा इन्होंने तो चाय नाश्ते के पैसे तक नहीं दिए। वे बोले हमारी इतनी हिम्मत नहीं है जो उनसे पैसा माँग सकें। पान सिगरेट के पाँच सौ रुपये भी हमने अपनी जेब से भुगते हैं। इसके बाद उसने चाय में पानी की मात्रा बढ़वा दी थी। शकर और चाय पत्ती की मात्रा भी कम कर दी। समोसे कचौड़ी का वजन और आकार कम करवा दिया था। पोहे की मात्रा में कमी कर दी थी। जलेबी की चाशनी पतली करवा दी थी। कह रहा था हम कोई जेब से थोड़ी भुगतेंगे ये खर्च। हम तो इसकी भरपाई ग्राहकों से ही करेंगे। उसी विभाग के चपरासी सुखलाल से बात हुई तो वो बोला हमारे साहब ईमानदार नेक और साफ दिल के इंसान हैं। जो भी रिश्वत का पैसा आता है वो सभी स्टॉफ के लोगों में उनकी अहमियत के अनुसार बाँट दिया जाता है। कोई अगर छुट्टी पर भी हो तब भी उसे उसका हिस्सा दिया जाता है। हमने कहा आज आपके हिस्से में कितने आए। वे बोले आज रिश्वत की कमाई कम हुई इसलिए दो हजार रुपये ही मिले। हमने कहा वेतन कितना मिलता है। वे बोले रोज का तेरह सौ रुपये पड़ जाता है। हमने कहा रिश्वत के तो दो हजार मिल गए वे थोड़ा दुखी होकर बोले आज कम मिले अभी ऑफ सीजन चल रहा है सीजन आने दो फिर देखना हमारे जलवे। हम उनकी बात सुनकर निरुत्तर हो गए थे।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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