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व्यंग्य: दिखावे की दुनिया

आज के इस दौर में असल की पहचान मुश्किल होती छा रही है दुनिया दिखावे की हो गई है रिश्तों की मिठास खत्म हो गई है बिन मतलब के कोई किसी से वास्ता नहीं रखना चाहता निकट के संबंधों का भी विश्वास डगमगा गया है।
सुंदर दिखने की चाह में ब्यूटी पार्लरों की भरमार हो गई है कई घरों में पति पत्नी के रिश्ते ठीक नहीं है पर लोगों के सामने वे ऐसा जाहिर करते हैं जैसे उनमें आपस मे गहरा लगाव है। भाई भाई से ईर्ष्या एवं द्वेष रख रहा है। दोस्ती का गणित भी गड़बड़ा गया है लोग इतने चालाक हो गए हैं कि कौन दोस्त है और कौन दुश्मन इसका पता ही नहीं चलता लोग झूठ बोलने में माहिर हो गए हैं। झूठ बोलने में उनकी जबान जरा भी नहीं लड़खड़ाती कसम खाकर झूठ बोलना आम हो गया है लोग अपने ऐब बड़ी सफाई से छिपा जाते हैं और अपने उन गुणों का बखान करते हैं जो उनमें हैं ही नहीं ऐसे माहौल में जीने के लिए अधिक संघर्ष करना पड़ रहा है। सतर्कता बरतते हुए संबंध रखना पड़ रहा है । क्या पता जिसे हम अपना दोस्त समझ रहे हैं वो ही हमें खाई में धकेल दे।
हाल ही में घटित एक घदना ने मन विटलित कर दिया जिस पत्नी ने प्रेमी से मिलकर अपने पति की जान ले ली थी वो अपने पति के शव पर ह्रदय विदारक विलाप कर रही थी उसके विलाप को देखकर कई लोगों की आँखों से आँसू छलक पढ़े थे वो अपने पति की अस्थि लेकर प्रयाग तक गई थी। बाद में जब लोगों को पता चला कि यही अपने पति की हत्यारी है तो सबको बड़ी हैरत हुई सब यही कह रहे थे कि कैसा ज़माना आ गया है किस पर भरोसा करें किस पर न करें इसका पता ही नहीं चलता।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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