सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

जून, 2024 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कहानी: दूसरी क्रूर माँ

अमित अपनी सौतेली माँ अनीता का बुढ़ापे में सगे बेटे से बढ़कर ख्याल रख रहा था। अनीता का सगा बेटा तो उसे  उज्जैन रेल्वे स्टेशन पर छोड़कर चला गया था अनीता एक रात और पूरे दिन उसके आने की प्रतीक्षा करती रही थी भूख और प्यास से उसका बुरा हाल हुआ था अमित  अपने मित्र को रोहन को छोड़ने रेल्वे स्टेशन पर आया था तब उसने माँ को घबराई हुई हालत में स्टेशन की बैंच पर बैठे देखा था। वहाँ से वो माँ को अपने घर ले आया था आज माँ को पूरे पाँच साल हो गए थे अमित के पास रहते वो रोज अमित और उसकी अमिता को खूब दुआएँ दिया करतीं थीं अब उनकी उम्र अठहत्तर वर्ष होने जा रही थी। अमित के पिता दौलतराम जी का निधन हुए आठ वर्ष हो गए थे। अमित को अच्छी तरह से याद है जब वो सात वर्ष का था तब उसकी सगी माँ नीता का डिलेवरी के दौरान निधन हो गया था। जब वो आठ वर्ष का हुआ तब उसके पिता दौलतराम जी ने अनीता से शादी कर ली अनीता ने अमित को तीन साल तक तो अच्छे से रखा फिर जब उसके बेटे सुमित का जन्म हुआ तो उसकी सारी ममता अपने सगे बेटे तक सिमटकर रह गई थी छः महीने तक सुनीता ने अमित के ऊपर वो अत्याचार किए ...

कहानी: निगेटिव एक्शन

शाला प्रभारी वृंदावन लाल राय को रिटायर हुए छः महीने भी नहीं हुए थे और स्कूल की सारी व्यवस्थाएँ बुरी तरह गड़बडा गईं थीं वर्तमान शाला प्रभारी को आज सस्पेण्ड कर दिया गया दो शिक्षिकाएँ पहले ही निलंबित हो चुकीं थीं एक शिक्षक लंबे अवकाश पर चले गए थे चपरासी ने अपना तबादला कहीं और करा लिया था। स्कूल से बच्चे धड़ाधड़ टी सी निकलवाकर दूसरे स्कूल में प्रवेश ले रहे थे। वृंदावनलाल जी जब इस विद्यालय में पदस्थ थे तब इसी स्टाफ ने उन्हें बहुत परेशान किया था उस समय उनके स्टाफ में सात शिक्षक और एक चपरासी कार्यरत थे उनमें दो सर थे पाँच मेडम थीं चपरासी भी महिला ही थी। वृंदावन लाल और जो सर थे उनका नाम मोहन लाल थे वे ऑफिस का और व्यवस्था का काम देखते थे जो मेडम थीं उनके जिम्मे पढ़ाने के अलावा और कोई काम नहीं था उसका निर्वहन भी वो ठीक से नहीं करती थीं प्रभारी को समायोजन में बड़ी परेशानी आती थी तीन साल पहले जब वृंदावन सर शाला प्रभारी बने थे तब शाला के शौचालयों की सफाई की व्यवस्था सभी शिक्षकों के आर्थिक सहयोग से होती थी  परिसर की सफाई  चपरासी सफाई कर्मी को अपनी तनख्वाह से पैसे देकर कराती थी वही...

कहानी: तीन बेटों के पिता

सेठ हरलाल को उनके तीनों बेटों ने बहत्तर साल की उम्र में घर से निकाल दिया था उनके मकान दुकान जमीन जायदाद रकम जेवर नगदी सब पर बेटों ने अधिकार कर लिया था उनकी पत्नी कमला के स्वर्गवास के बाद सेठ जी के सीधेपन का लाभ उठाकर बेटों तथा बहुओं ने उनका सब कुछ हड़प लिया था। घर से निकाले हुए उन्हें आज छः वर्ष हो गए थे वो उसी मोहल्ले में मंदिर के पास बने मकान के एक कमरे में किराये से रह रहे थे भगवान का भजन गाते उसी से उनको जो मिल जाता उसमें गुजारा कर लेते थे।  सेठ हरलाल के बेटे कुटिल कपटी कठोर थे लेकिन मोहल्ले के लोग बुरे नहीं थे वे दिन में सिर्फ एक बार भोजन करते थे और वह भोजन उन्हें कहीं न कहीं से मिल जाता था। उनके पास एक हारमोनियम था उनके कमरे से चंद कदम दूरी पर शिव जी का मंदिर था सेठ हर लाल शाम को दो घंटे अपने घर की दालान में बैठकर हारमोनियम पर भजन गाते थे भजन वो पूरी तन्मयता से मधुर स्वर में गाते मंदिर पर सुबह शाम भक्तों की भीड़ लगी रहती थी। जो भक्त मंदिर आते वे दर्शन कर सेठ हरपाल जी के भजन जरूर सुनते और बदले में उन्हें कुछ रुपये देकर अवश्य जाते थे कई तो उनके भजनों को घंटों सुनते रहते थे फिर...

कहानी: शादी

सानिया की शादी को पाँच साल हो गए थे उसके पति रवीश  जिला कोषालय अधिकारी थे। वे एक बड़े सरकारी बंग्ले में रहते थे आज उनकी शादी की पाँचवी सालगिरह मनी थी कार्यक्रम में शहर के गणमान्य नागरिक शामिल हुए थे कलेक्टर साहब भी आए थे। आयोजन की सफलता पर सानिया और रवीश बहुत खुश नजर आ रहे थे। सानिया से जब रवीश की शादी हुई तब रवीश बेरोजगार थे पाँच बार पी एस सी की परीक्षा दे चुके थे उनके पिता रमेश  कपड़े की दुकान पर काम करते थे रवीश ट्यूशन से इतने पैसे कमा लेते थे जिसमें वे प्रतियोगी परीक्षा में आवेदन का शुल्क भर सकें जब रवीश की उम्र अठ्ठाइस वर्ष की हो गई उनके पिता  रमेश को रवीश की शादी की चिंता हुई पर बेरोजगार को कौन लड़की दे तभी रवीश की बुआ रश्मी ने सानिया से रवीश की शादी कराने की बात  कही सानिया के पिता राजन गरीब थे वे एक कंपनी में सुरक्षा गार्ड थे। उन्होंने रवीश को पसंद तो कर लिया पर यही कहा कि मैं अत्यंत गरीब हूँ मेरे पास दहेज के पैसे नहीं है। जिसे सुनकर रमेश ने कहा हम भी तो गरीब हैं यह क्या कम बड़ी बात है कि आपकी बिटिया भी पढ़ी लिखी है और हमारा बेटा भी पढ़ा ल...

कहानी: टेड़ी अँगुली

पाँच सौ एकड़ जमीन के मालिक होने के बाद भी अपने जीवन का अधिकाँश समय लकड़ी बेचकर व्यतीत करने वाले सीधे सच्चे इंसान राव भूपेन्द्र सिंह का एक सौ दस वर्ष की उम्र में आज निधन हो गया था वे अपने पीछे तीन सौ सदस्यों का भरापूरा परिवार छोड़कर गए थे । उनका बड़ा पुत्र  देवेन्द्र सिंह  जो प्रेमपुरा गाँव के सबसे दबंग व्यक्ति थे उन्होंने पिता को मुखाग्नि दी थी। देवेन्द्र सिंह ने मात्र बाइस वर्ष की उम्र अपने पिता की पूरी पाँच सौ एकड़ जमीन मुक्त करा ली थी जो कब्जा कर के बैठे थे उनका वो हाल किया था कि वे सिर उठाने लायक भी नहीं बचे थे उनकी हवेली राव की हवेली के नाम से जानी जाती थी जिसमें छः सौ छोटे बड़े कक्ष थे  पूरी हवेली चालीस एकड़ जमीन में फैली हुई थी जिसमें बड़े  गोदाम जैसे हॉल थे । जिनमें हजारों क्विंवटल अनाज भरा रहता था करोड़ों रुपयों का उनका करोबार था भूपेन्द्र सिंह की अंतिम यात्रा में दस हजार लोग शामिल हुए थे चंदन की लकड़ियों से उनका दाह संसार किया गया था। पिछले पचास वर्षों से वे संतों जैसा जीवन व्यतीत कर रहे थे। राव भूपेंन्द्र सिंह नब्बे वर्ष पूर्व इस गाँव में आए थे  उनके ...

कहानी: बरसात में स्कूल

शहर से बीस किलोमीट दूर के गाँव बिसन खेड़ा  के स्कूल में  पदस्थ विकलाँग शिक्षिका पुष्पलता जी का आज बरसात का दिन बड़ा भारी बीता था। वह शाम को  घर पर आने पर सहज तो दिखाई दे रही थीं पर अंदर अंदर ही काफी डरी हुई थीं। आज बरसाती नाले को उन्होंने कितनी कठिनाई से पार किया था ये वो ही जानती हैं। सड़क के स्कूल में इस बार भी उनका तवादला नहीं हुआ था अभी तो बरसात का पूरा सीजन बाकी था आगे क्या होगा वे ये सोचकर ही काँप जाती थीं।  पुष्प लता अनूपनगर में रहतीं थी अनूप नगर से सतरह किलोमीटर की सड़क तो पक्की थी लेकिन इससे आगे का तीन किलोमीटर का रास्ता कच्चा था उसी के बीच में तीन छोटे नाले भी पढ़ते थे जो बरसात में  जानलेवा हो जाते थे। पुष्पलता मेडम  उनके स्कूल में पदस्थ राकेश सर के साथ मोटर सायकिल से रोज बिसनखेड़ा आती थीं। आज जब वे स्कूल के लिए निकलीं तब आसमान साफ था बारिश के कोई आसार नहीं थे वे सवा दस बजे गाँव में आ गई थी सर ने केशरसिंह के आँगन में मोटर सायकिल खड़ी की  आगे पाँच सौ मीटर का रस्ता बारिश के मौसम में मोटर सायकिल चलाने लायक नहीं रहता था  उस रस्ते के बीच में...

कहानी: भण्डारा

शिव शक्ति गणेश उत्सव समिति द्वारा  आयोजित दस दिवसीय गणेश उत्सव का आज भण्डारे के साथ समापन  हो गया था। समिति के अध्यक्ष गौरीशंकर जी आयोजन की सफलता से बहुत खुश थे भण्डारे की सफलता से वे और अधिक खुश नजर आ रहे थे। विसर्जन के बाद थोड़ा दुख सबको हुआ था जिनको दस दिन तक पूजा उनकी विदाई दुखदायी तो थी पर आयोजन की सफलता मन को संतोष प्रदान कर रहीं थी। शहर से  लगी हुई शिवशक्ति परिसर में बिल्डर ने अठ्ठाईस टू बी एच के  फ्लेट बनवाए थे जिसका जुलाई में पजेशन दिया  गया था  जुलाई के अंत तक पूरे अठ्ठाइस परिवार  फ्लेट में रहने आ गए थे। अपार्टमेन्ट में चार ब्लाॅक थे नीचे बड़ा पार्किंग एरिया था। गौरीशंकर जी जो सरकारी स्कूल में शिक्षक थे वे ए ब्लाक के फर्स्ट फ्लोर पर रह रहे थे  सभी रहवासी एक दूसरे के लिए अजनबी थे गौरी शंकर जी ने विचार किया कि बीस दिन बाद गणेश उत्सव आने वाला है तो क्यों न फ्लेट में गणेश उत्सव का आयोजन कराया जाए उससे सब एक दूसरे से परिचित होंगे तथा आत्मीयता भी बढ़ेगी गौरीशंकर जी ने रहवासियों की  बैठक बुलाई सबके घरों से कुर्सियाँ मँगवा ली गई थीं  उ...

कहानी: बरसात के दिन

इस बार के बरसात के दिन रज्जनलाल को बड़े भारी पड़ रहे थे काम धंधा मिल नहीं रहा था और पास में पैसे भी नहीं थे। आज वो अपनी पत्नी की चाँदी की पायल बेचकर घर में जरूरत का सामान लेकर आया था जो पायल उसने पत्नी के लिए साल भर पहले पाँच हजार रुपये  में खरीदी थी उस पायल के ज्वेलर ने मात्र ढाई हजार रुपये दिए थे। राज्जन की यह बात सुनकर उसकी पत्नी रमा दुखी हो गई थी उसकी शादी की सालगिरह पर बडे मन से यह पायल रज्जन ने उसे उपहार में दी थी । उसकी बात सुनकर रमा बोली आपको बेचना नहीं था  पायल तो एकदम नई थी गिरवी रख आते रज्जन बोला तो इतने  पैसे भी नहीं मिलते और जब हम उसे छुड़ाने जाते तो इतना ब्याज हो जाता की वो नई से मँहगी पडती  तुम्हें याद है  अपनी सोने की अँगूठी मात्र चार हजार के कर्ज में ढूब चुकी है। आजकल दस  परसेन्ट पर्तिमाह से कम में कोई उधार नहीं देता हर महीने ब्याज नहीं दो तो उसे मूल मैं जोड़ देता है। रज्जनलाल ने अपनी पत्नी को पूरा हिसब समझाते हुए ये बात कही रमा सुनकर चुप हो गई इस बार बरसात के मौसम के कुछ माह पहले रज्जन दो महीने बीमार रहा था जिसमें उसकी सारी जमा पूजी खर्च ह...

कहानी: वकालत

फौजदारी के बड़े वकील राममोहन चौकसे अपने  पिताजी  हाईकोर्ट के पूर्व वकील हरिमोहन चौकसे जी  की छठवीं पुण्यतिथि मना रहे थे । आयोजन में जहाँ शहर के सभी गणमान्य नागरिक शामिल हुए थे वहीं प्रदेश के सी एम सुभाष  वर्मा जी जो चौकसे जी को अपना राजनैतिक गुरू मानते थे वे भी आए थे। आयोजन बहुत भव्य था हवन पूजन भण्डारा रक्तदान चिकित्सा शिविर लगाए गए थे। आयोजन में पूरा शहर ही शामिल हुआ था रात को अखिल भारतीय कवि सम्मेलन का आयोजन भी किया गया था। राम मोहन चौकसे जी को रात के साढ़े तीन बजे फुरसत मिली थी आयोजन में दो करोड़ रुपये खर्च हुए थे। राम मोहन चौकसे को आज बाबूजी की बहुत सी बातें याद आ रही थीं उनके पिता हरिमोहन चौकसे  जी  साठ वर्ष पूर्व शहर से आठ किलोमीटर दूर स्थित सेमलखेड़ा गाँव के प्राथमिक  स्कूल में शिक्षक थे सायकिल से स्कूल जाते थे शाम को पाँच बजे घर आ जाते थे। शहर के सरकारी कॉलेज में शाम को छः बजे से सायंकालीन  एल एल बी की कक्षाएँ लगती थीं चौकसे जी बी ए पास तो थे ही उन्होंने एल एल बी में एडमीशन ले लिया था इसके पूर्व उनका प्रमोशन भी हो गया था  पर उन्होंने...

कहानी: आजीवन कारावास

बालकिशन को आजीवन कारावास की सजा भोगते हुए आज पूरे पन्द्रह वर्ष हो गए थे आज उसकी पत्नी सुनीता उससे मिलने आई थी उसने बताया कि बेट  प्रकाश की शादी तय कर दी है । आपके पैरोल की कार्यवाही करना है ताकि आप बेटे की शादी में शामिल हो सकें बालकिशन की आँखों में खुशी के आँसू छलक आए थे  जब उसे जेल हुई थी तब प्रकाश दस वर्ष का था और बिटिया  प्रीती सात साल की प्रीती की शादी गत वर्ष हो गई थी तब बालकिशन पाँच दिन के लिए पेरोल पर बाहर आया था सुनीता के जाने के बाद वो इन्हीं सब बातों के विषय में सोच रहा था। जब उसे आजीवन कारावास की सजा हुई थी तब सुनीता की उम्र उन्तीस साल की थी वो चाहती तो दूसरी शादी कर सकती थी  ऐसे अवसर भी आए थे दोनों बच्चों को रखने के लिए दादा दादी भी तैयार थे तथा नाना नानी भी पर सुनीता ने शादी के लिए सख्ती से मना कर दिया था। बालकिशन को  आजीवन कारावास की सजा  जो हुई ।उसकी घटना इस प्रकार है बालकिशन का पक्का दोस्त था श्यामलाल दोनों शाम को बैठकर शराब पीते थे दोनों ही कारपेन्टर थे। तथा साथ ही काम भी करते थे। श्यामलाल सुनीता को बुरी नजर से देखता था उसे छूने की कोशिश क...

कहानी: रिटायरमेंट के बाद

रिटायर मेन्ट के आठ साल बाद भी राकेश श्रीवास्तव एकदम चुस्त दुरूस्त थे उन्हें देखकर कोई कह नहीं सकता था कि वे सत्तर वर्ष के हो गए हैं पेंशन और म्यूजिक से उनकी मासिक आय   उनकी वेतन से भी ज्यादा थी। वे एक प्राइवेट स्कूल में म्यूजिक टीचर का काम भी कर रहे थे। उससे उन्हें हर माह  धनराशि प्राप्त हो रही थी।  राकेश जी हाईस्कूल में संस्कृत के टीचर थे  तीस साल पहले वे अपना संगीत का शौक पूरा करने के लिए हारमोनियम खरीद कर लाए थे पर जब वे उसे प्ले करने लगा तो वो उन्हे बहुत कठिन लगा।  कुछ दिनों तक वो हारमोनियम कपडे में बँधकर रखा रहा  लेकिन एक दिन उनकी किराने की दुकान पर उनके पुराने परिचित संतोष से  भेंट हुई।  संतोष ने बताया कि वो शाम को संगीत महाविद्यालय में म्यूजिक की क्लास अटेण्ड करता हूँ जब राकेश जी ने भी म्यूजिक सीखने की बात कही तो  संतोष ने कहा अभी प्रवेश चल रहे हैं चाहो तो एडमीशन  ले लो सांध्यकालीन कउक्षाएँ लगती हैं। और इस तरह राकेश जी ने बी म्यूज में प्रवेश ,ए लिया तीन साल में तो वे संगीत में माहिर हो चुके थे कंठ स्वर भी उनका अच्छा था पर...

कहानी: किस्मत थोड़ी मेहनत ज्यादा

आइ ए एस अवार्ड मिलने के बाद कलेक्टर  बन कर अनूप नगर  आए रघुवीर सिंह जब अपने पहले दौरे पर तहसील कार्यालय  दुर्गा नगर का निरीक्षण करने पहुँचे तो वहाँ उनका क्लास फेलो  आशीष  मिला आशीष वहाँ पटवारी के पद पर कार्यरत था। आशीष उन्हें देखकर झेंप गया था रघुवीर ने कहा अभी तक प्रमोशन नहीं हुआ वो बोला दो बार सस्पेण्ड हो गया था सी आर भी अच्छी नहीं थी इसलिए प्रमोशन नहीं हो सका । निरीक्षण करके शाम को रघुवीर बंगले पर आए थे उन्होंने अपनी पत्नी  शारदा जो कॉलेज में प्रोफेसर थी उससे आशीष का जिक्र किया था शारदा आशीष को अच्छी तरह जानती थी । बारह वर्ष पहले  आशीष और रघुवीर ने एक ही कॉलेज से एम ए किया था इसके बाद दोनों नौकरी की तलाश में जुट गए थे  शारदा तब रघुवीर की गर्ल फ्रेन्ड थी।  पटवारी के पद पर  रघुवीर और आशीष दोनों ने ही एप्लाई किया था चयन परीक्षा में भी दोनों बैठे थे आशीष ने मन लगाकर परीक्षा की तैयारी की थी जबकि रघुवीर  बिना तैयारी के ही परीक्षा देने चला गया था।  जिसका परिणाम ये हुआ कि आशीष का चयन  पटवारी के पद पर हो गया  और र...

कहानी: दूरियां

शादी के साठ साल बाद भी मंजू और किशनलाल के दिलों के बीच की दूरियाँ कम नहीं हुई थीं आज किशन लाल इस दुनिया को छोड़ कर चले गऐ थे। वैसे उनका भरापूरा परिवार था पर पति पत्नी के बीच वैसी गहरी मुहब्बत नहीं थी जो होना चाहिए थी।पति के मरने के बाद मंजं की  आँखों में आँसू तो आए रोई भी पर वे सब दिखावे के ही रहे। साठ साल पहले जब मंजू की किशन लाल से शादी हुई तब किशनलाल की उम्र बीस साल की थी और मंजू की अठारह साल की किशनला की यह दूसरी शादी थी पहली शादी उनकी उन्नीस वर्ष की आयु में रागिनी से हुई थी रागिनी तब अठारह वर्ष की थी  किशनलाल की नौकरी तहसील कार्यालय में पेशकार के पद पर तभी लग गई थी जब उन्होंने हाई स्कूल की परीक्षा पास की थी। तब उनकी उम्र अठारह वर्ष की थी नौकरी लगने के बाद किशनला जी की शादी रागिनी से हो गई थी रागिनी के पिता पटवारी थे ।रागिनी  और किशनलाल आठ महीने साथ साथ रह सके थे रागिनी सुंदर सुशील गौर वर्ण की थी उसने आठवीं पास की थी। किशनलाल उन्हें बहुत चाहते थे।  रागिनी जब मायके में थी तब एक रात उनके पेट में तीव्र दर्द हुआ उस जमाने में अस्पताल में आज जैसे चिकित्सा उपकरण नहीं थे...

कहानी: दोस्ती में दरार

कभी जिससे खूब गहरी दोस्ती रही उस परेश से दुश्मनी होने के बाद उस पर चाकू से प्राणघातक हमला करने वाला रितेश  इन दिनों जेल में बंद था उसे तीन साल का कारावास मिला था। जेल में आने के बाद उसे अपनी गलतियों का अहसास हुआ था। उसने जब सारी कड़ियों को जोड़ा तो उसे इसमें अपनी ही गलती नजर आई उसके जेल जाने से उसकी दुकान उसकी पत्नी रेखा ने सम्भाल तो ली थी पर घर के काम होने के कारण वह दुकान पर ज्यादा समय नहीं दे पा रही थी बस जैसे तैसे दुकान चल रही थी। आज रेखा रितेश से जेल में मिलने गई थी  उसके साथ उसका बेटा कुलदीप भी था।  पति की मनोदशा और पछतावा देखकर वो बड़ी दुखी थी। घर आने के बाद उसका मन किसी काम में नहीं लग रहा था।  रेखा ने कई  बार रितेश को समझाया था कि परेश से झगड़ा खत्म कर के सुलह कर लो पर हरबार वो गुस्से में यही कहता उस दुश्मन का नाम तक मत लो मेरे सामने अन्यथा मुझसे बुरा कोई नहीं होगा। दो वर्ष पूर्व तक परेश और रितेश गहरे दोस्त थे दोनों एक दूसरे को बहुत मानते थे एक दूसरे की ताकत थे वे उनकी दोस्ती रितेश के पड़ोस में रहने वाले हम उम्र नरेश को बिल्कुल ...

कहानी: नौकरी

अपनी ही दुकान से छोटे भाई दिनेश द्वारा बेदखल करने के बाद रमेश ने कोशिश कर के तहसील में चपरासी की नौकरी हासिल कर ली थी नौकरी करते हुए उसे दस साल हो गए थे इन दस सालों में बहुत कुछ बदल गया था। रमेश को सरकारी क्वार्टर मिला हुआ था जिसमें वो अपने परिवार सहित सुख से रह रहा था। नौकरी के अलावा वो एक वकील के यहाँ भी शाम के छः बजे से दस बजे तक  काम कर रहा था जहाँ से उसे अतिरिक्त आय भी हो रही थी। आज उसे वकील साहब ने वेतन दिया था परसों उसकी बिटिया ऋषिका का जन्म दिन आने वाला था। यह पैसे वो उसके जन्मदिन पर खर्च करने वाला था। रमेश के बेटे का नाम रवीन्द्र था उसने इस साल दसवीं की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की थी। ऋषिका आठवीं में आई थी। दस वर्ष पूर्व रमेश की किराने की दुकान थी दुकान अच्छी चलती थी यह दुकान रमेश ने ही पाँच वर्ष पूर्व खोली थी तब दिनेश बीए सेकेण्ड इयर में पढ़ रहा था। रमेश आठवी पास करके  काम करने लगा था क्योंकि उसके पिताजी कुली थे उनकी इतनी आमदनी नहीं थी कि वे दोनों की पढ़ाई का खर्च उठा सकें रमेश के काम करने से घर की आर्थिक स्थिति सुधर गई थी। रमेश किराने की दुका...

कहानी: बीमारी मँहगी सस्ती

दिहाड़ी मजदूरी करके जीवन यापन करने वाले करन सिंह को आज आधे दिन की मजदूरी कर के ही संतोष करना पड़ा था शाम को उन्हें दो सौ रुपये मजूरी के मिले थे। सुबह वो मजदूरी पर इसलिए नहीं आ सके थे क्योंकि उन्हें डायरिया हो गया था। उन की आज सुबह अचानक तबियत खराब हो गई थी वे काफी कमजोरी महसूस कर रहे थे। ऐसी स्थिति में वे काम पर नहीं जा सके उनकी बस्ती में आर एम पी डॉक्टर आर पी साहू का क्लीनिक था। वे इलाज के लिए वहाँ गए डॉक साब ने उनका परीक्षण किया तीन टाईम की कुछ गोलियाँ दी एक पाउडर का पेकैट दिया जिसे पानी में घोलकर पीने को कहा। इतना इलाज डॉक्टर साहब ने मात्र तीस रुपये में कर दिया इसमें उनकी फीस भी शामिल थी। वे इलाज कराकर घर आ गए। एक खुराक सुबह खाई और एक दोपहर में तीन बार घोल पिया भोजन में खिचड़ी खाई दोपहर तक वे लगभग ठीक हो गए थे तभी ठेकेदार का फोन आया कि यहाँ मजदूरों की कमी है अगर तबियत ठीक हो तो आ जाओ आधे दिन की मजदूरी तो मिल ही जाएगी करन सिंह ने ठेकेदार की बात मान ली थी और मजदूरी करने आ गए थे। शाम को मजदूरी के रुपये लेकर जब करन सिंह घर आए तो बाहर चबूतरे पर मोहल्ले की कुछ महिलाएँ आपस में बात...

कहानी: बंजर ज़मीन

दस साल पहले बँटवारे में मिली बंजर जमीन को किसान ज्ञानसिंह और उनकी पत्नी ने लगातार कठोर परिश्रम कर के उपजाऊ जमीन में बदल लिया था उनकी पूरी जमीन सिंचित थी  और वे साल भर में तीन फसल ले  रहे थे। जबकि ज्ञानसिंह के बड़े भाई मानसिंह की हालत इसके विपरीत थी अत्यंत उपजाऊ जमीन होने के बाद भी वे बामुश्किल एक ही फसल उससे ले पाते थे उन्हें मजदूरी कर अपना जीवन यापन करना पड़ रहा था। दस वर्ष पूर्व उनकी जमीन का बँटवारा हुआ था उनके पिताजी रोशनलाल के पास  बीस एकड़ जमीन थी  जिसमें दस एकड़ जमीन पूरी तरह बंजर थी तथा बीच में एक ऊँचा टीला था उसके पार दस एकड़ उपजाऊ जमीन थी बँटवारे के पहले ज्ञानसिंह शहर में मजदूरी करते थे भवन निर्माण कार्य में उन्होंने भजदूरी से शुरूआत की थी और बाद में काम सीखकर वे राजमिस्त्री बन गए थे इससे उनकी मजदूरी दुगुनी हो गई थी ज्ञानसिंह अपने बड़े भाई मानसिंह की बहुत इज्जत करते थे खेती का काम भानसिंह करते थे और ज्ञान सिंह मजदूरी का उस समय दोनों भाई कुँवारे थे । खेती से ज्यादा आय होती नहीं थी ज्ञानसिंह जो हाड़तोड़ मेहनत कर रुपया कमाकर लाते वो अपनी  माँ  रेशम बा...

कहानी: पुत्र मोह का त्याग

शादी के पहले अपने पुत्र लोकेश को अपनी आँखों का तारा समझने वाली  माँ  लीलादेवी  उसकी शादी के छः महीने बाद ही पुत्र मोह का त्याग कर चुकी थी आज जब वो अपनी पत्नी वीना को लेकर अलग हुआ तब उन्होंने उसे अपने घर में नहीं रहने दिया आखिर लोकेश ने अपना तबादला दूसरे शहर में करा लिया था वहाँ किराये का मकान  ले लिया था आज मिनी ट्रक में अपना सामान लाद कर वो उस शहर के लिए रवाना हो गया था।  इसके पहले लीलादेवी ने लोकेश से कहा था तू अपनी पत्नी को छोड़ दे मैं तेरी दूसरी शादी करा दूँगी तब लोकेश ने कहा था वीना का कसूर तो बताओ  मैं उसे नहीं छोड़ सकता  इस पर लीला देवी ने कहा तो फिर तू इस घर में नहीं रह सकता। लोकेश ने कहा ठीक है और वह आज घर छोड़ के चल दिया था। उसकी पत्नी वीना को चार माह का गर्भ था फिर भी लीला ने उसे घर से निकाल दिया था। लोकेश जब छः माह का था तब उसके पिताजी  सुमेर सिंह का  सड़क दुर्घटना में निधन हो गया था। लोकेश की दो बड़ी बहने थीं। लोकेश लीला देवी का सबसे छोटा  बेटा था लीला उसकी हर जिद पूरी करती  थी क्योंकि वो  उनके पति  की अं...

कहानी: माँ की सेवा

आनंद मोहन  की आयु  अस्सी वर्ष की हो गई थी उनकी माँ शारदा सौ वर्ष की होकर भी भली चंगी थी वे बीस वर्ष से माँ के साथ रह रहे थे माँ की देखभाल करते थे तथा जितना बन सके उतनी उनकी सेवा करते थे। दोनों माँ बेटे बूढ़े हो चुके थे पर माँ की निगाह मैं तो बेटा कितना ही बड़ा क्यों न हो जाए बच्चा ही होता है आज जब  शारदा अपने  अस्सी वर्षीय बेटे  की नजर उतार रही थीं तब उनके चेहरे पर अपूर्व ममता की झलक थी। आनंद मोहन के मित्र शिव प्रताप भी यह दृश्य देख रहे थे । माँ के नजर उतारने के बाद आनंद मोहन अपने मित्र से बोले बीमार होने पर कभी हल्की हरारत होने पर माँ मेरी नजर जरूर उतारतीं हैं भले ही मैं डॉक्टर से कितना ही मँहगा इलाज क्यों न करा लूँ माँ को ऐसा कर के  संतोष मिलता है तो मुझे भी अच्छा लगता है। ऐसा नहीं था  कि आनंद मोहन के अपने बाल बच्चे बीवी  न हों  उनका भरापूरा परिवार था फिर भी वे माँ के पासे ही रहते थे। आनंद मोहन के पिताजी  का निधन हुए पच्चीस वर्ष हो गए थे जब उनके पिताजी जीवित थे तब  वे दोनों रहते थे आनंद मोहन तब नौकरी करते थे और अपनी पत्नी तथा बच्च...

कहानी: संतान हीन

संतान नहीं होने के कारण पति द्वारा परित्यक्त कमला आज चालीस अनाथ बच्चों   की परवरिश कर रही थी  पिछले बीस सालों से वे यह पुनीत कार्य कर रहीं थी उनके पाँच लड़के  पढ़लिखकर नौकरी करने लगे थे उनमें से दो  की  उन्होंने  शादी भी कर दी थी वे अब सुखपूर्वक रह रहे थे। उन्होंने अपने  घर का नाम कुटुंब रखा था घर उनका बहुत बड़ा था जिसमें सब हिलमिलकर रहते थे। उनके कुटुंब  को जहाँ दान दाताओं का सहयोग मिल रहा था वहीं उनके पास चालीस एकड़ कृषि भूमि थी जिसकी आय से भी वे अपना कुटुंब चला रही थीं।  उनका सोनपुर नगर में बहुत सम्मान था। आज उन्हें एक दान दाता तीस हजार रुपये देकर गया था जिससे उन्होने महीने भर के लिए आवश्यक सामान खरीद लिया था अनाज और सब्जी तो उन्हें अपने खेत से प्राप्त हो जाती थी। इन बच्चों के बीच रहकर कभी उन्हें ऐसा नहीं लगा कि  वे संतान हीन हैं। बच्चे भी उन्हें अपनी माँ ही समझते थे।     कमला जब तीस वर्ष की थीं तब उनके पति ने उन्हें छोड़ दिया था।  तथा दूसरी शादी कर ली   थी। क्योंकि  वे  माँ नहीं बन सकती थी...

कहानी: माँ या नौकरानी

शारदा दो साल अपने बेटे बहू के घर में रहकर पाँच साल पहले अपने घर वापस आ गईं थी उनके पति  दीनानाथ  के साथ वे सुखपूर्वक रह रहीं थीं दीनानथ जी को जो पेंशन मिलती थी उसमें दोनों का गुजारा आराम  से चल रहा था इसके अलावा उनके  पास एक बड़ा मकान भी था जिसमे चार किरायेदार रहते थे । उनसे उन्हें बीस हजार रुपया  हर महीने किराये के रूप में मिलते थे। कुल मिलाकर वे दोनों खुश थे और एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे। दीनानाथ जी की उम्र पिचहत्तर वर्ष की थी  तथा शारदा की उम्र बहत्तर वर्ष। शारदा को सात वर्ष पहले का  वो समय अच्छी तरह याद है जब उनका बेटा रोहन उनसे चिकनी चिपड़ी बातें कर के उन्हें अपने साथ कलकत्ता ले गया था।  रोहन की पत्नी निशा भी नौकरी करती थी और रोहन भी नौकरी कर रहा था।  निशा को सात माह का गर्भ था  माँ के आने के पहले रोहन और निशा ने नौकरानी की छुट्टी कर दी थी शारदा बहुत सरल स्वभाव की महिला थीं उनमें रोहन और निशा की तरह छल कपट नहीं था।  वे निशा की खूब सेवा कर रही थीं दिन भर घर का सारा काम करतीं और रात को थककर चूर हो जातीं कोई उनके प...

कहानी: ठेले पर धंधा

कैलाश के पास ठेला था उसी में वो सामान रखकर बेचता था कभी सब्जी तो कभी मसाले तो कभी  दाल चावल आजकल वो गाँव जाकर चावल इकठ्ठा कर के फिर उसे ठेले में रखकर बेच रहा था। आज शाम को जब वह चावल बेच कर आया तो  बड़ा खुश दिखाई दे रहा था क्योंकि आज उसे खर्च काट कर शुद्ध पन्द्रह सौ रुपये का लाभ हुआ था। कैलाश पिछले तीन महीने से बहुत परेशान था तीन महीने पहले उसकी तबियत खराब हो गई थी जैसे तैसे ठीक हुआ तो ठेले पर मंडी से सब्जी लाकर बेचने निकला  तो सब्जी उसकी बहुत कम बिकी दूसरे दिन  शहर में तनाव होने के  कारण पुलिस ने उसे ठेला लेकर जाने नहीं दिया तीसरे दिन सब्जी खराब हो गई और उसे वो फैंकना पड़ी उसमें उसकी लागत भी नहीं निकली। एक दिन टमाटर लेकर आया तो उनकी भी बिक्री कम हुई दूसरे दिन टमाटर के भाव गिर गए उसके बहुत से टमाटर खराब हो गए थे जिन्हें फैंकना पड़ा ।बचे टमाटर दाम गिरा कर बेचे।  कुछ दिन उसने ठेला नहीं लगाया पर घर आखिर कब तक बैठता गर्मी का मौसम शुरू ही हुआ था इसलिए उसने गन्ने का रस बेचने का विचार किया इसके लिए वो लकड़ी की  चरखी लाया तथा थोक में गन्ने खरीदे बर्फ लिया नींब...

कहानी: दादा जी का हत्यारा

चौकीदारी की नौकरी पाने के लोभ में अपने सगे दादाजी की हत्या करने वाला पोता राकेश  जेल में उम्रकैद  काट रहा था जेल में सजा काटते हुए आज उसे पूरे पन्द्रह  वर्ष हो गए थे जेल में उत्पात मचाने  तथा एक कैदी के ऊपर जान लेवा उ हमला करने के कारण उसे काल कोठरी में रखा गया था। दादाजी की हत्या करने पर उसे नौकरी तो नहीं मिली उसका भरापूरा परिवार भी उजड़ गया  तथा सजा मिली सो अलग। पन्द्ह वर्ष पहले  राकेश के दादाजी  राम सिंह शेरपुर गाँव के चौकीदार थे इसके बादले शासन से उन्हें  दस एकड़ कृषि भूमि मिली थी  तथा हर महीने वेतन के रूप में भी कुछ राशि उन्हें मिलती थी  दादाजी रामसिंह की उम्र सत्तर वर्ष की हो गई थी । उनका बेटा सोहन खेती करता था जबकि पोता राकेश   अवारा तथा बिगड़े हुए दोस्तों के साथ रहता था उसकी उम्र अठ्ठाइस वर्ष की हो गई थी।  वो कई बार अपने दादाजी से कह चुका था कि वे अपनी चौकीदारी की नौकरी उसे दे दें और खुद अब घर पर रहकर आराम करें लेकिन रामसिंह इसके लिए तैयार नहीं थे वे कहते भी थे गाँव के आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों से तेरी दोस्ती है। ...

कहानी: कलेक्टर का दौरा

रतनपुर संकुल केन्द्र  के बीस ग्रामों के विद्यालयों में पदस्थ शिक्षकों का आज का दिन बड़ा दहशत भरा गुजरा था एक दिन पहले एक शिक्षक संजय सिंह  ने यह खबर सभी  तक पहुँचा दी थी कि कल कलेक्कटर  साहब  शोभा खेड़ी ग्राम में आएँगे किस समय आएँगे ये नहीं बताया था। सभी शिक्षक सचेत हो गए थे शोभाखेड़ी गाँव से लगे आसपास के बीस स्कूलों में सभी शिक्षक सुबह सवा सात बजे स्कूल पहुँच गए थे सभी डरे सहमे थे सभी के चेहरों पर हवाइयाँ उड़ रही थीं सब मन ही मन दुआ कर रहे थे कि साहब हमारे स्कूल न आएँ तो अच्छा है अगर आ गए तो किसी की वेतनवृद्धि रुकेगी या किसी का वेतन कटेगा या किसी को कारण बताओ नोटिस मिलेगा या कोई अभागा सस्पेण्ड होगा सबसे बुरी हालत शाला प्रभारियों की थी शाला का समय सुबह साढ़े सात से डेढ़ बजे तक था पर दिन के ढाई बजे तक कोई टस से मस नहीं हुआ था ढाई बजे जब रतनपुर के सर ने फोन पर खबर दी कि साहब सीधे जिला मुख्यालय के लिए हाइवे से निकल गए हैं तब सभी ने राहत की साँस ली तीन बजे तक सभी ने शाला बंद की और भीषण गर्मी में घर के लिए रवाना अनेक शिक्षक ऐसे भी थे जिनकी तबियत खराब हो गई थी एक शिक्...

कहानी: सेकेन्ड हैन्ड कार

रमेश जी ने जबसे सेकेण्ड हैन्ड कार खरीदी थी तभी से परेशान थे वे अब तक उसमें साढ़े चार लाख रुपये खर्च कर चुके थे फिर भी वो अक्सर धोखा दे जाती थी। जिसके कारण वे ऑफिस में लेट पहुँचते और साहब की डाँट खाते थे। साल  भर पहले उन्होंने वो कार दो लाख रुपये में खरीदी थी। साढ़े चार लाख रुपये खर्च करने के बाद भी कोई उसके पचास हजार रुपये से ज्यादा देने को तैयार नहीं था। छः लाख का नुक्सान कैसे उठाएँ लेकिन बार बार परेशान होने  से बचने के लिए आखिर  उन्होंने वो कार पचास हजार रुपये  में बेच ही दी बेचने के बाद उन्हें  खुशी ही हुई क्योंकि वे उससे तँग आ चुके थे । नई कार साढ़े आठ लाख रुपये में आ रही थी कुल मिलाकर  पन्द्रह लाख रुपये की चपत लग रही थी। उनके एक गलत निर्णय का  यह नतीजा था जो उन्हें बहुत अखर रहा था। साल भर पहले तक वे मोटर सायकिल से ऑफिस जाते थे पर दो महीने के भीतर तीन एक्सीडेन्ट होने पर वे घबरा गए हालाँकि दुर्घटना में उन्हें ज्यादा चोट नहीं आई थी पर उनके मन में डर बैठ गया था। किसी दिन ज्यादा चोट आ गई तो क्या होगा।  यही सोचकर वे कार के शोरूम पर नई कार खरीदने...

कहानी: गरीबी से उठकर

मनसुखलाल आज गाँव के धनवान एवं प्रतिष्ठित व्यक्ति के रूप में जोने जात हैं लेकिन बीस साल पहले वे गाँव के सबसे निर्धन व्यक्ति थे। उन्हों नेअपनी मेहनत लगन संयम धैर्य से अपनी गरीबी दूर की थी  आज उन के पास सत्तर एकड़ जमीन एक वेयर हाउस  और हार्वेस्टर जेसीबी मशीन चार डंपर  तथा टस करोड़ रुपये बैंक में जमा थे पाँच करोड़ रुपये का कर्ज बाँट रखा था जिसे दस लाख रुपये महीने का ब्याज प्राप्त होता है। वे मंडी कमेटी के अध्यक्ष हैं तथा क्षेत्र के सबसे बड़ा दानदाता भी वे ही हैं। वे जब  दो वर्ष के  थे तब उनकी माँ प्रेमवती ने  उनके सौतेले पिता मान सिंह  से दूसरी शादी कर ली थी मनसुखलाल के पिता लक्ष्मण दास ने घर परिवार छोड़कर सन्यास ले लिया था वे तब माँ के गर्भ में ही थे  जब उनका जन्म हुआ तब उनके पिता उनके पास नहीं थे माँ ने ढाई साल अपने मायके में गुजारे लेकिन भैया भाभी के बुरे बर्ताव से पीड़ित होकर  घर छोड़कर अलग रहने का निर्णय लिया तभी लीलाधर ने उनके सामने मानसिंह से शादी करने का प्रस्ताव रखा काफी सोच विचार के बाद प्रेमवती ने मानसिंह से इस शर्त पर शादी करना मंजूर ...

कहानी: आदर्श शिक्षक का रिटायरमेन्ट

आदर्श शिक्षक  मनरेन्द्र  मिश्रा जी को रिटायर हुए पूरे दस वर्ष हो गए पर वे अभी भी स्कूल में अपनी सेवाएँ दे रहे थे। पूरे क्षेत्र में उनके जैसा अंग्रेजी पढ़ाने वाला शिक्षक नहीं था।  उनका सभी बहुत आदर करते थे आज उनका शिक्षक दिवस पर  विधायक जी  बाबू वर्मा ने   भव्य समारोह आयोजित  कर सम्मान किया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में उनके शिष्य  उपस्थित थे।  नरेन्द्र जी ने  पूरे बयालीस साल तक नौकरी की थी जिसमें बत्तीस साल तो  जिले के दुर्गम गाँव  पाटन पुर में सेवाएँ दी थीं। वहाँ से विधायक जी करन वर्मा की पहल से उनका तबादला शहर के इस स्कूल में हुआ था । जहाँ दस साल नौकरी के बाद वे रिटायर हो गए थे। उनके रिटायरमेन्ट के समय स्कूल में अंग्रेजी पढ़ाने वाले  शिक्षक की कमी थी वार्षिक परीक्षाएँ    सिर पर थीं ऐसे में प्रथानाध्यापक ने उनसे परीक्षा  संपन्न होने तक उनसे विद्यालय मैं अध्यापन करने का आग्रह किया था जिसे उन्होंने हर्ष के साथ में स्वीकार कर लिया था । तब से वे बिना एक भी नागा किए लगातार  दस वर्षों  से उस स्क...

कहानी: पिता की मौत के बाद

राजीव के पिता सुरेश का निधन हुए पाँच वर्ष बीत गए थे। इन पाँच वर्षों में बहुत कुछ बदल गया था ।राजीव की बहन विनीता की शादी हो गई थी ।।उसे अनुकंपा नौकरी मिलने के बाद उसकी भी शादी हो गई किराये के मकान से वे अपने खुद के घर में आ गए थे। माँ रजनी को पेन्सन मिल रही थी।  पिताजी के निधन के बाद जो फंड ग्रेच्यूटी बीमा तथा ई एल का पैसा मिला था उससे उनकी आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत हो गई थी। राजीव के पिता  सुरेश आबकारी विभाग में क्लर्क थे  उन्हें शराब पीने की लत थी इसके अलावा जुआ सट्टा भी वे खेलते थे अपनी तन्ख्वाह का अधिकाँश पैसा वे व्यसनों में खर्च कर देते थे।  उनका ऑफिस में किसी से भी बर्ताव अच्छा नहीं था ऑफिस में भी वे शराब पीकर चले आते थे। जरा जरा सी बात झगड़ा करना उनकी आदत थी उनसे कोई काम नहीं लिया जाता था। न उनके आने जाने पर कोई रोक टोक थी।  उन्हें कोई उधार बी नहीं देता था। उनके कारण उनका परिवार  परेशानी का सामना करता था। उनका बेटा राजीव बचपन से ही उन्हें ऐसा ही देख रहा था  उनमें जरा भी बदलाव नहीं आया था । राजीव की माँ रजनी सिलाई का काम करती थी  विनीता सोसाय...

कहानी: तेज धूप और नौकरी

शाला प्रभारी अजय तिवारी के रिटायरमेंन्ट में छः महीने का समय बचा था। गर्मी की एक महीने  की छुट्टी के बाद स्कूल का पहला दिन उनका बड़ा तकलीफदेह रहा था । शाम को जब वे घर आए थे उनकी हालत बहुत खराब थी पत्नी उन्हें इस हाल में देखकर घबरा गई थी बोली आप तो छुट्टी ले लो पर वे बोले कैसे ले लूँ मेर सिरपर बहुत जिम्मेदारी है। अजय सर हार्ट पेशेन्ट थे उन्हें शुगर की भी बीमारी थी  उनके लड़के ने आते ही उनका बी पी चेक शुगर की जाँच की सब कुछ नार्मल देखकर राहत की साँस ली थी। फिर वे पत्नी को आज दिन भर का घटनाक्रम बताने लगे।  जब वे तीस किलोमीटर मोटर साइकिल चलाकर स्कूल गए तो स्कूल का ताला बंद था स्कूल की  चाबी चुनाव के समय में उन्होंने पंचायत के चपरासी को दे दी थी । वो घर पर नहीं मिला तेज धूप में उन्हें चक्कर आने लगे। लगभग एक घंटे बाद उसके घर से कोई बारह साल का बच्चा चाबी लेकर आया तब कहीं उन्होने स्कूल खोला घर में महीने भर कूलर की  ठंडी हवा में रहे थे सोचा था कि स्कूल में कम से पँखे की गरम हवा ही खा लेंगे लेकिन पँखा  नहीं चला लाइट नहीं थी  चुनाव के बाद  जो इलेक्ट्रीशियन म...