सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

मई, 2024 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कहानी: लड़ते लड़ते

दादी केशर देवी का बयासी वर्ष की आयु में निधन हो गया था वे अपने पीछे भरापूरा परिवार छोड़कर गई थीं आज उनकी तेरहवीं का कार्यक्रम था जिसमें दूर दूर से मेहमान शामिल होने आए थे सब दादी केशर देवी  तथा छः माह पूर्व गुजरे दादाजी तिलक चंद जी के बीच अगाध प्रेम तथा हर समय होती रहने वाली नौक झौंक तथा तकरार के विषय में ही बात कर रहे थे।  तिलक चंद और केशर देवी ने विवाह के बाद पैंसठ वर्ष साथ साथ बिताए थे  जिसमें पिछले तीस वर्षों से  तो  वे अपने मकान में अपने बहू बेटों तथा पोते पोतियों से अलग रह रहे थे। मकान किराया ही उनकी आमदनी का जरिया था।  इन पैंसठ वर्षों में ऐसा कोई दिन नहीं बीता था जब उनमें आपस में तकरार  या वाद विवाद न हुआ हो कभी कभार तो उनमे झूमा झटकी तक हो जाती थी  पर जब खाना खाने का समय होता तो लड़ाई भूलकर वे खाना खा लेते थे उनकी लड़ाई कभी ज्यादा देर तक नहीं चलती कुछ घंटों में ही उनकी लड़ाई समाप्त हो जाती थी और वे सहज हो जाते थे।  केशर देवी का नियम था कि वे तिलकचंद को खाना खिलाए बिना कभी भोजन नहीं करती थीं चाहे उनके बीच कितनी ही अधिक लड़ाई क्यों न हु...

कहानी: फेल हो गई चालाकी

सूर्य प्रकाश जी की पंचायत चुनाव में भारी बहुमतों से जीत हुई थी। वे वर्तमान सरपंच  चैनसिंह को हराकर सरपंच चुने गए थे। उनका आज भव्य विजयी जुलूस निकला था और अपनी जीत के बड़े बड़े दावे करने वाला चैनसिंह तथा उसके समर्थक एकाएक जाने किस कोने में  छिप गए कुछ चैनसिंह के समर्थक ऐसे भी थे जो  मौका देखकर सूर्यप्रकाश जी के जुलूस में शामिल हो गए थे।  सरपंच चुने जाने के पहले सूर्यप्रकाश जी जनपद सदस्य रहे थे। पूरे क्षेत्र के लोग यह अच्छी तरह जानते थे कि सूर्य प्रकाश जी एक सीधे सरल और नेक इंसान हैं  सौम्य हैं और सहज हैं। कम बोलते हैं। लंबा भाषण नहीं देते काम की बात करके चुप हो जाते हैं। दूसरी और चैनसिंह बातूनी चालाक चपल झूठा मतलबी अवसरवादी भ्रष्ट और बेईमान इंसान था। देर तक भाषण देना लुभावनी बातें करना उसे खूब आता था इसी खूबी के कारण वो पिछले चुनाव में गाँव का सरपंच चुना गया था ।लेकिन इन पाँच बरसों में लोग उसके भ्रष्ट और दोहरे आचरण से त्रस्त हो गए थे । चैनसिंह के पास सरपंच बनने से पहले कच्चा मकान था और मात्र चार एकड़ जमीन थी ।सरपंच बनने के बाद पाँच सालों में उसके पास पैंतीस एकड़ ...

कहानी: देशी इलाज

विंध्य क्षेत् के वनांचल में स्थित ग्राम तेंदू खेड़ी में वैद्य  हरीश चौबे देशी जड़ी बूटियों से  अनेक असाथ्य रोगों का अचूक इलाज करने के कारण विख्यात थे प्रतिदिन दूर लूर से रोग पीड़ित उनसे इलाज कराने आते थे। लगभग दो सौ वर्षों से तेंदू खेड़ी ग्राम में इसी तरह से मरीजों का इलाज हो रहा था । हरीश चौबे तीसरी पीढ़ी के वैद्य थे उनकी आयु भी सत्तर वर्ष की हो चुकी थी अभी तक कोई उन्हें इस योग्य नहीं मिला था  जिसे वे अपना उत्तराधिकारी बना पाएँ। उन्हें वैद्यकी सिखाने वाले दवाओं की पहचान कराने वाले नाड़ी का ज्ञान कराने वाले अश्विनी महाराज  यह अच्छी तरह समझा कर गए थे कि यह  विद्या किसी अपात्र को कभी भत देना नहीं तो दवाओं में  उतना असर नहीं रहेगा  अपात्र रोग की पहचान भूल जाएगा हरोश चौबे अपनी गुरू की इस बात को हमेशा ध्यान में रखते थे उनके पास दस  सहयोगी थे जो दवाएँ  जंगल से लाते दवाएँ तैयार भी करते मरीजों का इलाज भी करते पर कभी हरीश चौबे जैसे निपुण नहीं बन  पाते थे।  कभी  उनके बेटे रितेश ने  अपनी विरासत उसे सौंपने की जिद की थी आज वो हरिद्वार ...

कहानी: नफरत की शिकार बेटी

जिस बेटी के जन्म लेते ही उसकी दादी ने उसे जिन्दा ही जमीन में गड़वा दिया था। जो पाँच घंटे बाद भी जिवित निकली थी वही  बेटी बेला दादी के बुढापे का सहारा बनी हुई थी। उसकी सेवाभाव को देखकर  उसकी दादी चंदा  अपने किए पर पछतावा प्रकट कर रोती रहती थीं। जबकि बेला समझाते हुए कहती दादी भूल भी जाओ उस हादसे को मैंने तो आपको माफ कर दिया यह सुनकर दादी कहतीं तूने तो मुझे माफ कर दिया। पर भगवान मुझे कभी माफ नहीं करेगा तेरी ये सज्जनता  मुझे मेरे पाप को भूलने नहीं देती। आज भी दादी उसी घटना को याद कर खूब रोती रही थीं। यह घटना अठ्ठाइस साल पुरानी है  जब बेला का जन्म हुआ था जन्म घर पर दाई के सहयोग से हुआ था। उसकी दादी को जब पता चला कि बेटी हुई है तो उसकी खुशी दुख में बदल गई बेला के पिता बलवंत भी दुखी थे बेटे के लिए उन्होंने कहाँ मन्नत नहीं माँगी थी डोरा ताबीज भी बँधवाए थे ।फिर भी बेटी हुई इस बात का उन्हें बहुत दुख था। वे अनमने होकर वहाँ से चले गए और अपने कमरे में पलँग पर लेटकर अपना मन बहलाने का प्रयास करने लगे। इधर दादी लड़की को देखकर कठोर होती जा रही थीं बेला की माँ कमला क...

कहानी: कोयल का बच्चा

जिस चाचा ने अपने बेटे की तरह भतीजे  पूरन सिंह  को रखा था उसी भतीजे ने  बुढ़ापे में उनका साथ छोड़ दिया था उनके निधन होने पर वो उनके अंतिम संस्कार में भी शामिल नहीं हुआ था जिस चाची ने उसे माँ से बढ़कर  दुलार किया था  उनकी भी उसने कोई खोज खबर नहीं ली थी। यह बात चाची सुमन की बेटी निर्मला ने  जब बताई तो  सुनने वालों ने  यही कहा कि चाचा चमनलाल और चाची सुमन ने कोयल के बच्चे  को अपना समझ के पाला था जो बड़ा होते ही अपने पालक को छोड़कर अपने परिवार में शामिल हो गया था। चाचा चमन लाल की दो बेटियाँ थीं उनके एक बेटा भी हुआ था जो दस दिन तक ही जीवित रहा था तथा इलाज और देखरेख के अभाव में मर गया था। चमनलाल उस समय परदेश में काम कर रहे थे उनकी पत्नी सुमन उनके बड़े भाई के यहाँ रह रही थीं भाभी लता ने जिम्मेदारी ली थी उनकी डिलेवरी कराने की वे गर्भवती थीं। भाभी के दो लड़के और एक लड़की थी उनके बड़े बेटे का नाम प्रेम नारायण और छोटे का नाम पूरन सिंह था। पूरन सिंह काला और कुरूप था लता उससे चिढ़ी रहती थीं। जब सुमन की डिलेवरी हुई तो जो बच्चा हुआ वो गोरा तथा सुं...

कहानी: एन्ड्राय्ड फोन

अत्यंत गरीब परिवार की नमिता ने जबसे एन्ड्रायड फोन खरीदा था तबसे वो पढ़ाई में सबसे आगे रहने लगी थी। पढ़ने में वैसे तो वो पहले से ही तेज थी । इन्टरनेट की मदद ने उसे और अच्छा बना दिया था आज जब राष्ट्रीय प्रतिभा खोज  परीक्षा का परिणाम आया तो नमिता उसमें अपना नाम देखकर ख़ुशी से फूली न समाई। अब इससे उसे हर महीने छात्रवृत्ति मिलती रहेगी। जिससे उसकी आगे की पढ़ाई में रुकावट नहीं आएगी। नमिता अपने पिताजी रेवाराम जी जो ईँट के भट्टे पर मजदूरी करते थे  उनसे वो साल भर से एन्ड्रायड मोबाइल खरीदने का आग्रह कर रही थी पर पिताजी हर बार टाल देते थे उनकी आय इतनी कम थी कि परिवार का खर्च ही मुश्किल से चलता था। नमिता सरकारी स्कूल  में कक्षा आठवीं की छात्रा थी जब वो सातवीं में आई थी तब उसने पिता से मोबाइल खरीदने की जिद की थी हाँलाकि उसके स्कूल में स्मार्ट टी वी तो था पर नेट कनेक्शन नहीं था  जब कोई टीचर अपने मोबाइल से हॉट स्पॉट चालू करता था तब वो टी वी चलता था  उसमें नमिता को पढाई का अवसर ही नहीं मिलता था। उसकी अधिकाँश सहपाठी छात्घराओं के पास एन्ड्रायड मोबाइल था  वे उसका लाभ उठा लेती ...

कहानी: बाबा दयालदास की समाधि

छत्तीसगढ़ के वनांचल में स्थित दुर्गापुर गाँव  के सिद्ध मठ के महँत बाबा दयालदास के समाधि स्थल पर भव्य मेला और संत समागम  का आयोजन हुआ था जिसमें बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए थे।  इस अवसर पर क्षेत्र के विधायक रुद्रप्रताप सिंह  ने बाबा दयालदास के नाम से सिविल अस्पताल खोलने की घोषणा की थी बाबा दयालदास का  निधन हुए अभी पाँच ही वर्ष हुए थे  लेकिन उनकी लोकप्रियता इतनी थी कि  हर वर्ष उनकी पुण्यतिथि पर उनके समाधि स्थल पर भारी जन सैलाब उमड़ता था। बाबा दयाल दास दुर्गापुर के सिद्धमठ के महँत बनकर  चालीस वर्ष पूर्व यहाँ आए थे वे पैंतीस वर्ष तक मठ के महँत रहे उनका निधन सौ वर्ष की आयु में हुआ था। वो भी मरीजों का उपचार करते हुए अचानक उनका जी घबराया चक्कर से आए  वे कुर्सी पर बैठे और थोड़ी देर में ही उनके प्राण पखेरू उड़ गए। उन्हें समाधि दी गई थी जिसमें लाखों की संख्या में लोग शामिल हुए थे। बाबा दयालदास जी के गृहस्थ जीवन के विषय में बहुत कम लोग जानते थे उनमें से  उनके परम शिष्य दीपक दास जी भी थे जिन्हें दयाल दास जी के निधन के बाद सिद्ध मठ का महंत बनाय...

कहानी: वक्त वक्त की बात

कभी गौरव पब्लिक स्कूल की प्रिन्सीपल सुषमा की माँ  जिनके के यहाँ झाड़ू पौंछा का काम करती उस घर की बेटी प्रमिला उनके स्कूल में टीचर थी जो उनके अधीनस्थ रहकर कार्य कर रही थी। प्रमिला का पति प्रमोद भी उसी स्कूल में कार्यालय सहायक के पद पर कार्यरत थे सुषमा के पति  सतेन्द्र उस स्कूल के संचालक के साथ ही नगरपालिका अध्यक्ष भी थे।आड प्रिन्सीपल के कक्ष में आयोजित बैठक में  प्रमिला की प्रिन्सीप नमें अच्छी खिंचाई की थी खूब फटकार भी लगाई थी और वो यस मेडम जी मेडम के अलावा कुछ नहीं कह सकी थी उनके पास और कोई चारा बी नहीं था गौरव पब्लिक स्कूल शहर का  सबसे अच्छा स्कूल था । सटॉफ की सेलरी भी अच्छी थी इसलिए प्रमिला ये नौकरी छोड़ नहीं सकती थी। प्रमिला घर आकर यही सब सोच रही थी उसे बीस साल पहले का वो समया याद आ गया जब सुषमा और प्रमिला एक ही कॉलेज  में पढती थीं दोनो ने एम ए बी एड साथ साथ किया था। सुषमा के परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी  उसके पिता का निधन हो गया था। माँ सौरम घरों में झाडू पौंछा लगाकर परिवार का खर्च चला रही थीं  प्रमिला से सुषमा दबकर रहती थी क्योंकि प्रमिला क...

कहानी: क्रूर सास का दुखद अंत

राकेश वर्मा पूरे दस साल बाद इंग्लैंड से भारत आए थे उनकी माँ  कमला का अस्सी वर्ष की आयु में निधन हो गया था उनकी तेरहवीं के कार्यक्रम में आज वे शामिल हुए थे उनके साथ उनकी पत्नी नीता भी साथ थी वे यहाँ होटल में ठहरे हुए थे  क्योंकि घर पर मेहमानों की भीड़ ज्यादा थी।  उनकी तेरहवीं  का कार्यक्रम आज संपन्न हो गया था इसके बाद उन्हें पंद्रह दिन का समय और मिला था  जिसे वो तीर्थ यात्रा कर गुजारना चाहते थे यहाँ वे पिछले तीन दिनों से थे इन तीन दिनों में नीता और उन्हें जो माँ के विषय में जानकारी मिली उससे उनका कलेजा काँप गया इससे नीता भी बहुत दुखी हुई जिस पर उन्होंने कभी अत्याचार की हद पार कर दी थी राकेश को  आज अपना बचपन याद आ रहा था। जब वो छः वर्ष के थे तब उनके पिता  बाबूलाल गाँव के संपन्न किसान थे। उन्होंने राकेश को बड़े लाड़ प्यार से पाला था उनकी हर जिद पूरी की थी राकेश जब आठवीं पास ही हुए थे और उन्होंने राष्ट्रीय प्रतिभा खोज परीक्षा भी पास कर ली थी जिसके कारण उन्हें छात्रवृत्ति मिलने लगी थी।  तभी एक हादसे ने उनका जीवन बदल दिया उनके पिताजी अदरक से भरी ट्राली ...

कहानी: हुनर

रोशन लाल कुंभ के मेले से अपने साथियों से बिछड़कर दो दिन बाद घर आया था। उसे देखकर उसके पिता ज्ञानसिंह ने बड़ी राहत की साँस ली थी। कुँभ के मेले से वो गंगाजल के अलावा अपने बहन भाई और मम्मी पापा के लिए कुछ न कुछ उपहार लेकर आया था। उसके आने से उसके परिवार में प्रसन्नता की लहर छा गई थी रोशन के पिताजी कह रहे थे कि मुझे तेरी बड़ी चिंता थी जीवन में पहली बार तू घर से इतनी दूर  हरिद्वार कुँभ के मेले में गया था । चिंता की बात यह भी थी की तू जिन लोगों के साथ गया था वे सब आ गए थे। जब उनसे तेरे विषय में  पूछा तो उन्होंने कहा कि रोशन लाल तो रेल्वे स्टेशन के पास से ही भीड  अधिक होने के कारण हमसे बिछड़ गया था। फिर वो हमें कहीं भी नहीं मिला वो कहाँ है  इसकी हमें कोई खबर नहीं है। ज्ञान सिंह उनकी बात सुनकर चिंतित हो गए थे । हाँलाकि रोशनलाल बच्चा नहीं था पूरे तेइस साल का नौजवान था।  अपना ख्याल रख सकता था। फिर भी ज्ञानसिंह की चिंता कम नहीं हुई थी। रोशनलाल ने पिताजी से कहा जब वो हरिद्वार रेल्वे स्टेशन पर उतरा तो साथियों के साथ ही था पर भीड़ में किसी ने उसकी  जेब काट ली थी  सा...

कहानी: उल्टी चाल

कृषि विकास अधिकारी हरीश मिश्रा का छः महीने बाद निलंबन समाप्त हुआ था । आज उन्होंने अपनी नौकरी ज्वाइन कर ली थी आज वे बहुत खुश थे और अपने आपको हल्का महसूस कर रहे थे। हरीश अपनों की  साजिश का शिकार हो गए थे जिसके कारण उन्हें सस्पेण्ड कर दिया गया था जिन्होंने सस्पेण्ड कराया था वे सबसे यही कह रहे थे हम इसकी नौकरी खाकर मानेंगे वे हर तरफ से असहाय हो गए थे कहीं कोई उम्मीद की किरण नजर नहीं आ रही थी अपनी पंद्रह साल की नौकरी में पहली बार उनके साथ ऐसा हुआ था।  वे सब तरफ से निराश होकर बस स्टेण्ड  के पास एक पुलिया पर बैठे हुए थे। तभी किसी ने उनकी पीठ पर हाथ रखा जब उन्होंने मुड़कर देखा तो कुर्ता पजामा पहने हुए एक अजनबी से व्यक्ति उन्हें मुस्कुरा कर  देख रहे थे। बोले पहचाना मुझे जब हरीश ने गौर से उन्हें देखा तो फौरन पहचान गए बोले तुम अशोक हो न अशोक बोले सही पहचाना  वे बोले आजकल क्या कर रसे हो अशोक जी बोले  शाजापुर जिले में जिला पँचायत का उपाध्यक्ष हूँ कोई काम हो तो बताना । हरीश बोले काम तो है फिर उन्होंने विस्तार से सारी बातें अशोक जी को बताईं अशोक जी बोले  बस इतनी सी ब...

कहानी: सरकारी नौकरी

इंकम टेक्स ऑफिसर राजीव सक्सेना को आठ साल हो गए थे नौकरी करते करते  वे एक ईमानदारी अधिकारी  के रूप में जाने जाते थे इसिलिए उन्हें विजिलैंस में पदस्थ किया गया था। उनकी पत्नी रागिनी कॉलेज में प्रोफेसर थी दोनों बच्चे बेटी रितु , और बेटा रितिक अच्छे प्राइवेट स्कूल में पढ़ रहे थे कुल मिलाकर वे  खुशहाल जीवन जी रहे थे उनकी शादी नौकरी लगने के बाद हुई थी। उनकी पत्नी रागिनी  सुंदर सुशील और उनकी ही तरह ईमानदार थी यही कारण था कि उनकी आपस में खूब बनती थी। आज फिर उन्होंने करोड़ों रुपये की टेक्सी चोरी पकड़ी थी इससे वे बहुत खुश और उत्साहित थे। पत्नी यह खबर सुनकर!बोली टैक्स चोरों को पकडकर उनसे टैक्स वसूल करना टेक्स चोरी रोकना भी तो देश की सेवा करना है। बस अधिकारी आप जैसा ईमानदार होना चाहिए अगर अधिकारी भ्रष्ट हो तो उससे बड़ा देशद्रोही कोई नहीं हो सकता। राजीव आठ वर्ष पहले तक  प्राइवेट फर्म में नौकरी करते थे।  इसके पहले वे एक कर सलाहकार के यहाँ नौकरी करते थे वो उन्हें मात्र छः हजार रुपया वेतन देते थे  और काम खूब लेते थे उनका कहना था । वेतन कम है तो क्या? काम सीखने  को...

कहानी: तबादला

आखिर खूब भागदौड़ करने और कड़ी मशक्कत के बाद दीपक वर्मा का तबादला उनके गृहनगर के पास के ग्राम  वीरपुर में हो गया था तबादला आदेश आते ही वे जब संकूल केन्द्र रिलीव होने पहुँचे  कार्यमुक्ति आदेश  तैयार करने वाले बाबू ने एक हजार रुपये माँगे थे। दीपक सर को वे पैसे देना  पड़े उन्हें डर था  कहीं उन्होंने ज्वाइन करने में देर कर दी कोई और आदेश निकलवाकर ज्वाइन न कर ले। आज के दौर में सब संभव है  दीपक सर ने जैसे ही बाबू को एक हजार रुपये दिए बाबू ने तुरंत प्राचार्य से आदेश पर दस्तखत कराकर  उसे देते हुए कहा कि आज ही ज्वाइन कर लो मुझे पता चला है एक  और शिक्षक आपका आदेश कैंसिल कराकर  अपना ट्रांसफर उस स्कूल में कराना चाहते हैं  दीपक सर ने पचपन किलोमीटर की यात्रा अपनी मोटर सायकिल से  मात्र पचास मिनिट में पूरी की  फिर संकुल केन्द्र पहुँचे इस संकुल केन्द्र में उनके दो सौ रुपये चाय नाश्ता कराने में खर्च हुए  अनुमति पत्र लेकर वे सीधे वीरपुर स्कूल पहुँचे स्कूल छुट्टी होने में दस मिनिट की देर थे। सारे शिक्षक जाने की तैयारी कर रहे थे प्रधानाध्यापक ओ...

कहानी: शातिर साला

अपने शातिर साले मुकेश को घर में रखने के कारण बेकसूर नरेश को पन्द्रह दिन हवालात की हवा खानी पड़ी थी आज उन्हें पुलिस ने छोड़ा था इसमें उनके खून पसीना बहाकर जोड़े गए दो लाख रुपये खर्च हो गए उनका साला मुकेश कौनसा जुर्म करके आया है उन्हें पता नहीं था वो पूरे दो महीने उनके पास रहा था और दो महीने बाद अचानक चला गया था। उसके जाने के बाद उसके घर एक दिन पुलिस आई और मुजरिम को शरण देने तथा फरार कराने के आरोप में उसे पकड़कर ले गई थी।        नरेश अपने पड़ोसी रितेश को सारी बात बताते हुए कह रहे थे । दिन में तो पुलिस ने उन्हें लॉक अप में बंद कर दिया था पर रात होते ही उनसे सख्ती से पूछताछ हुई पुलिस के सवालों का उनके पास कोई जवाब नहीं था। कोई वास्तव में वे इससे अनजान थे उनकी छोटी सी चाय की दुकान थी वे एक सीधे सादे नेक इंसान थे। सुबह दुकान पर चले जाते थे और शाम को घर आते थे साला जब आया था तब वे घर पर नहीं थे । उनकी पत्नी विमला ने बताया कि ऐसे ही मिलने जुलने आया है कुछ दिन रुकेगा फिर चला जाएगा लेकिन वो पूरे दो महीने रुका रहा नरेश ने तब भी इस पर ध्यान नहीं दिया था जब वो अचानक चला गया त...

कहानी: जेठजी

प्रमिला अपने पिता के बाद अगर किसी को सबसे अधिक सम्मान देती थी तो वो उसके जैठजी सुखरा थे सुखराम जी पुलिस में हैडकाँस्टेबल की नौकरी से रिटायर हुए थे  आज अस्सी वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया था उनके निधन से प्रमिला को इतना दुख हुआ जितना उसके पिता के निधन के समय भी नहीं हुआ था  ।प्रमिला को वो सब कुछ याद आ रहा था जिसके कारण वो अपनी ससुराल में सुख पूर्वक रह सकी थी जिसमें उसके जेठ जी का बड़ा योगदान था। प्रमिला की जब शादी हुई तब वो अठारह वर्ष की थी  सुखराम जी के सबसे छोटे भाई गिरधारी  जो सरकारी स्कूल में टीचर थे ।और कुँवारे थे सुखराम को उनकी शादी की चिंता थी।एक बार वे   पुलिस के किसी काम से इन्दौर आए थे यहाँ उन्हें पता चला  कि उनके जिले के  उनके समाज के रामप्रसाद जी रहते हैं जिनकी किराने की दुकान  है उनके यहाँ विभाग योग्य कन्या है तो वे पुलिस की वर्दी में ही उनके घर चले गए  रामप्रसाद जी उन्हें देखकर घबरा गए वे बोले साहब मुझसे कौनसा अपराध हो गया तो सुखराम जी सहज होकर बोले कोई अपराध नहीं हुआ मैं सरकारी डयूटी पर यहाँ आया था तो सोचा आपसे मिलता चलू...

कहानी: वृद्धाश्रम में जाने का निर्णय

पिचहत्तर वर्षीय कैलाश मौर्य को वृद्धाश्रम  में आए पूरे दस साल हो गए थे यहाँ वे सुखपूर्वक रह रहे थे। उन्हें वृद्धाश्रम में उनके बहू बेटों ने नहीं छोड़ा था। बल्कि बेटे बहुओं के दुर्व्यवहार से तँग होकर वे खुद वृद्धाश्रम  में आए थे। वृद्धाश्रम में उनके  मित्र के अग्रज पहले से ही रह रहे थे  । उनकी शादी नहीं हुई थी उनका कोई वारिस नहीं था इसलिए  वे वृद्धाश्रम में रह रहे थे जबकि वहाँ पर रहने वाले अधिकाँश बहू बेटे वाले ही थे। जिन्होंने वृद्धावस्था में अपने माता पिता को यहाँ छोड़ दिया था। कैलाश जी ने दस वर्षों में यह देख लिया था कि यहाँ जो भी आए वो कुछ दिन उदास रहे और फिर सबमें घुल  मिल गए थे  सब खुश रहते थे। कैलाश जी को भी यहाँ रहने में अच्छा लगता था। वे यहाँ व्हील चेयर पर आए थे और अब  अच्छे चल लेते थे साथ ही सेहतमंद भी थे।  कैलाश जी तेरह वर्ष पूर्व जब शिक्षा विभाग से रिटायर हुए थे तब उनको जो फँड ग्रेच्युटी जी पी एफ की राशि मिली थी  वो बहू बेटे ने चिकनी चिपड़ी बातें कर हथिया ली थी  पैंशन भी बेटा ही निकालता था कैलाश जी की पत्नी का निधन हुए ती...

कहानी: होनहार

दलित वर्ग में जन्में  समर लाल तेइस वर्ष की उम्र में आइ ए एस अधिकारी बन गए थे जब  वे कलेक्टर बने तब उनकी उम्र मात्र पच्चीस वर्ष की थी उनकी योग्यता के सभी कायल थे खुद सी एम उनसे कइ मामलों में परामर्श करते थे। उनके ऑफिस में एक चपरासी था बसंत श्रीधर जो उनके ही गाँव का था तथा उनका हम उम्र भी ।सहपाठी वो उसे इसलिए नहीं कह सकते थे क्योंकि दबंगों के डर से मगसपुर गाँव का कोई दलित अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजता था।  स्कूल न जाने वालों में वे भी एक थे। बसंत श्रीधर समरलाल जी से डरा सहमा रहता था उसे इस बात का खटका था कि अभी उसकी नई नौकरी है  कहीं  वो बदले की भावना से मुझे नौकरी से न निकाल दें क्योंकि श्रीधर के पिताजी जिन दलितों को प्रताडित करते उनमें समरलाल के पिताजी भी थे एक दिन श्रीधर की ड्यूटी समरलाल जी के साथ थी वे एक ही कार में जा रहे थे तब समरलाल जी ने श्रीधर का डर दूर करते हुए कहा था कि जब तक वो कोई ऐसा काम नहीं करेगा जो दंड योग्य हो तब तक वो किसी दुर्भावना के कारण  उसे  परेशान नहीं करेंगे फिर भी श्रीधर का डर दूर नहीं होता था। समरलाल का बचपन  अभावों और ...

कहानी: संघर्षशील बेटी

बचपन से ही संघर्षशील शारदा मुबई में अकेली रहकर एडवरटाइजिंग कंपनी चला रही थी चार सौ करोड रुपये सलाना उसका टर्न ओवर था उसका छोटा बाई निशाँत उसकी कंपनी में ही काम करता था वो वर्क फ्राम होम  करता था उसे प्रतिमाह वेतन शारदा अपनी कंपनी की मद से देती थी।  शारदा के जन्म के पहले  उसकी माँ सावित्री की एक बेटी और थी रोशनी उसका नाम था वो अभी साल भर की भी नही हुई थी कि शारदा  गर्भ में आ गई  सावित्री इसके लिए तैयार नहीं थी उसे आशंका थी कि उसके गर्भ में लड़की ही पल रही है उसने अपने पति सत्यकाँत से कई बार कहा कि वो उसका गर्भपात करा दें लेकिन सत्यकाँत जी ने साफ मना कर दिया बोले में माँ भगवती का भक्त हूँ मैं ऐसा कभी नहीं होपे दूँगा। आखिर सावित्री की आशंका सही निकली शारदा  के जन्म पर वो बहुत रोई सत्यकाँत ने उसे खूब समझाया पर उस पर कोई असर नहीं हुआ। शारदा अपनी बहन रोशनी से पौने दो साल छोटी थी। सत्यकाँत कहते मेरी दोनों बेटियाँ बेटों से कम नहीं है मैं इन्हें पढा लिखा कर योग्य बनाऊँगा जबकि सावित्री  दो बेटी होने से दुखी रहती थी वो रोशनी से तो लाड़ प्यार करती थी पर शारदा से उ...

कहानी: खँडहर

प्रभात पन्द्रह वर्ष बाद अपना घर देखने आया  था वो घर जिसका निर्माण कर वो उसमें अपने परिवार के साथ मात्र तीन साल ही रहा था वही  अब पूरी तरहखँडहर में बदल चुका था उसके दरवाजे खिड़की रेलिंग पानी की टंकी पाईम सब उखाड़कर लोग ले गए थे कुछ पुराने लोग उसे पहचान गए थे पर वे भी घर की इस दशा के विषय में ज्यादा कुछ कह न सके थे। प्रभात सरकारी स्कूल में शिक्षक के पद पर कार्यरत थे अठारह वर्ष पूर्व तक वे संयुक्त परिवार में रहते थे। उन्नीस वर्ष की आयु में जब उनकी  सरकारी नौकरी लगी थी  तब वे अपने पापा मम्मी और चार भाई बहनों के साथ किराये के मकान में रहते थे पिताजी भी सरकारी नौकरी करते थे उस वक्त उनकी तनख्वाह बहुत कम थी जिसमें महीने का खर्च मुश्किल से चलता था। ऐसे में प्भात की नौकरी ने घर की हालत सुधारने में बड़ा योगदान किया  प्रभात ने अपनी तन्ख्वाह से पाई पाई जोडकर एक प्लॉट खरीदकर उस पर छोटा सा मकान बनाया था। तब कहीं उनको किराये के मकान से मुक्ति मिली थी बाद में उसमें दो और कमरे बनवाए गए प्रभात के मार्गदर्शन एवं शिक्षण से उनके छोटे भाई मधुकर की भी सरकारी नौकरी लग गई थी प्रभात ने धन...

कहानी: छूटा मायका

मोहिनी की माँ  कल्याणी का निधन हुए दस वर्ष हो गए थे माँ के निधन के बाद से ही उसका मायका छूट गया था वो एक बार भी मायके नहीं आई थी दस वर्ष  बाद जब पिता किशनलाल का निधन हुआ तब वो मायक आई थी लेकिन भाई भाभी का रूखा और अपमान जनक व्यवहार देखकर वो एक लॉज में ठहरी थी आज उसके पिता की तेरहवीं थी तेरहवीं करने बाद  वो अपने पति और दोनों बच्चों के साथ घर लौट रही थी अब उसका मायका मायका नहीं रह गया था। मोहिनी बर्थ पर लेटी पुरानी बातों को याद कर रही थी। उसने जब से होश सम्हाला था तबसे वो अपने पिता का उसके प्रति रूखा व्यवहार देख रही थी वे उससे बहुत कम बात करते थे कभी मोहिनी को पिता ने  दुलार नहीं किया था मोहिनी की माँ कल्याणी ही उसे लाड़ प्यार से रखती थी। कल्याणी कहती थी जब मोहिनी का जन्म हुआ तो उसके पिता फूट फूटकर रोए थे माँ पे गुस्सा हुए थे बेटे के लिए मन्नत माँगी थी और बेटी हो गई थी उनके दुख का सबसे बड़ा कारण यही था पन्द्रह दिन तक उन्होंने अपनी बेटी का मुँह तक नहीं देखा था। उसके जन्म से उसकी माँ की कदर भी कम हो गई थी उसके जन्म के तीन साल बाद जब उसके भाई विवेक का जन्म हुआ तब पिता के च...

कहानी: वक्त की मार

लावारिश और अर्ध विक्षिप्त अवस्था में सत्तर वर्षीय रजनी वर्मा को वृद्धाश्रम में आए हुए छः महीन हो गए थे डॉक्टरों के इलाज और सही देखभाल  से उनकी हालत में बहुत सुधार हो गया था। आज उनसे जब वृद्धाश्रम की संचालिका नीता दुबे मिलीं तो उनकी हालत में सुधार देखकर बड़ी खुश हुईं । रजनी नीता  की बचपन की सहेली थीं दोनों ने एक ही कॉलेज में पढ़ाई की थी पढ़ाई के बाद एक ही कंपनी में नौकरी। बाद में नीता ने नौकरी छोड़ खुद की कंपनी खोल ली थी तभी से रजनी और नीता का संपर्क टूट गया था नीता मुंबई में आ गई थी। जबकि रजनी कानपुर में ही एक कारखाने में असिसटेन्ट मैनेजर का जॉब करती रही रजनी आजाद ख्याल की लड़की थी शादी के बँधन में बँधना उसे पसंद नहीं था उसे अच्छी खासी तनख्वाह मिलती थी पर वो सारा रुपया उड़ा देती थी कोई उसे कहता बचत करो कल काम आएगी तो कहती मेरे कौनसे बाल बच्चे हैं।  या घर परिवार है मैं तो पेइंग गेस्ट बनकर रहती हूँ और जीवन का आनंद उठाना चाहती हूँ मुझे किसी की रोकटोक पसंद नहीं  पैपा रजनी ने  खूब कमाया। वो दुनिया का कोना कोना देख आई थी लेकिन जब वह साठ वर्ष की हुई  तब कंपनी के ए...

कहानी: हार्मोनियम

संत स्वभाव के रामदास जी  एक सौ दो वर्ष की आयु में हारमोनियम  पर भजन गाते हुए निधन हो गया था उनकी यात्रा में  पूरा इमली खेड़ा गाँव का जन सैलाब उमड़ पडा  उसमें उनके परिवार का कोई भी शामिल नहीं हुआ था उन्हें मुखाग्नि उनके साथ रहने वाले उनके शिष्य शोभाराम ने दी थी। रामदास जी का अंतिम संस्कार करने के बाद लौटते समय सब उन्हीं की चर्चा कर रहे थे । रामदास जी पच्चीस वर्ष पहले हारमोनियम लेकर यहाँ आए थे  और शिवमंदिर के पास बने चबूतरे पर बैठकर भजन गाते थे हारमोनियम के साथ सुरमिलाकर जब वे भजन गाते तो लोग मंत्र मुग्ध होकर सुनते थे पास में ही उनका कुटियानुमा  छोटा सा घर था जिसमें वे शोभाराम के साथ रहते थे शोभाराम का भी दुनिया में कोई अपना सगा नहीं था उसकी उम्र चालीस वर्ष की थी उसकी शादी नहीं हुई थी । वो दस वर्षों से रामदास जी के साथ था पर हारमोनियम बजाना नहीं सीख पाया था उसका कंठ भी अच्छा नहीं था गाना भी नहीं आता था वो तो बस रामदास जी की सेवा करता था और उसी में खुश रहता था कभी कभी रामदास जी  अपने पिछले जीवन के बारे में भी बताते थे  जब उन्हें उनके इकलौते बेटे बंशी...

कहानी: दौलत से प्यार

अतुल इंडस्ट्रीज के मालिक सोमेश  जब अपने कारखाने का अवलोकन करने आए  तो पैकेजिंग विभाग में एक महिला को काम करते देख उसके पास ठहर गए मैनेजर नितिन ने कहा बेचारी मजबूरी की मारी है अभी तीन दिन पहले ही काम पर रखा है । काम तो ठीक ही कर रही है । सोमेश बोले वो बात नहीं है। शायद मैं इन्हें जानता हूँ वे उसके एकदम नजदीक चले गए उसने सिर उठाकर सोमेश देखा। सोमेश  बोले निशा तुम यहाँ ये काम कर रही हो तुम्हारी शादी तो शहर के बड़े रईस रतन राय से हुई थी न निशा भी सोमेश को पहचान गई थी। झेंपते हुए बोली सब समय का फेर है एक वो भी वक्त था जब आपको दो वक्त भरपेट खाना नहीं मिलता था और रतन जी के पिता शहर के धनवान व्यक्ति थे आज वे गरीबी में जी रहे हैं। और आप अतुल इंडस्दीज के मालिक जिनके कई कार खाने शोरूम एव॔ शॉपिंग मॉल हैं। सोमेश कुछ नहीं बोले बस मुस्कुराकर रह गए । सोमेश अपने चैंबर में बैठकर पुरानी यादों में खो गए जब वो मैकेनिकल इजीनियरिंग  में बी ई कर रहे थे पच्चीस साल पुराना दौर थे  उनके पिताजी हम्माली करते थे निशा  ने हायर सेकेण्डरी के बाद  महिला पोलीटेक्नीक में  सिलाई का को...