ऐसे लोगों की संख्या में दिनों दिन वृद्धि होती जा रही है जो अपने लाभ के लिए हर तरह का अभिनय कर अगले को प्रभावित कर अपना काम निकाल लेते हैं ।कुछ लोग ऐसे भी हैं ।जो दूसरों की सहानुभूति पाने के लिए रोने भी लगते हैं ।उनके आँसू घड़ियाली होते हैं ।रोते रोते ही यह नार्मल भी हो जाते हैं ।यह लोग व्यक्ति की फितरत देखकर यह तय करते हैं कि उन्हें किस तरह का अभिनय करना है।
एक अपनी बेटी के इलाज के लिए रुपये माँग रहा था। अपनी दयनीय दशा बना रखी थी ।लोगों को दया आ गई हाथों हाथ सभी ने अच्छी धनराशि एकत्रित कर उसे सौंप दी वो राशि लेकर चलता बना ।कुछ दिन बाद दूसरी कॉलोनी में भी वो ऐसा ही कर रहा था। कुछ लोगों का जब उसकी असलियत पता लगी । तो। इसकी उसे भी भनक लग गई और वो वहाँ से भाग गया।
ऐसे आपने बहुत से उदाहरण देखे होंगे जिसमें भले चंगे लोग दिव्यांग बनकर भीख मागते नजर आते हैं यह भी अभिनय करने में माहिर होते हैं इन्हें दूसरों को प्रभावित करने की कला अच्छी तरह से आती है ये अपनी बातों से सम्मोहित कर देते हैं और लाभ उठाकर चंपत हो जाते हैं। इनसे बचने का कोई ठोस उपाय नहीं है। जाति छिपाकर असल पहचान छिपाकर अपना काम बनाने वाले लोग दूसरों को क्षति पहुँचाने में कतई संकोच नहीं करते झूठ बोलकर शादी करने वाले भी बहुत मिल जाएँगे। कुछ लोग हैं तो कुछ नहीं पर अपने आपको बड़ा सरकारी अधिकारी बताकर लोगों से अनुचित काम कराने में सफल हो जाते है। इन लोगों ने विश्वास को डगमगा दिया है। बहुत से लोग इनके झाँसे में नहीं आते। फिर भी ऐसे लोगों की भी अच्छी खासी संख्या है जिनको ये आसानी से अपना शिकार बना लेते हैं।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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