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जुलाई, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

व्यंग्य: विषैले कटाक्ष

जो विनोद प्रिय होते हैं वे हास परिहास से माहौल को खुशनुमा बनाए रखते हैं लेकिन कुछ लोग चुभते हुए कटाक्ष से आहत कर देते हैं कुछ कटाक्ष तो इतने विषैले होते हैं जो संबंधों को हमेशा के लिए खत्म कर देते हैं ये मरे हुए संबंध फिर कभी जीवित नहीं होते। रमेश और नरेश कभी अच्छे दोस्त थे आज वे एक दूसरे के दुश्मन हैं। उसका कारण भी विषैले कटाक्ष ही हैं ।छोटी सी बात पर उन दोनों में मतभेद हो गए थे जिन्हें खत्म भी किया जा सकता था रमेश जी ने तो अपनी तरफ से खत्म भी कर दिया था पर नरेश जी ने उसे अपने दिल पर ले लिया था और वे जब मौका मिलता रमेश जी को उलाहना देने लगते खूब ताने कसते एक बार तो अति हो गई जब नरेश जी ने रमेश जी खास अपने मित्रों के बीच में तानों कटाक्षों से अपमानित करना शुरू किया नरेश जी ने उन्हें उपहास का केन्द्र बना दिया। रमेश जी उस दिन बहुत आहत हुए इतने आहत कि उसी दिन उनकी दोस्ती का अंत हो गता। आज पूरे चार वर्ष हो गए हैं उनके बीच में बोलचाल पूरी तरह से बंद है परिहास गुदगुदाने वाला हो तो सबके मनोरंजन का हेतु बन जाता है और अगर नौचने खसोटकर आहत करने वाला हो तो संबंधों को खत्म कर देता है। दूसरों ...

दिखावे की अमीरी( व्यंग्य)

एक पुरानी कहावत है घर में नहीं हैं दाने अम्मा चली भुँजाने । चाहे भले ही उसने अपनी ओली में कंकर बाँध रखे हों कौन ओली खोलकर देखने वाला है? लोग तो यही समझेंगे अम्मा दानों को भुँजाने भाड़ में ले जा रही हैं उनकी फूली पड़वा के लाएगी । ऐसे ही घर में महेरी खाकर मूँछ पर चावल चिपकाकर घर से भरपेट खीर खाने की बात कहने वाले बड़बोले अपनी अमीरी का झूठा बखान कर रौब जमाने की कोशिश करते हैं। ऐसे ही यू पी से आए बाबूलाल जी एक फेक्टरी में अठारह हजार रुपये की नौकरी कर रहे थे ।एक दिन अपने साथी मजदूरों से कह रहे थे । मुझे ऐसा वैसा मत समझना खानदानी रईस हं दो सौ एकड़ जमीन है इतना बड़ा मकान है कि अगर सबसे ऊपर का हिस्सा नीचे से देखो तो सिर की टोपी निकलकर गिर जाए इस फेक्टरी को तो चुटकी बजाते हुए खरीद सकता हूँ। तभी एक ने कहा कि फिर एक कमरे के मकान में किराये से क्यों रह रहे हो तो कहने लगे अपनी खुद्दारी के कारण पिताजी से झगड़ा हो गया इस लिए मजदूरी कर रहा हूँ जबकि मेरे यहाँ ही दो सौ लोग काम करते हैं। हमने सबको रहने के लिए अच्छे मकान दे रखे हैं। तभी उनके गाँव का साथी राकेश आ गया तो उन्होंने बात बदल दी और राकेश...

व्यंग्य : दुर्भावना का दंश

कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अकारण ही किसी से दुश्मनी करने लगते पर उसे जाहिर नहीं होने देते। तथा दुर्भावना को पाले रहते हैं और मौके की ताक भें रसते हैं मौका मिलते ही ये दंश चुभोकर अपना सारा विष उड़ेल देते हैं पीड़ित यह सोचकर हैरान होता है कि आखिर इसने किस बात का बदला निकाला है। महेश जी जीवन भर नेक और भले इंसान बनकर रहे इसके विपरीत उनका परिचित दिनेश ने बुराइयों से नाता जोड़ लिया । दोनों ने एक साथ मिल में नौकरी शुरू की थी।। महेश जी अपनी मेहनत और लगन तथा निष्ठा के दम पर तीन साल में ही सुपर वाइजर बना दिए गए । दिनेश को उसकी हरकतों के कारण नौकरी से निकाल दिया गया इसके बाद उसने अपराध की दुनिया में कदम रख दिया उसका ज्यादातर?समय जेल में कटने लगा समय के साथ महेश जी का बेटा बड़ा हुआ। वो भी मिल में नौकरी करने लगा था सब कुछ ठीक चल रहा था लेकिन एकहदिन रोहित दिनेश के संपर्क में आ गया उसे महेश से बदला निकालने का अवसर मिल गया। उसने रोहित को अपने पक्ष में करके उसे नशे का आदि बना दिया कई बुरी आदत डाल दी वो दिनेश को अपना आदर्श मानने लगा तथा सीधे सादे पिताजी को विलेन समझने लगा रोज शराब पीकर पिता के साथ ...

व्यंगय: पत्नी का भाई

पुराने ज़माने की कहावत है कि मकान को खा गए आले और घर चो खा गए साले। अर्थात पुराने समय में घर की दीवाल बहुत मोटी होती थीं इतनी मोटी की उस मोटाई में अल्मारी भी बन जाती थी इससे गर की दीवाल कमजोर हो जाती थी चोरों को सेंध लगाने में मुश्किल नहीं होती थी। इसी तरह यहाँ उन सालों के विषय में कहा गया है जो बहन के घर में बने रहते हैं यह भी परिवार को कमजोर करने भें बड़ी भूमिका निभाते हैं हाँलाकि सभी साले बुरे नहीं होते। लेकिन यहाँ बौरे सालों चर्चा की जा रही है । जिनसे जीजा परेशान रहते हैं। रभेश का निकम्मा साला पाँच साल से उनके घर में रहकर उनका सुख चैन हराम किए हुए था। पत्नी अपने भाई का अंधा समर्थन करती थी उसकी बडी से बडी गलती छिपा दी जाती थी। रमेश जी का छोटा भाई दिनेश परीक्षा की तैयारी करने और परीक्षा देने के उद्देश्य से तीन महीने के लिए। आया था । लेकिन उनकी पत्नी तथा साले ने उसे तोन दिन भी नहीं टिकने दिया हारकर उसने कहीं कमरा किराये से ले लिया तब कहीं उसका पीछा छूटा। रमेश जी बोले जरूरत पढ़ने पर मैंने अपने भाई को पच्चीस हजार रुपये उधार दिए थे। यह हमारी पत्नी को नागवार गुजरा उसने हमें परेश...

व्यंग्य: बने बनाए काम बिगाड़ने वाले

आज के इस दौर में जहाँ सच्चे हितैषी दोस्त बहुत कम मिलते हैं दुशूमनी को गहराई में छिपाकर दोस्ती का दिखावा करने वाले बहुत ज्यादा मात्रा में मिल जाते हैं यह हमारा इस तरह से नुक्सान पसुँचाते हैं जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर पाते। इनमें बने बनाए काम बिगाडने वालों की संख्या भी कम नहीं है। वर्मा जी की बेटी निशा विवाह योग्य थी । उसको देखने के लिए लड़के वाले आ रहे थे। उन्होंने इसका जिक्र अपने मित्र अशोक से किया और कहा कि कल आप और भाभीजी हमारे साथ रहेंगे तो ज्यादा अच्छा रहेगा रिश्ता तो लगभग पक्का ही है बस औपचारिकता शेष है।  लडके वाले आए लड़की उन्हें पसंद थी। थोड़े समय के लिए वर्मा जी की पत्नी ने वर्मा जी को परामर्श के लिए बुला लिया मात्र पाँच मिनट का अवसर अशोक दंपत्ति को मिला जिसमें उन्होंने अपना कमाल दिखा दिया और होता हुआ रिश्ता टूट गया। उनकी पत्नी ने लडके की माँ से कहा लडकी की अपने माँ से बिल्कुल नहीं बनती और लड़की को कोई काम भी नहीं आता। अशोक जी ने लडके के पिता से कहा वर्मा जी के पास खूब पैसा है मुँह माँगा दहेज लेना नहीं दें तो रिश्ता तोड़ देना हमारे पास इससे कई गुना अच्छी लड़की विवाह...

व्यंग्य: कायदा तोड़कर ख़ुश होने वाले

नियम कानून कायदे का पालन करना अच्छी बात है पर कुछ लोग ऐसे भी मिल जाएँगे जो कायदा तोड़कर ख़ुश होते हैं ऐसा करने से उन्हें अद्भुत आनूद की प्राप्ति होती है फिर यह सब पर झूठा रौब दिखाते हैं। यह टू व्हीलर भी ऐसे चलाते हैं जैसे हवाई जहाज उड़ा रहे हो वो भी बिना हेलमेट पहने यह लोग अपने जीवन से खिलवाड़ करते हैं। और असमय ही काल के गाल में समाकर अपने परिजनों को जीवन भर का दुख दे जाते हैं। हमें हमारे मोहल्ले के विनोद बाबू घबराए हुए आते दिखे हमने उनकी घबराहट का कारण पूछा तो वे बोले मौत का सामना करके आ रहा हूँ । हमने कहा कैसे वे बोले अजय जी के लड़के अनिकेत की बाइच पर बैठने की गलती कर दी । हमारे बैठते ही उसने बाइक की गति अप्रत्याशित रूप से बढ़ा दी हमारी एक न सुनी ट्रेफिक सिग्नल भी तोड़कर निकल गया हमारी तो घिग्घी बँध गई हमें ऐसा लगा जैसे हमारा आखिरी समय आ गया हो गंतव्य पर पहुँचने के बाद जान में जान आई। हम से वो यह कहकर गया कि कहीं जाना हो अंकल तो बता दिया करो। हमने तो तय कर लिया था कि हम इसकी बाइक पर पहली और आखिरी बार बैठ रहे हैं अगर बच गए तो फिर कभी इसकी बाइक पर नहीं बैठेंगे। विनोद जी बताने लगे...

व्यंग्य: क्या वाकई शराफ़त का ज़माना नहीं है

एक भ्रष्ट राजस्व विभाग के कर्मी अक्सर कहते रहते थे कि शराफ़त का ज़माना नहीं ईमानदार भूखे मर रहे हैं और बेईमान मौज कर रहे हैं। वे अपने विभाग के अपने उस सहक्रमी की हँसी उड़ाते थे जो निहायत ईमानदार था बड़े साहब ने उसे लूप होल में डालकर उस पर काम का बोझ लाद दिया था और वे बिना ना नुकुर कर के अपने काम को पूरी निष्ठा और लगन से करने मेः जुटे रहते थे।        वे भ्रष्ट अधिकारी आखिर रिश्वत लेते हुए पकड़ा कर नौकरी से हाथ धो बैठे । आजकल जेल की हवा खा रहे हैं उनकी पत्नी कपडे सिलकर गृहस्थी चला रही है जिस दिन वे जेल जा रहे थे उसी दिन उनके ईमानदार सहकर्मी का नायब तहसीलदार के पद पर प्रमोशन हो गया था और सरकार ने उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंप दी थी। जिसके वो हक़दार थे। वे भ्रष्ट अधिकारी जब नौकरी पर थे तब कहा करते थे आज के मँहगाई के जमाने में वेतन के सहारे गुजारा करना मुश्किर हो गया है जबकि उन्हें एक लाख रुपये प्रतिमाह वेतन मिल रहा था। जिनसे वे रिश्वत लेते थे उनमें कई गरीब भी शामिल थे जो सालभर में भी एक लाख रुपये नहीं कमा पाते थे उनसे वे हजारों रुपये की रिश्वत झटक लेते थे वे...

व्यंग्य: दूसरों की सफलता पर कुढ़ने वाले

प्रायः हर काम में असफल रहने वाले चंचल प्रवृत्ति के लोग दूसरों की सफलता को सहन नहीं कर पाते और मन ही मन कुढ़ते रहते हैं कोई इनके सामने किसी सफल व्यक्ति की तारीफ कर दे तो ये आपे से बाहर हो जाते हैं अपनी भड़ास निकाल लेते हैं इनका मानना है कि आज के ज़माने में सफलत गलत तरीके से मिलती है मेहनत धैर्य रखकर लगन से काम करने वालों को भी सफलता नहीं मिलती और इसके लिए वे अपना उदाहरण देकर कहते हैं कि हमने सफल होने के लिए क्या नहीं किया बस गलत तरीके नहीं अपनाए इसी से सपलता हमसे हमेशा दूर रही। ऐसे ही शहर की झुग्गी बस्ती में रहने वाले मज़दूर सोहन लाल हैं वो अगर सबसे अधिक किसी को देखकर कुढ़ते हैं तो वो उनका बचपन का दोस्त विनोद सिंह है। विनोद सिंह आज शहर का धनाढय व्यक्ति है। जबकि विनोद भी सोहनलाल के गाँव का ही था सोहनलाल ही उसे शहर लाया था । सोहनलाल ने ही उसे दिहाडी पर लछवाया था। विनोद ने दिन रात घोर परिश्रम किया मज़दूर से मिस्त्री बना मिस्त्री से सुपर वायजर। फिर ठेकेदार और आजकल शहर का जाना माना बिल्डर है। उसके पास कितनी ही लक्जरी कारे हैं जबकि सोहनलाल के पास खटारा सायकिल है जिसे वो चलाता कम है घसी...

व्यंग्य: मुँह पर मीठी बात करने वाले

दुनिया में ऐसे लोगों की भी अच्छी खासी संख्या है जो मुँह पर तो मीठी चिकनी चिपड़ी बातें करते हैं पर भीतर इनके कपट कषाय भरा रहता है इनके लिए एक कहावत बड़ी प्रचलित है गुड़ भरा हँसिया यह लोग जो अपने दिल में दुश्मनी को छिपाकर रखते हैं उसका किसी को अहसास तक नहीं होने देते जब इन्हें अपनी कसर निकालने का मौका मिलता है तब पता चलता है। तब तक बड़ी देर हो चुकी होती है। है और वे अपने मक़सद में कामयाब हो जाते हैं।  ऐसे ही एक रिश्तेदार से पीडित हमारे परिचित विनोद कुमार जी से बात हुई । वे बड़े दुखी दिखाई दे रहे थे। हमने उन्हें जरा सा कुरेदा तो कहने लगा जीवन में इतना अपमान कभी नहीं सहा जितना पिछले पाँच दिनों में सहन करना पड़ा। वो तो अपने आपको काबू में रख रखा था अन्यथा कुछ भी हो सकता था। फिर उन्होंने विस्तार से अपनी बात कहते हौए कहा कि हमारे साढ़ू भाई की लड़की का सगाई समारोह था उसमें शामिल होने के लिए उनकी ओर से बहुत आग्रह किया गया था। उनकी लड़की बार बार फोन कर के कह रही थी मौसाजी आपका आना जरूरी सै आप नहीं आओगे तो मैं भी कार्यक्रम नहीं होने दूँगी इसी तरह की बात उनका लड़का भी कर रहा था बड़ सास बी...

व्यंगय : निनयानवे का फेर

धन कमाने के अंधे मोह ने इंसान को इंसान के प्रति बड़ा क्रूर और निर्मम बना दिया है जज्बातों की कोई कीमत नहीं रह गई है। दफ्तर में रिश्वत लेता कर्मी इस पर तनिक भी विचार नहीं करता कि उसे जो सरकार वेतन दे रही है वो पर्याप्त है। एक ऑफिस के बाबू जिनको नब्बे हजार रुपये वेतन मिल रहा था वे मात्र तीन हजार रुपये की रिश्वत लेते हुए पकड़ा गए। और अपनी नौकरी से हाथ धो बैठे। जेल की हवा खाकर आने के बाद अब तनकी हालत बड़ी दयनीय हो गई जिनके लिए वे अनुचित तरीके से धन कमाकर उनकी मौज करा रहे थे उन्होंने उन्हें दो वक्त की रोटी देने से बी इंकार कर दिया और घर से निकाल दिया फिर भी इंसान सबक नहीं लेता रिश्वत लेने वाले पकड़ा जाते हैं फिर भी बाकी रिश्वत लेने वाले रिश्वत लेने से बाज नहीं आते। वो बात अब पुरानी हो गई जिसमें कहा जाता था कि रिश्वत लेते हुए पकड़ा गए तो रिश्वत देकर छूट जाएँगे लेकिन सोशल मीडिया के दौर में अब यह संभव नहीं है। रिश्वत लेकर अकूत धन कमाने वाले एक वरिष्ठतम अधिकारी पकड़ा गए । मामला रफा दफा कराने में सब कुछ चला गया सारा पैसा गहने जेवर चले गए फिर भी सजा से नहीं बच सके। वे ही वरिष्ठतम अधिकार...

व्यंग्य: पुस्तक प्रकाशन का जुनून

एक ओर जहाँ प्रकाशकों की भरमार हो गई है ।दूसरी ओर पुस्तक प्रकाशित कराने वालों की अच्छी संख्या भी हो गई है। महीने का ऐसा कोई रविवार खाली नहीं जाता जब किसी पुस्तकका कहीं विमोचन समारोह न हो ऐसे आयोजनों में एक जैसे दर्शक दिखाई देते हैं । मंच पर बैठी हुए एक जैसी बड़ी हस्तियाँ और?समीक्षक भी वही छँटे छँटाए एक समीक्षक अपनी समीक्षा में जाने कितवी किताबों को कालजयी सिद्ध कर चुके हैं। हर रविवार किसी न किसी किताब को कालजयी कृति बताते ही रहते है पुस्तक लेखक की तुलना बड़े साहित्यकारों से करने लगते हैं जिसकी पुस्तक का विमोचन हो रहा होता है उनका गुरूर देखने लायक होता है दर्शचों का ज्यादातर ध्यान कार्यक्रम के अंत में मिलने वाले स्वल्पाहार अथवा सहभोज पर अधिक होता है उसमें कई तो ऐसे होते हैं जो पूरे परिवार के साथ आते हैं और मुफ्त के डिनर का आनंद लेते हैं। गए रविवार महेश विज्ञ जी की चौथी पुस्तक का विमोचन हुआ था उसमें वे खर्च हुए पैसे का हिसाब लगा रहे थे। जिसमें उनके पूरे चार लाख रुपये खर्च हो गए थे आधे पैसे तो समारोह में तथा अतिथियों की आवभगत में ही खर्च हो गए थे महेश जी समारोह की तैयारियों मे...

व्यंग्य: चुटकुलेबाज बनाम नीरस उबाऊ कवि

नीरज क्लिष्ट जी नगर के स्वनामधन्य वरिष्ठ कवि थे जो अपनी नीरस और उबाऊ कविताओं के लिए कुख्यात थे उन्हें इसी बात का दुख था कि उनकी कविता का पारखी कोई पैदा ही नहीं हुआ था । यह बात सुनकर कोई कह दे कभी पैदा भी नहीं होगा तो वे सुनके भड़क जाते थे। एक बार किसी ने उनसे कह दिया कविता सुनाकर हम पर अत्याचार करने वाले आपकी कविता तो हमारे सिर से गुजर गई हम तो इसकी एक पंक्ति का अर्थ समझने में भी नाकामयाब रहे। आप ही अपनी कविता का अर्थ समझा दीजीहिए इस बात पर वे झगड़े पे उतारू हो गए । किसी ने कह दिया पूरी कविता नहीं एक पंक्ति का ही अर्थ बता दो। पर वो अर्थ बताने को तैयार नहीं हुए। क्लिष्ट जी का अगर सबसे बड़ा कोई दुश्मन था तो वे थे हास्य कवि अजय प्रफुल्ल जी । अजय प्रफुल्य जी हमेशा श्रोताओं से घिरे रहत थे। और हँसी ठहाकों से भरा माहौल हो जाता था। क्लिष्ट जी अजय जी को कवि कुल का कलंक कहते थे। अजय जी निर्विवाद रंप से चुटकुले बाज थे कवि तो वे क्लिष्ट जी जैसे कवियों के प्रकोप से बचने के लिए बन गए थे। एक ओर अजय जी चुटकुले परोस परोस कर अच्छा खासा रुपया कमा रसे थे दूसरी तरफ कथित कालजयी कविताओं के रचय...

व्यंग्य: आदतन बुरा चाहने वाले

कुछ लोग आदतन बुरा चाहने वाले सोते हैं वे किसी का भला होते हुए नहीं देख सकते ऐसे लोगों को किसी को मिटता हुआ देखकर बड़ा मज़ा आता है । यह झूठी सहानुभूति दिखाने में भाहिर होते हैं जबकि भीतर?भीतर वे ख़ुशी से गदगद हो रहे होते हैं तब इनसे बड़ा दुखी दुनिया कोई नहीं लगता जब इनके ऊपर कोई आफ़त आ जाती है यह भावना शून्य लोग होते हैं इनका हर्दय पत्थर से भी ज्यादा कठोर होता है। रवि बाबू ने बहुत?बढिया मकान बनवाया था यह देखकर उनके पड़ोसी दिनेश के सीने पर साँप लोट रहा था रवि जी मकान के समने उनका मकान झुग्गी झोपड़ी की तरह लग रहा था रवि जी के गृह प्रवेश उत्सव की भव्यता को दिनेश सह नहीं सके और अकेले में जाकर फूट फूट कर रोते रहे थे उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं था कि रवि जी ने कितनी मुश्किल से मकान बनाया गले गले तक कर्जे में डूब गए पाई पाई जोड़कर पैसे इकठ्ठे किए । दिनेश को दो साल बाद ख़ुश होने का मौका मिला जब रवि जी के मकान को गिराने के लिए बुल्डोजर आया दर असल हुआ यह था कि जिस पर मकान बना था वो प्लॉट विवादित था और प्रतिपक्ष केस जीत गया था। इधर रवि जी का मकान जमींदोज हो रहा था उधर दिनेश का ह्रदय खुश...

व्यंग्य: गुरू घंटाल की सेवा का कड़वा फल

यह सत्य?है कि अच्छे गुरू और अच्छे उस्तादों की कभी कमी नहीं रही किसी शिष्य को अच्छे गुरू मिल?जाएँ उससे बड़ा कोई सौभाग्यशाली नहीं होता। मगर यह अच्छे गुरू या तो मिलते नहीं या ढूँढते नहीं अच्छे गुरू के साथ साथ अच्छा शिष्य भी होना जरूरी है पर होता यह है कि अच्छे शिष्य को गुरूघंटाल टाइप के गुरू मिल?जाते हैं और वे शिष्य का समय तथा पैसा बर्बाद करते रहते हैं। दसरी ओर खराब शिष को अगर अच्छे गुरू मिल भी जाएँ तो भी उस शिष्य का भला नहीं हो पाता ऐसा शिष्य अपने गुरू की सख्ती को सह नहीं पाता और छोड़कर चला जाता है। एक अच्छे शिष्य रवि ने पूरे दो साल एक गुरंघंटाल से गिटार सीखने में गँवा दिए उस कथित गुरू ने पैसे खूब वसूले खूब सेवा भी ली और सिखाया कुछ भी नहीं। हारकर उस शिष्य ने गुरू का साथ छोड़ दिया उसने क्या साथ छोड़ा गुरू ने ही उससे यह कहकर किनारा कर लिया कि तुम गिटार कभी नहीं सीख सकते कोई दूसरा काम धंधा करो संगीत तुम्हारे वश का नहीं उस शिष्य ने भी उनकी बात सत्य मानकर गिटार?बजाना छोड़ दिया आखिर में गुरं घंटाल ने उस शिषूय का मँहगा गिटार मुफ्त में ऐंठ लिया और उसे मँहगे दामों पर अपने एक मासूम नवजात श...

व्यंग्य: लाठी की महिमा

आज के युग भी लाठी की अहमियत से कोई इंकार नहीं कर सकता। यह निर्विवाद सत्य है कि लाठी मनुष्य का सबसे प्राचीन हथियार हैं लाठी को लेकर कई कहावतें प्रचलित है। जिसकी लाठी उसकी भैंस । अंधे की लाठी बुढ़ापे की लाठी आदि। पहले दबंग लोग लठैत लेकर चलते थे आज के दौर में लाठी का रूप थोड़ा बहुत बदल गया है पर?आज भी साधारण लाठी की उपयोगिता बनी हुई है । चार मित्र सुबह की सैर को जा रहे थे रास्ते में उन्हें एक बिगड़ैल साँड मिल गया उसने सुखलाल जी को छोडकर सब पर हमला कर दिया सुखलाल जी ने उनको जैसे तैसे बचाया। आगे चलकर एक गली का कुत्ता उन्हें देखकर गुर्राने लगा वो सुखलाल को छोड़कर तीनों पर भौंक रहा था वे तीनों सुखलाल के पीछे छिपकर बचे । सुखलाल जी ने उस कुत्ते को डराकर भगा दिया। सुखलाल जी में ऐसा क्या था ? आप सही समझे उनके पास लाठी थी जिसका सहारा वे अक्सर चलने में लेते थे । आप किसी पुलिस के जवान की बिना लाठी के ड्युटी करने की कल्पना तक नहीं कर सकते आज भी पुलिस आक्रामक भीड़ को लाठी से ही काबू में करती है। बंदूक और कई घातक हथियारों के बाद भी लाठी का महत्व कम नहीं हुआ है।पशुपालकों का काम तो आज भी लाठी के बिना ...

व्यंग्य: बारिश की मौज के पीछे का छिपा दुख

तालाब के किनारे पानी की उठती हुई लहरों का लुत्फ लेते वाले लोग भुट्टे खरीद कर खाते रिमझिम फुहारों में थोड़ी देर के लिए कार से निकलकर भीगते लोग उनका दुख कभी नहीं समझ पाते जिनके लिए बरसत आफत बनकर टूप पड़ती है। तीन दिन की घोर बारिश के बाद नदी उफान पर आ गई थी इस दृश्य को देखने के लिए लोगों की भीड़ इकठ्ठी हो गई थी कई खाने पीने की दुकाने लगी थीं एक छोटी दुकान पर मक्के की फुली एक सत्तर वर्षीय बुजुर्ग बेच रहे थे वे परेशान थे उनसे किसी ने पूछ लिया तो उन्होंने बताया कि तीन दिन की बारिश ने राशन खत्म कर दिया कल रात से पूरा परिवार भूखा है उधार फूली के पैकेट लाकर बेच रहा हूँ अभी तक चालीस रुपये की बचत हुई है अगर तीस रुपये की बचत और हो गई तो घर में आज सब्जी रोटी बन जाएगी वरन नमक से रोटी खाकर गुजारा करना पड़ेगा। उनकी मजबूरी का फायदा एक रील बनाने वाले ने उठाया उनके हाथ में पन्द्रह सौ रुपये देकर रील बनवाई आटा सामान तथा तिरपाल देते हुए फोटो खिचवाई और रील बनाने के बाद सब वापस लेकर पचास रुपये देकर चलते बने वे बुजुर्ग पचास रुपये पाकर ही खुश हो गए और रील बनाने वाले वीडियो अपलोड कर लाखों वीयू लाइक बटोर च...

व्यंग्य: मतलबी अपने वाले

पुराने नैतिक मूल्यों के क्षरण के इस दौर ऐसे मतलबी लोगों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है जो बिना मतलब के किसी से किसी प्रकार का कोई रिश्ता नहीं रखते। जिससे इनका मतलब होता है उसका थूक तक झेलने को तत्पर हो जाते हैं यह फिर पक्के सेवा भावी बन जाते हैं इनका सेवाभाव देखने लायक होता है ।सामने वाला इनको चाहे जुतियाए चाहे गरियाए चाहे इनकी लाख बेइज्जती कर दे पर इनके चेहरे की मुस्कुराहट में परिवर्तन नही होता ।यह सब मतलब रहने तक सीभित रहता है ।मतलब निकल जाने पर यह लोग फिर उस तरफ मुड़कर भी नसीं देखते ये लोग पक्के अहसान फरामोश होते हैं ये चापलूस लोग योग्य लोगों के हकों पर डाका डालने में जरा भी संकोच नहीं करते। जब यह बात हम अपने मित्र दिनेश से कर रहे थे तब करन खेड़ा गाँव के सरपंच हमारी बात बड़े गौर से सुन रहे थे वे हमारे पास आए और बोले आप बिल्कुल सही कह रहे हो ऐसे एक मतलबी अपने वाले से मैंने मुश्किल से पीछा छुड़ाया है उसने मेरी छवि का बहुत नाजायज फायदा उठाया यह सुनकर?हमारी जिज्ञासा बढी तब उन्होंने विस्तार से बताया हमारा सगा साला है बाबूलाल जो आजकल जेल की हवा खा रहा है । तीन साल पहले वो ह...

ऊँची नीची फाँकने वाले(व्यंग्य)

ऐसे बहुत से लोग हैं जिनकी जेब में चाय पीने तक के पैसे नहीं होते लेकिन बातें ऐसी करते हैं जैसे वे खानदानी रईस हों। घर में नहीं हैं दाने और अम्मा चली भुँजाने वाली जैसे दिखावा करने वाले नमक डालकर उबला हुआ दलिया खाकर आकर यह कहते हैं कि वे खीर खाकर आ रहे हैं। इनसे बातों में कोई जीत नहीं सकता। इनकी बड़े बड़े नेताओं से पहचान होती है। सारे फिल्मी कलाकारों से इनका याराना निकलता है। इनका खानदान बहुत ऊँचा है। इनकी हवेली इतनी ऊँची है कि अगर उसे सिर उठाकर देखो तो सिर की टोपी गिर जाए। ऐसी झूठी बातें करने में इन्हें जरा भी संकोच नहीं होता। ऐसा ही एक खानदानी रईस ऊँचे खानदान का बड़ी हवेली वाला फेंकू एक प्राइवेट अस्पताल में बारह हजार रुपये महीने पर वार्ड ब्वाय की नौकरी कर रहा था। पन्द्रह सौ रुपये के एक किराये के मकान में अपने चार बच्चों के परिवार के साथ रह रहा था। बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ रहे थे जो दोपहर का खाना स्कूल में खाकर आते थे और जिस दिन उन्हें छुट्टी मिलती थी उस दिन उन्हें घर पर भी खाना नहीं मिलता था। उसका नाम राकेश था आज चाय की गुमठी वाले से उसकी जोरदार बहस हो रही थी। उसकी चार चाय के...

व्यंग्य: सहानुभूति का लाभ लेने वाले

एक तरफ जहाँ दान धर्म दया करने वाले लोगों की कमी नहीं तो दूसरी ओर इसका लाभ उठाने वालों की भी कमी नहीं हैं कई दिव्यांग स्वाभिमानी होते हैं तो वे मेहनत से धन कमाकर अपना पेट भरते हैं जबकि कई चपल चालाक लोग नकली दिव्याँग बनकर भीख माँगते नजर आते हैं और अच्छी खासी रकम कमा लेते हैं। इनमें चंदा लेकर मजा करने वालों की भी अच्छी खासी संख्या है। ऐसे ही एक सहकारी विभाग में नौकरी कर रहे प्रकाश ने बताया कि वो दैनिक वेतन भोगी के रूप भें नौकरी में आए थे इसके लिए उन्होंने जो हथकण्डा अपनाया वो जानकार हमें भी लगा कि अपना मतलब हल करने के लिए कोई इतना भी गिर सकता है वो बड़े साहब के पास गए तो बोले मैं अनाथ हूँ। बडी मुश्किल से मैंने पढ़ाई कि थोड़ी आपकी मेहरबानी हो जाए इसके साथ ही उन्होंने साहब के घर के चक्कर लगाने शुरू कर दिए। हारकर या तरस खाकर साहब ने उन्हें दैनिक वेतन भोगी बना लिया इसके बाद तो उन्होंने अपनी जड़ जमा ली और जल्दी परमानेन्ट भी हो गए फिर उन्होंने अपनी शादी में खूब दहेज लिया नौकरी करने वाली लड़की से शादी की खुद क्लर्क थे पर अपने आपको इंजीनियर बताया तथा लड़की वाले से जी भर के रुपये ऐंठे।...

व्यंग्य: मुगालता पालकर बैठे हुए

जो सामर्थ्यवान है हुनरमंद हैं उन्हें अपने आप पर विश्वास है वो कभी मुगालता नहीं पालते जो मुगालता पालते हैं उनमें सिवाय?मुगालते के और कुछ नहीं होता यह लोगों पर झूठा रौब जमाने का असफल प्रयास करते हैं। ये किसी का भी बड़े से बड़ा काम चुटकियों में कराने का दावा करते हैं जो ये कभी नहीं करा पाते एकाध बार लोग इनके शिकार भी हो जाते हैं । इसके बाद फिर उनकी बातों के जाल में नहीं फँसते। ऐसे ही एक मुगालता पाले हुए दिनेश जी हैं उनकी पत्नी एक स्कूल में टीचर है वे खुद एक धेला बी नहीं कमाते पर बाते लाखों करोडों की करते हैं। अनजान लोग उनकी बात सुनकर उन्हें धन कुबेर समझ बैठते हैं जबकि उनकी जेब में सिंगल चाय के भी पैसे नहीं होते चाय वाला उन्हें उधार में चाय तक नहीं देता कभी कोई अक्ल का अंधा और गाँठ का पूरा इनके जाल में फँस जाए तो यह तब तक उसके धन पर मजे करते हैं। जब तक उस पर इनकी असलियत न खुल जाए असलियत खुलते ही वो इनसे कन्नी काट लेता है और ये दूसरे शिकार की खोज में जुट जाते हैं। ऐसे लोगों की न घर में इज्जत होती है न मोहल्ले में और ना ही बाज़ार में। ये अपना प्रचार खुद करते हैं चुनाव के समय दिनेश जी न...

व्यंग्य: गरीबो॔ के गुरूजी

आज के युग में गुरुजनों का सम्मान केवल दिखावा बनकर रह गया है कभी शिष्य की पहचान उनके गुरूजनों से होती थी आज गुरूजनों की पहचान शिष्यों से हो रही है। जिन गुरूजनों के पढाए हुए शिष्य ऊँचे पदों पर हैं या राजनीति के महारथी हैं उन गुरूजनों का सम्मान तो फिर भी बचा हुआ है पर जो गरीबों के गुरूजी हैं उनकी प्रतिष्ठा तो न के बराबर है उनमें से कई तो अपमान सहने के आदि हो गए हैं। कई अधिकारी तो इन गरीबों के गुरूजियों से बहुत बुरा व्यवहार करते हैं और तो और ऐसे अधिकारियों के चपरासी भी अपने आपको इन से खूब ऊँचा समझते हैं। सुरेश जी एम एस सी बी एड करने के बाद सरकारी स्कूल में अतिथि शिक्षक के पद पर कार्यरत थे यह गरीबों के गुरूजियों का गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले वर्ग के लोगों जैसा तबका है। इनका सम्मान तो न के बराबर है। सुरेश जी एम एस सी टॉपर हैं बी एड में गोल्ड भेडल प्राप्त किया है फिर भी उन्हें उसी स्कूल के थर्ड डिवीजन से बी ए पास प्रधाना ध्यापक अपने चपरासी से भी कमतर समझते हैं क्योंकि चपरासी का वेतन अतिथि शिक्षक के वेतन से कई गुना ज्यादा है वे विभाग के स्थाई कर्मचारी हैं।। दूसरे गरीबों के गुरू...

व्यंग्य : आंदोलन का सच

नगर पालिका अध्यक्ष के खिलाफ आंदोलन चल रहा था आंदोलन का नेतृत्व करने वाले भैयालाल जी जुझारू नेता के रूप में प्रसिद्ध हो चुके थे आंदोलन के पाँचवे दिन नपाध्यक्ष जी ने भैयालाल जी को बुलाया और कहा तुम्हारी छवि बन गई वे बोले हाँ बन तो गई तो खत्म करो आंदोलन भैयालाल जी ने कहा दो दिन और रुक जाइए इसके बाद आंदोलन खत्म हो जाएग उसमें आपका और?हमारा दोनों का लाभ होगा। दर असल जो आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे वे कथित जुझारू नेता नपाध्यक्ष के ही आदमी थे उन्हीं के इशारे पर आंदोलन हो रहा था दो दिन बाद लोगो की सारी माँगे मान ली गईं और आंदोलन खत्म हो गया। भैयालाल जो को इसका लाभ यह मिला कि वे पार्षद का चुनाव भारी मत से जीत गए और नपाध्यक्ष के सहयोग वे नपा के उपाध्यक्ष बन गए अब दोनों मिलकर जनता को चूना लगा रहे हैं और?जनता अपने आपको लुटी ठगी समझ रही है। शहर में इस तरह के आंदोलन वीर बहुत से नेता हैं जो इसकी आड़ में अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं यही लोग फिर दलाल बनकर रिश्वत खोरों की दलाली करते हैं तथा मौज उड़ाते है ये कथित जो जन हितैषी लोग हैं उनका जनता के हितों से कोई लेना देना नहीं बस उनका काम बनता रहे बाकी सब ...

व्यंग्य: झूठे सपने दिखाने वाले

झूठे सपने दिखाकर अपना मतलब हल करने वाले बहुत लोग हैं इनमें न कोई गुण है न हुनर बस बात बनाने में ये माहिर हैं। ये लोग झूठे प्रलोभन दिखाते हैं झूठे दावे करते हैं और लोग इनकी बातों में आकर अपना समय और पैसा गँवा बैठते हैं किसी को ग्रहों की महादशा का भय दिखाकर तो किसी को भविष्य की दुर्घटनाओं का झूठा डर दिखाकर उनकी शांति के उपाय के नाम पर भारी रेंकम ऐंठने में इन्हें जरा भी संकोच नहीं होता। इन पर नकेल कसने वाला कोई नहीं होता और ये बेलगाम होकर अपनी भनमानी करते रहते हैं। ऐसा ही एक उदाहरण याद आ रहा है निकट के एक शह से हर शनिवार को कुछ लोग ट्रेन से भोपाल आकर दिन भर भविष्य बताने ग्रहदशा सुधारने के नाम पर खूब पैसा कमाकर रात की ग्यारह बजे की ट्रेन से वापस अपने नगर को लौट जाते थे इनमें से ज्यादातर लोग कम पढ़े लिखे छोटे मोटे काम करके अपना जीवन यापन करने वाले होते थे शनिवार को ये अपना स्वरूप बदल देते थे कोई उन्हें देखकर यह अंदाजा ही नहीं लगा सकता था कि पढ़े लिखों को मूर्ख बनाने वाले ये लोग खुद लगभग अनपढ़ हैं । इसमें से एक ने शहर के बड़े अधिकारी की पत्नी को अपनी बातों के जाल में उलझाकर पच्च...

भ्रष्टाचार के धन से बने दानवीर (व्यंग्य)

ऐसे बहुत से लोग हैं जो भ्रष्टाचार से धन कमा रहे हैं। इसमें हर वर्ग के लोग शामिल हैं। अनुचित तरीके से धन कमाने वाले कुछ लोग खुलकर दान करते हैं और दानवीर बने हुए हैं। यह समाज इतना असंवेदनशील हो गया है कोई उनकी निंदा भी नहीं करता। यह बेहद दुखद है कि समाज ने भ्रष्टाचार को स्वीकार कर लिया है। लोग जब तक भ्रष्टाचारी को धन नहीं दे देते तब तक उन्हें अपने काम होने पर विश्वास ही नहीं होता और इसका उन्हें अफ़सोस भी नहीं होता। वे रिश्वत लेना नहीं छोड़ते चाहे इसके बदले उनकी नौकरी ही क्यों न चली जाए। अगर जेल भी हो जाए तो उन्हें इस बात का अफसोस नहीं होता की उन्होंने रिश्वत क्यों ली। शहर में होने वाले कई आयोजनों में इनके द्वारा दिए गए दान का बड़ा योगदान रहता है। ऐसे आयोजक इन भ्रष्टाचारियों की ढाल बनकर खड़े हो जाते हैं। इनके बीच में ईमानदार का रहना बड़ा मुश्किल है। एक कमाऊ विभाग के एक ईमानदार बाबू पिछले दस सालों से लूपलाइन में पड़े हुए थे। ये सजा उन्हें उनकी ईमानदारी के कारण मिली थी जिसे उन्होंने बेहिचक स्वीकार कर लिया था। ऐसे ही एक राकेश जी भी थे जो एक कमाऊ विभाग में अधिकारी के पद पर थे। ज...

व्यंग्य : समाज सुधारने की चिंता में मोटे हुए लोग।

वो ज़माना कब का बीत गया जब समाज सुधार का काम करने वाले समाज सेवी दुबले पतले होते थे वे लोग अपना घर बार खेती बाडी सब कुछ बेचकर समाज सेवा करते थे । यह नया दौर है। इस दौर में कई समाज सेवी समाज सेवा करते करते खूब मुटिया गए हैं ।कई तो गरीबी रेखा को पार करके अमीरों की जमात में शामिल हो गए हैं ऐसे लोगों ने बेशकीमती जमीन हडप ली है सरकारी मकान हासिल कर लिया है। हर साल लाखों रुपयों का अनुदान हड़प जाते हैं हैं और मुफ्त का माल खाकर मुटिया जाते हैं इनकी समाज सेवा के कारण गंदी बस्तियाँ सलामत हैं गरीबों की अच्छी खासी संख्या है।जो इन्हें समाज सेवा का अवसर प्रदान करती है। शहर के एक समाज सेवी ने समाज सेवा के नाम पर शहर की बेशकीमती दो एकड़ जमीन हथिया ली थी और शानदार सरकारी बंग्ला भी एलाॅट करा लिया था आज उस जमीन से हर महीने वे लाखों रुपये कमा रहे थे निराश्रित भवन होटल में बदल गए थे सभागृह शादी हाल में और?गरीबों के लिए बनाई रसोई में भोजनालय चल रहे थे इसके नाम पर शासन से उन्हें लाखों रुपयों का अनुदान भी मिल रहा था वे शहर के वी वी आई पी थे उनके खिलाफ कोई कुछ बोल नहीं सकता था । समाज सेवा के क्षेत...

व्यंग्य : अहंकार के पहड़ पर बैठे हुए लोग

पाँच हज़ार वर्ग फीट की कोठी में अकेले रहने वाले सेवानिवत्त वरिष्ठ अधिकारी वर्मा जी की मौत अपने बेडरूम में हो गई थी उस समय?उनके पास कोई नहीं था तीन दिन बाद जब अखबार वाले को कुछ संदेह सुआ तब पुलिस को सूचना दी गई तब कहीं उनका शव निकाला गया शव मर्चूरी में रखा था उनका बड़ा बेटा आलोक जर्मनी में नौकरी कर रहा बेटी प्राची आस्टूरेलिया में नौकरी कर रही थी जब उनको यह सूचना दी गई तो उन्होंने साफ शब्दों में कह दिया कि हम नहीं आ सकते उनके पड़ोसियों से किसी प्रकार के कोई संबंध नहीं थे वे हद दर्जे के अहंकारी थे हारकर पुलिस तथा नगर निगम को उनका अंतिम संस्कार लावारिस की तरह करना पड़ा न उनकी तेरहवीं हुई न कोई पूजा पाठ उनकी मौत की कहीं कोई चर्चा भी नहीं हुई थी। वर्मा जी बड़े अक्छड़ अधिकारी थे उन्हें कभी किसी ने हँसते नहीं देखा था अपने बच्चों से भी वे बात नहीं करते थे उनके दोनों बच्चे उनकी पत्नी माया से भी बात नहीं कर पाते थे वो किटी पार्टी तथा पार्टियों एवं क्लब में रमी रहती थी बच्चों का उनसे कोई भावनात्मक लगाव नहीं था । उन्होने बच्चे को मँहगे तथा सबसे अच्छे स्कूलों में पढ़ाया जहाँ संस्कारो...

व्यंग्य: काम बिगाड़ने वाले लोग

दूसरों का बनता हुआ काम बिगाड़ने वाले लोगों की दुनिया में कोई कमी नहीं है ऐसे लोगों में कुई बार अपने खास सगे संबंधी यहाँ तक की दोस्त भी शामिल होते हैं यह जब आमने सामने होते हैं तो एक दूसरे से बडी गर्मजोशी से मिलते हैं उन्हें देखकर कोई यह अंदाज नहीं लगा सकता कि यह एक दूसरे के घोर?दुश्मन है तथा नीचा दिखाने का कोई अवसर नहीं छोड़ते पुराने ज़माने का भाईचारा खत्म होता जा रहा है उसके स्थान पर स्वार्थ के रिश्ते बनने लगे हैं जिसमें सच्चे प्रेम की कमी होती है। शहर की एक कॉलोनी में प्रेम नारायण जी ने एक मकान खरीदा जिसकी भनक उन्होंने किसी को भी नहीं लगने दी उसी कॉलोनी में उनके निकटतम संबंधी ओम प्रकाश जी भी रहते थे । प्रेम नारायण जी जब गृह प्रवेश की तैयारियाँ कर रहे थे तब ओम प्रकाश को पता चला कि यह घर उन्होंने खरीद लिया है तो उनके कलेजे पर साँप लोट गया उन्हें इसी बात का दुख था कि इसकी खबर उन्हें पहले क्यों नहीं लगी अगर लग जाती तो वो यह घर प्रेम जी को कभी खरीदने नहीं देते जिस भाव में प्रेम जी ने ये घर खरीदा था उस भाव को सुनकर तो उनकी बेचैनी ओर अधिक बढ़ गई वो घर उनके घर से काफी बड़ा और अच्छा...

व्यंग्य: बातों की कमाई खाने वाले

भैयालाल जी ने दसवीं में तीन बार फेल होने तथा पिताजी द्वारा नकारा निकम्मा और धरती का बोझ बनने वाला प्रमाण पत्र लेने के बाद अपने केरियर की शुरूआत की थी आज भैयालाल शहर के  संपन्न एवं दमदार लोगों में गिने जाते थे।  जबकि भैयालाल जी के पिताजी अपनी पेंशन से  अपने बड़े  होनहार एम बी ए पास बेटे  हरिलाल का परिवार भी पाल रहे थे हरिलाल को होनहार बेटे का प्रमाण पत्र भैयालालजी के पिताजी ने ही प्रदान किया था।  हरिलाल एम बी ए करने के बाद भी पन्द्रह हजार रुपये महीने की नौकरी कर रहा था । वो नौकरी भी भैयालाल जी के रहमो करम पर उसे मिली थी जबकि भैयालालजी लाखों रूपया महीना कमा रहे थे। भैयालाल जी को आठ साल पहले पिताजी ने  नकारा कहकर घर से निकाल दिया था तथा उससे अपने सारे संबंध तोड़ लिए थे क्योंकि जब भैयालाल जी ने तीसरी बार भी  दसवीं फेल की थी तब हरिलाल ने  अस्सी प्रतिशत अंकों से हायर सेकेण्डरी परीक्षा पास की थी।  ऐसे में भैयालाल जी उन्हें कुल का कलंच नजर?आ रहे थे। घर से निकाले जाने पर भी भैयालाल जी को जरा भी दुख एवं अफ़सोस नहीं था। भैयालाल जी हद दर्जे के ...

व्यंग्य: महत्वाकाँक्षा के गुलाम

अपनी अहमियत को दिखाने के लिए कई बार कुछ लोग हद से गुजर जाते हैं ऐसे लोग अपनी ही महत्वाकांक्षा के गुलाम होती है जो झूठी अहमियत उनके पास होती है उसे बनाये रखने के लिए ये लोग ओछे हथकंडे अपनाने भें पीछे नहीं हटते इनमें से ज्यादातर लोग योग्य नहीं होते लेकिन योग्य लोगों के हक पर डाका डालकर बैठे रहते हैं इनकी सारी शक्ति जीवन की सारी ऊर्जा इसी एक काम भें खर्च हो जाती है। इसे उदाहरण के रूप में कहें तो विपुल और अखिल दो अलग अलग व्यक्ति हैं। जिसमें विपुल अपना कार्य पूरी मेहनत ईमानदारी और लगन से काम करता है जब तक काम परफेक्ट न हो जाए तब तक संतुष्ट नहीं होता जबकि विपुल अपना काम इतनी अच्छी तरह से नहीं करता पर जो करता है उसको श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए हर तरह के हथकण्डे अपनाता है खूब प्रचार करता है और कुछ झूठी तारीफें कुछ झूठे सम्मान पत्र कुछ फर्जी टिप्पणियाँ पाकर अपनी महत्वाकांक्षा को पुष्ट करके खुश हो जाता है वो विपुल को हिकारत से देखता है उसकी मेहनत को नजर अंदाज करता है। उसे अच्छे प्लेट फार्म पर पहुँचने नहीं देता। विपुल को चापलूसी करना नहीं आती जबकि अखिल चापलूसी करने में माहिर है। लेकिन वक्त त...