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व्यंग्य : बार बार की असफलता के बाद मिली सफलता का सुख

कोई व्यक्ति अन थक प्रयत्न कर ने के बाद भी अस फल रहे और ऐसा बार बार हो। इसके बाद अगर उसे सफलता मिल जाए तो इस से जो सुख मिलता है उसका वर्णन तो वो भी नहीं कर सकता। अक्सर ऐसा होता है कि एक दो बार की असफलता के बाद बहुत से लोग प्रयत्न करना छोड़ देते हैं यह असफल लोग दूसरों का मनोबल तोड़ने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। इन्हें खुद तो सफलता मिली नहीं तो सोचते हैं कि ऐसी सफलता किसी और को कैसे मिलेगी।
जब इनसे कोई इस संबंध में बात करता है तो यह नकारात्मक बात करते हैं फिर अपने अनुभव बताने लगते हैं कि उन्होंने कितने पापड़ बेले जमीन आसमान एक कर दिया इसके बाद भी सफलता नहीं मिली तो तुम्हें कैसे मिल सकती है उनकी बात सुनकर कमजोर मनोबल वाले व्यक्ति अपना इरादा ही त्याग देता है लेकिन जिसका मनोबल मजबूत होता है वो ऐसे लोगों की बात सुनकर विचलित नहीं होता ना ही अपने मनोबल को गिरने देता। उसके इरादे नहीं बदलते ऐसा व्यक्ति जब प्रयास करना शुरू करता है तब यह उसकी बहुत खिल्ली उड़ाते हैं उसकी बुराई करते हैं उसे मूर्ख सिद्ध करने में कोई कसर नहीं रखते। और जब असफल हो जाता है तो ये मन ही मन बहुत खुश होते हैं उसकी हर बार की असफलता इनके मन में खुशी का संचार करती है। और अगर वो व्यक्ति सफल हो जाए तो इन्हें भारी दुख होता है फिर ये उस पर गलत तरीके अपनाने का आरोप लगाते हैं। लेकिन सफल हुए व्यक्ति पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। फिर ये इस लायक ही नहीं बचते कि उसका कुछ बिगाड़ सकें।  
सोहनलाल जी को गाने का शौक बचपन से ही था उनके पिताजी उन्हें पढ़ाना चाहते थे और पढ़ाई में उनका मन नहीं लगता था सातवी में लगातार तीसरी साल भी फेल होने पर जब उन्हें स्कूल से निकाला गया तब उनके पिताजी ने उन्हें बुरी तरह पीटा थकने के बाद बोले तू चाहता क्या है। क्या जिंदगी भर मजदूरी करना है। सोहनलाल जी कुछ बोले नहीं पिताजी ने उन्हें दूसरे काम सौंपे पर उसमें भी असफल रहे हारकर पिताजी ने उन्हें घर से निकाल दिया वे हाईवे पर आ गए यहाँ एक ढाबे पर एक ट्रक ड्राइवर ने उन्हें खाना खिलाया फिर ये क्लीनर बनकर उसके साथ मुंबई आ गए पूरे आठ साल उन्होंने घोर संघर्ष किया तब किसी ने उनकी खोज खबर नहीं ली पिताजी ने तो उन्हें कुलका कलंक कहकर घर से निकाला था पूरा गाँव उन्हें नकारा निकम्मा कहता रहा। और आखिर उनकी मेहनत रंग लाई वे सफल गायक बन गए। उनका जब नाम हुआ तो गाँव वालों के साथ साथ पिताजी की सोच भी बदल गई कुल का कलंक कहने वाले उनको कुल का गौरव कह रहे थे उन्हें नकारा कहने वाले गाँव वालों के वे आदर्श बन गए थे। सोहनलाल जी ने इसके लिए कितना संघर्ष किया है ये उनका दिल ही जानता था।



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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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