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व्यंग्य: काम के बोझ के तनाव में खोई ख़ुशी

आज के दौर में आम हो या खास सब काम के बोझ तले दबे हुए हैं यह काम उनका मानसिक तनाव भी बढ़ा रहा है। घर सर्व सुविधा युक्त तो बना लिए पर उसमें ठीक से रहने की ही फुर्सत नहीं है। दूसरों के देखा देखी कर्ज लेकर सारे सुख के साधन जुटा लिए हैं अब उनकी ई एम आई में ही वेतन का अधिकांश हिस्सा खर्च हो रहा है । इस डर से नौकरी भी नहीं छोड़ पा रहे कि अगर दूसरी नौकरी जल्दी नहीं मिली तो ई एम आई कैसे भरेंगे । इसिलिए लोगों की खुशी खो गई सुख साधन तो खूब हैं पर खुशी लापता है।।
परिवार छोटे होने के बाद भी खुशी नहीं है। पिच्यासी साल के बंशीलाल जी पार्क की बैंच पर अकेले बैठे हुए थे तभी उनके हम
उम्र राधेलाल आ गए तो दोनों घुलमिलकर बातें करने लगे। कह रहे थे कि अब तो यह हाल हो गया है कि पड़ोसी ही पड़ोसी को नहीं जानता। फिर वे अपने जमाने की बात करने लगे बंशीलाल बोले गाँव में हमारा मिट्टी का खपरैल वाला मकान था दरवाजा इतना छोटा था कि बिना झुके घर में प्रवेश नहीं कर सकते थे। बिजली थी नहीं । पानी कुएँ से लाते थे माँ हाथ की चक्की चलाकर सुब्ह चार बजे एक पसेरी अनाज पीसकर आटा तैयार करती थी फिर दही को मथानी से मथकर घी निकालती थी । छाछ मुफ्त सबको बाँट देती थी। चूल्हे पर पाँच किलो आटे की रोटी बनाती थी। उसे कोई बीमारी नहीं थी संयुक्त परिवार था चाचा बाबा दादा दादी सब मिलाकर पच्चीस लोगों का परिवार था और हम सब बहुत खुश थे । फिर बंशीलाल ने कहा मैं शहर आ गया यहाँ पढ़ लिखकर सरकारी नौकरी कर ली पत्नी भी नौकरी करने लगी दो बच्चे हुए दोनों विदेश में रह रहे हैं । दो साल पहले पत्नी चल बसी बच्चों ने मकान बेच दिया और मुझे वृद्धाश्रम में छोड़ दिया है। राधेलाल जी बोले तुम तो फिर ठीक हो मैं तो घर का रखवाला बनकर रह गया हूँ उनका खाना मुझे अच्छा नहीं लगता टिफिन सेंदर का खाना खाकर अपना बुढ़ापा काट रहा हूँ मेरे पास दो घड़ी बैठने की किसी को फुर्सत नहीं है। दोनों बुजुर्ग कुछ देर तक बातें कर मन हल्का करते रहे और फिर अकेलेपन से जूझने के लिए चल दिए।



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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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