सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

व्यंग्य : छिपे हुए हत्यारे

जो जाहिर तौर किसी की हत्या करते हैं वे तो कानून की गिरफ्त में आ ही जाते हैं और उन्हें कड़ी से कड़ी सज़ा भी मिल जाती है पर जो छिपे हुए हत्यारे हैं उनको सजा नहीं मिल पाती बल्कि उनका समाज में खूब मान सम्मान भी होता है। ये बात उनकी नहीं है जो किसी की हत्या कर के छिप गए हैं ऐसे मुज़रिम भी पकड़ में आ जाते हैं। यह बात उनकी है जो टोना टोटका करके किसी मरीज को अस्पताल नहीं जाने देते और इलाज के अभाव में वो दम तोड़ देता है फिर भी ऐसे लोगों की प्रतिष्ठा पर कोई आँच नहीं आती।
जो सर्पदंश से पीड़ित का टोने टोटके से इलाज करने का दावा करते हैं इस बीच मरीज की मौत हो जाती है तब भी ऐसे लोगों को कोई हत्या का दोषी नहीं ठहराता और ये और भी कई लोगों की असमय मौत का कारण बनते हैं। वे लोग भी बच जाते हैं जो फर्जी डिग्री के दम पर इलाज करके मरीजों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करते हैं और उनकी मौत का कारण बनते हैं।
शिवलाल की पत्नी को ब्लीडिंग की प्राब्लम थी। उसने गाँव के फर्जी झोला छाप एम पी को दिखाया। उसकी दवा से आराम नहीं मिला तो एक निजी अस्पताल में ले गया। वहाँ जाँच से पता चला कि उसे बच्चेदानी में कैंसर है। ऑपरेशन में सात लाख रुपये खर्च होंगे वो पैसे का इंतजाम करने की बात कहकर पत्नी को घर ले आया। डॉक्टरों ने उसे दस दिन की दवाएँ लिखकर दीं और कहा ग्यारहवें दिन इन्हें लेकर आ ही जाना वरना इनकी हालत काबू से बाहर हो जाएगी। शिवलाल एक साधारण हैसियत का इंसान था। किसी ने उससे कह दिया कहाँ इलाज के चक्कर में पड़ रहे हो। एक तांत्रिक हैं वो इसे चुटकियों में ठीक कर देंगे। उन्होंने ताँत्रिक को बताया उसने कहा इन्हें कोई बीमारी नहीं किसी ने मैली बिठाई है। वो हटा देंगे तो यह ठीक हो जाएँगी। उसने शिवलाल से अनुष्ठान के नाम पर बीस हजार रुपये ऐंठ लिए। जब आराम नहीं मिला तो फिर उतने ही रुपये ले लिए। वो तांत्रिक को अस्सी हजार रुपये दो चुका था लेकिन पत्नी की हालत बिगड़ती जा रही थी। जब उसकी हालत ज्यादा बिगड़ गई तो ताँत्रिक ने चार लाख में ठीक करने की गारंटी दी। वो इतने पैसे जुटा नहीं सका और उसकी पत्नी मर गई। ताँत्रिक चालाक था इतनी रकम ये एक दो दिन में तो लाएगा नहीं इस बीच पत्नी इसकी मर जाएगी तो ये मुझ पर आरोप नहीं लगा पाएगा। और ऐसा ही हुआ भी वो ताँत्रिक आज भी झाड़ फूँक कर रहा है उसका मान सम्मान भी कम नहीं हुआ न ही उसकी कमाई कम हुई है। शिवलाल अपराध बोध से ग्रस्त है और वो लोग जो हत्यारे हैं उनको अपने किए पर कोई अफसोस नहीं है। लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने वालों के खिलाफ कोई ठोस कार्यवाही क्यों नहीं होती क्या ये हत्यारे नहीं है। अगर हैं तो इन्हें सजा क्यों नहीं होती न ही इनके मान सम्मान में कोई कमी होती है।


*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग (व्यंग्य)

कबीर जी ने निंदक को इसलिए हितकारी कहा है क्योंकि वो हमारी बुराइयों को उजागर करते हैं और हम उन्हें दूर करते चले जाते हैं। इस तरह हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है। लेकिन आज के दौर में दुर्भावना रखकर निंदा करने वालों की संख्या ज्यादा हो गई है। ऐसे लोग हमारी बुराईयों को उजागर नहीं करते बल्कि हमारी खूबियों को छिपाकर मन में दुर्भावना रखते हुए हमारी निंदा करते हैं। इन लोगों से दूर रहने में ही भलाई है। अगर इनको साथ रखा तो ये हमारा मनोबल तोड़कर रख देंगे। हमें नकारा साबित करने की कोशिश करेंगे हमारे आत्मविश्वास को डगमगा देंगे। ये दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग अपने विरोधियों को निपटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उसके सारे अवसर या तो खत्म कर देते हैं या छीन लेते हैं। ये लोग हद दर्जे के मतलबी इंसान होते हैं। जिस से मतलब निकालना हो उसकी झूठी तारीफों के पुल बाँधते हैं। उसकी खूब चापलूसी करते हैं उसे महान सिद्ध कर देते हैं और समाज में एक भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं। ये ग्रुप बनाने में माहिर होते हैं। जो इनके गुट में शामिल हो जाता है ये उसके हर ऐब ढँक लेते हैं। उसे स्थापित करने के हर स...

कहानी: शादी के लिए नौकरी

रवीन्द्रसिंह को एक प्राईवेट दवा कंपनी में नौकरी किए अभी एक महीना भी नहीं हुआ था कि वह नौकरी छोड़ने का इरादा करने लगा था  लेकिन उसकी  माँ कंचन  का कहना था  जब तक  तेरी शादी न हो जाए  तब तक नौकरी करता रह जब शादी हो जाए तब नौकरी छोड़ना जबकि रवीन्द्र सिंह सोच रहा था कि एक महीना गुजारना मुश्किल हो रहा है कब तो उसकी शादी होगी और कब वो ऐसी नौकरी से पीछा छुड़ाएगा रवीन्द्र सिंह की  उम्र पैंतीस वर्ष की होने जा रही थी  और वो अभी तक कुँवारा  था कंचन जी का वह इकलौता लड़का था  उनकी दो लड़कियाँ थीं दोनों रवीन्द्द से बड़ीं थीं दोनों की शादी हो गईं थी दोनों के बच्चे   कोई छठी में तो कोई सातवीं में तो कोई आठवीं में पढ़ रहा था।  कंचन जी कस्बे के  एक सरकारी दफ्तर में चपरासी की नौकरी कर रही थीं  उनके पति सुरेन्द्रसिंह  सरकारी दफ्तर में बाबू थे  सरकारी काम से जब वे कहीं जा रहे थे तब  एक ट्रक ने उन्हें टक्कर मार दी थी जिससे उनका वहीं दुखद निधन हो गया था।  जब रवीन्द्र एक साल का था तब उसके पिता का निधन हुआ था उसकी दोन...