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मार्च, 2024 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कहानी: गन्ने का रस

संतोष वर्मा का पूरा परिवार बरसात शुरू होते ही ग॔भीर,रुप से बीमार पढ्र गया था पत्नी को टाईफाइड हुआ था लड़के रोहित को पीलिया हुआ था लडकी रूबी को खूनी दस्त लग रहे थे संतोष जी को  किडनी और लीवर में इन्फेक्शन निकला था पूरे जुलाई माह में सबका इलाज चला था जिसमें उनके पूरे साढ़े तीन लाख रुपये खर्च हो गए थे गलती उनकी इतनी थी कि उनके पड़ोस में ठेले पर हाथ की चरखी रख गन्ने का रस बेचने वाले  धनराज से उन्होंने पूरी गर्मी के मौसम में गन्ने का रस लेकर पिया था। बाकी तो घर का बना खाना ही वे सब खाते रहे थे। जब संतोष को गन्ने के रस  के दूषित होने का पता लगा तब तक देर हो चुकी थी। वे एक  रिश्तेदार की शादी में गए थे वहाँ बर्फ की आवश्यकता पड़ी जब वे बर्फ डिपो बर्फ खरीदने गए तो  वहाँ उन्होंने खाने में उपयोग आने वाली बर्फ माँगी सुनकर डिपो वाला मुस्कुराया बोला खाने वाली बर्फ पच्चीस रुपये किलो है। एक क्विंटल की सिल्ली ढाई हजार रुपये की आएगी और सादी बर्फ चार सौ रुपये की केटरर के कर्मचारी ने फोन लगाकर जब अपने मालिक से बात की तो उसने कहा चार सौ रुपये वाली सिल्ली लेकर आ जाओ। बर्फ डिपो वाला बो...

कहानी: बागी

पिछली बार पार्टी से बगावत कर विधायक का चुनाव जीतकर पूरे पाँच साल मंत्री रहे जगजीत सिंह इस बार पार्टी के प्रत्याशी बनकर फिर चुनाव जीत गए थे इस बार भी उनके मंत्री बनने की प्रबल संभावना थी। जगजीत सिंह छात्र जीवन से तिकड़मबाज दबंग  थे क्षेत्र में उनकी जाति के मतदाताओं की संख्या उल्लेखनीय थी। पिछली बार के विधान सभा चुनाव में उन्होंने पार्टी से टिकट माँगा था लेकिन पार्टी ने वर्तमान विधायक प्रकाश  चंद को जिताऊ समझकर टिकट दे दिया था प्रकाश चंद् भी जगजीत सिंह की ही जाति के थे। जगजीत ने  इसके विरोध में निर्दलीय  प्रत्याशी के रूप में अपना नामाँकन  प्रस्तुत कर दिया था इससे नाराज होकर पार्टी ने उन्हें सदस्यता से वंचित कर दिया था। चुनाव में जगजीत  का जोर देख कर तथा प्रकाश चंद्र के दवाब में आकर जगजीत सिंह को पुराने आरोप में बंद कर जेल में डाल दिया था  जेल में जगजीत सिंह की मुलाकात अनेक मुजरिमों से हुई  उनमें कई ऐसे थे जिनका बाहर बड़ा प्रभाव था  वे सब जगजीत सिंह के समर्थक बन गए थे प्रकाश के रूखे व्यवहार और भ्रषाटाचार से जनता वैसे ही त्रस्त थी। इसलिए जनता ने ...

कहानी: सेल्फी

एस डी ओ पी रवीन्द्र वर्मा पुलिस विभाग के ईमानदार और तेज तर्रार अधिकारी थे कई अनसुलझे केस उन्होंने सुलझाए थे यही कारण था कि अभी उनकी सात वर्ष की नौकरी हुई थी और वे सब इंस्पेक्टर से तरक्की करते हुए एस डी ओ पी बन गए थे। विभाग के वरिष्ठ अधिकारी  भी  उनके सुझावों का सम्मान करते थे। नौ वर्ष पूर्व एक घटी एक घटना ने उनकी जिंदगी बदल दी थी उस समय रवीन्द्र के पिता रमेश ठैकेदार के यहाँ मिस्त्री का काम करते थे। ज्यादा आमदनी थी नहीं ऐसी  स्थिति में भी उन्होंने रवीन्द्र को बी ए तक पढ़ा दिया था।  बी ए पास करने के बाद रवीन्द्र बेरोजगारों की भीड में शामिल होकर नौकरी की तलाश कर रहे थे  उनकी पुलिस विभाग में जाने की इच्छा थी इसकी वे तैयारी भी कर रहे थे। हाल ही में पुलिस कांस्टेबल भर्ती परीक्षा का रिजल्ट आया था उसमें उनका नाम नहीं था इससे वे बहुत दुखी थे दूसरी  ओर उनका सहपाठी दिनेश  जो उनसे हर मामले में कम था  उसका चयन हो गया था दिनेश के पिता  ओमप्रकाश  रवीन्द्र के पिता  रमेश के मित्र थे। वे बड़े खुश थे उन्होंने रमेश को उदास देखकर कहा कि बिना जुगाड़ के न...

कहानी: समय का फैर

आज भले सुखदयाल सर  धन संपन्न हों पर उनका डचपन घोर गरीबी में बीता था उनके पिता तथा माँ दूसरों के खेतों में मजूरी करत थे वे आज जिस हायर सेकेण्डरी स्कूल के प्रिन्सीपल हैं  कभी वो प्राथमिक विद्यालय हुआ करता था। वे उसी स्कूल में आठवीं तक पढ़े थे उनकी किस्मत से जब वो पाँचवी पास हुए थे तब उस स्कूल को मिडिल तक उन्नत कर दिया गया था जो उनके साथ पाँचवी तक पढ़ी थी  रामसखी वो उनके ही स्कूल में चपरासी थी।  जब सुखदयाल पाँचवी में पढ़ते थे तब रामसखी उनकी सहपाठी थी उस समय रामसखी के पिता बुधराम और उनके पिता कीरतलाल साथ में मजदूरी करते थे बुधराम कहा करते थे कि वे रामसखी की शादी सुखदयाल से करेंगे सुखदयाल एक होनहार लड़का है कीरतलाल भी रामसखी को अपनी बेटे की भावी बहू के रूप में देखते थे। पाँचवी पास करने के बाद  बुधराम ने रामसखी की पढ़ाई छुड़वा दी कीरतलाल ने बहुत समझाया पर बुधराम ने उनकी एक न मानी रामसखी किशोरावस्था में प्रवेश कर रही थी इसलिए उसका स्वतंत्रता से कहीं आना जाना  रोक दिया गया था। बरखेड़ा गाँव में कीरतलाल का परिवार ही ऐसा था जो पूरी तरह शाकाहारी था।  वे शराब का से...

कहानी: नहीं मिली अनुकंपा नौकरी

निमेष की उम्र बत्तीस वर्ष की हो गई थी  वो फाइनेन्स में एम बी ए करने के बाद भी एक  फाइनेन्सर के यहाँ मात्र नौ हजार रुपये प्रतिमाह में सहायक की नौकरी कर रहा था जिसमें तीन हजार रुपये कमरे का किराया चला जाता था बाकी छःहजार में उसका खुद का गुजर मुश्किल से होता था। उसकी माँ निर्मला सरकारी विभाग में कार्यालय सहायक थीं उनकी मौत कैंसर से हो गई थी।  निमेष के पिता रामगोपाल खुद सरकारी नौकरी कर रहे थे इस कारण निमेष को अनुकंपा नौकरी नहीं मिली थी। रामगोपाल तो तिरेपन साल की उम्र में दूसरी शादी कर सरिता को घर ले आए थे सरिता भी सरकारी नौकरी कर रही थी। उसकी चौदह वर्ष की बेटी थी अंजलि उसके पति का निधन दुर्घटना में हो गया था वो भी सरकारी नौकरी करते थे जिससे सरिता को अनुकंपा नौकरी मिल गई थी ।रामगोपाल ने उसकी बेटी अंजलि को तो अपना लिया था लेकिन अपने बिन माँ के बेटे निमेष को घर से निकाल दिया था। इसका कारण ये था कि जब निर्मला की मौत हुई तब सबने रामगोपाल को समझाया कि आप रिटायरमेंट ले लो जिससे निमेष को माँ की अनुकंपा नौकरी  मिल जाएगी फिर निभेष की शादी करके  बहू ले आना और सुखपूर्वक रहना इत...

कहानी: खोया अवसर

प्रकाश  पन्द्रह वर्ष बाद अपने गृहनगर शाहपुर आया था  जहाँ उसके भतीजे  नवीन की शादी थी। आज वह जब टेलर की दुकान पर गया तो उसे अपना सहपाठी प्रताप मिल गया वो टेलर की दुकान पर कपड़े सिलने का कार्य कर रहा था। प्रताप उसे देखकर बहुत खुश हुआ अभी दुकान  पर उसके पास कोई काम नहीं था इसलिए दोनों बातें करने लगे  प्रताप ने बताया अड़तीस साल से इस दुकान पर काम कर रहा हूँ। नो सौ रुपये महीने से काम शुरू किया था और अब नौ हजार रुपये महीने के मिल रहे हैं। आज के मँहगाई के दौर में बड़ी मुश्किल से गुजारा हो रहा है। छप्पन साल की उम्र हो गई अब और कोई काम कर नहीं सकता । फिर उसने प्रकाश से कहा तू बता तेरे कैसे हाल हैं  इस पर प्रकाश बोला बहुत बढ़िया हैं कुल मिलाकर एक लाख दस हजार रुपये महीन तनख्वाह मिल रही है। घर मकान दुकान जमीन जायदाद सब कुछ है बच्चे भी अच्छा कमा रहे हैं  बेटी दामाद भी संपन्न हैं। घर में कोई कमी नहीं है। प्रकाश की बात सुनकर प्रताप उदास हो गया कहने लगा नौ हजार में और एक लाख दस हजार में जमीन आसमान का अंतर है  काश अड़तीस साल पहले मैंने तेरी बात मान ली होती तो आज म...

कहानी: गन्ने की चरखी

हाथ से चलने वाली गन्ने की  चरखी से रस निकाल कर अपने धंधे की शुरुआत करने वाला राम किशन आज फल फूल और सब्जी का माना हुआ व्यापारी था। शहर की पाश कॉलोनी में उसका आलीशान घर था गणमान्य नागरिकों में उसकी गिनती होती थी ।आज वो  शहर के उस स्थान पर गया था जहाँ पन्द्रह वर्ष पूर्व  वो  सब्जी का ठैला लगाता था।   वहाँ उसे हरलाल तथा रामलाल अब भी ठेले पर सब्जी बेचते हुए मिल गए।  वे राम किशन को देख कर बड़े खुश हुए दोनों ने उससे उस  गलती की माफी माँगी जिसके कारण रामकिशन को सब्जी का धंधा बंद कर गन्ने का रस बेचना पड़ा था।  रामकिशन ने उनसे कहा तुम्हारी उस गलती ने ही तो मुझे इस  मुकाम पर पहौँचाया वरना मैं आज तुम्हारी तरह यहाँ ठेले पर सब्जी बेच रहा होता । रामकिशन जबसे वहाँ से लौटकर आया तबसे ही उसके मन में पुरानी यादें ताजा होकर उसे  व्यथित कर रही थीं। जब वो ठेले पर सब्जी बेचता था तब रामलाल और हर लाल से उसका ग्राहकों को लेकर विवाद हो गया था। हरलाल और रामलाल ने मिलकर रामकिशन का धंधा चौपट करने की साजिश रची।  वो उससे सस्ती सब्जी बेचने लगे। दिन भर वो खाली ब...

कहानी: किए का फल

आज विकास बहुत दुखी था आज वो अपनी बहन सरेखा की अंत्येष्टि कर के आ रहा था। जिसे उसके ससुराल वालों ने घासलेट डालकर जला दिया था। इसमें उसका पति मोहित भी शामिल था। वे सब तो हवालात में बंद थे। सभी चाहते थे दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा मिले। ये हत्या दहेज के कारण की गई थी  जिससे सभी आक्रोशित थे। विकास को ऐसे मौके पर वो घटना याद आ रही थी जो पाँच वर्ष पूर्व उसके और उसकी पत्नी  विनीता के  साथ घटने से बची थी। विकास जो कॉलेज में प्रोफेसर था। पाँच वर्ष पूर्व वे सब साथ रहते थे। वहीं विकास की शादी विनीता से हुई थी।  विनीता फिजिक्स में  एम एस सी टॉपर थी बी एड भी थी। वो बहुत सुंदर थी। शादी के कुछ दिनों तक तो सब ठीक चला बाद में हालात बिगड़ने लगे विकास की बहन सुरेखा  विनीता से खुन्नस रखने लगी थी। वो माँ को विनीता के खिलाफ भड़काती, माँ भी सुरेखा की बातों में आकर  विनीता को प्रताड़ित करती। विनीता अब ससुराल में डरी सहमी और असहज रहने लगी थी।  विनीता ने उच्चमाध्यमिक शिक्षक चयन परीक्षा दी थी जिसमें उसका चयन हो गया था इससे वो बहुत खुश थी जबकि  सुरेखा को उसकी खुशी बर्दा...

कहानी: वेटनरी डाॅक्टर

वेटनरी डॉक्टर रवि वर्मा शहर के माने हुए पशुचिकित्सक थे। शहर में उनका काफी नाम था। वे लोकप्रिय भी थे। ज्यादातर पशुपालक अपने बीमार पशुओं का उनसे इलाज कराना पसंद करते थे। वे शहर के सरकारी पशु चिकित्सालय में पदस्थ थे। अस्पताल के इंचार्ज भी वे ही थे। आज भी जैसे ही वे अस्पताल बंद कर घर आए तो वहाँ पर उन्होंने पशुपालकों की भीड़ देखी। जैसे तैसे भोजन कर वे फिर पशुओं के उपचार में जुट गए, उन्हें मूक पशुओं का इलाज कर बहुत संतोष मिलता था।  रवि वर्मा ने अपनी नौकरी की शुरूआत चपरासी के पद से की थी। जो उन्हें पिताजी सुखराम के निधन के बाद अनुकंपा में मिली थी। उस वक्त वे हायर सेकेण्डरी पास नहीं थे इसलिए उन्हें चपरासी बनाया गया था। रवि वर्मा की उम्र तब अठारह वर्ष की हुई ही थी। कि पिताजी का निधन हो गया। उस समय रवि वर्मा कक्षा गयारह में पढ़ते थे। बारहवीं पास नहीं होने के कारण उन्हें चपरासी की नौकरी मिली थी। इसके एक साल बाद ही वर्मा जी ने हायर सेकेण्डरी परीक्षा अच्छे अंकों से पास कर ली थी। पर फिर भी उन्हें फोर्थ क्लास से उन्नत नहीं किया गया था। पशुचिकित्सा सहायक के पद पर रवि ...

कहानी: टिफिन सेंटर का खाना

विनोद और नरेश एक ही शहर के रहने वाले थे नौकरी भी एक ही ऑफिस में कर रहे थे अंतर ये था कि विनोद ट्रेजरी ऑफिसर के पद पर कार्यरत थे और नरेश कार्यालय सहायक के पद पर। जबकि नरेश  सेवानिवृत लेखाधिकारी राम मोहन का लडका था और विनोद  के पिता माखनलाल मजदूरी करते थे। वैसे तो दोनों बचपन के दोस्त थे मगर ऑफिस में मर्यादा का पालन करते थे। आज बहुत दिनों बाद  नरेश के पिता राम मोहन से विनोद की भेंट हुई थी उनका कोई बिल पेंडिग था जिसका मुगतान होना था। उनका काम तो हो गया। वे विनोद के प्रति आभार प्रगट करने आए बोले बेटा तुम्हें देखकर टिफिन सेंटर के खाने की याद आ जाती है ।तुम्हारा वो अहसान में कभी भूल नहीं पाऊँगा जिसके कारण नरेश मौत के मुँह में जाने से बचा था। राममोहन की बात सुनकर विनोद को भी वो पुरानी बातें याद आ गईं थीं विनोद घर पर बैठे उन्हीं  यादों में खोए हुए थे। यह बात उन दिनों की है जब  विनोद बी कॉम प्रथम वर्ष में पढ़ते थे  वहीं नरेश और उसके तीन दोस्त अजीत, राकेश तथा रोशन भी पढते थे। वे चारों फ्लेट में किराये से रहते थे जिसका किराया पन्द्रह  हजार रुपये महीना था।  जब...

कहानी: रामधन सेठ की छतरी

कभी गाँव  रतनपुर की सबसे रमणीक जगह रही रामधन सेठ की छतरी तथा उससे लगा बाग आज जुआरियों और शराबियों का अड्डा बन चुका है। पूरा बाग बिक गया है और उस पर कॉलोनी बन गई है अब वहाँ आम जामुन के पेड़ नहीं रह गअः है। हरिसिंह काका जी जो गाँव के बुजुर्ग थे वे छतरी के पास बने चबूतरे पर बैठकर गाँव के युवक रोहित को राभधन सेठ के बारे में बता रहे थे। रामधन सेठ साठ वर्ष पुर्व  रतनपुर ग्राम के संपन्न व्यक्ति में गिने जाते थे  उस समय रतनपुर गाँव में बिजली भी नहीं थी स्कूल पाँचवी तक था सड़क भी नहीं थी पूरे गाँव में एक राभधन सेठ का मकान ही पक्का था। उस समय गाँव की आबादी तीन हजार थी । रतनपुर उस समय पूरा देहात से कम नहीं था। स्कूल के शिक्षक रामचंद्र गुप्ता  जी रंगमंच के कलाकार थे।  वे गाँव  में नाटकों का  मंचन करते थे । उसमे  रामधन जी  खुले दिल से सहयोग देते  थे उन्हें अपने नाम फैलाने  की चिंता रहती थी गाँव में जब नाटकों का मंचन होता तब रामधन सेठ छाए हुए रहते थे कलाकारों को भोजन और  रहने की व्यवस्था वो ही  करते थे । रामधन सेठ की एक ही लड़की थी जिसक...

कहानी: अवाँछित

ब्रजभूषणदास शहर के जाने माने संगीतज्ञ थे, इसके साथ ही उत्कृष्ट गायक भी। जन्म से ही दृष्टिहीन ब्रजभूषणदास जी का बचपन बड़ा कष्टदायी गुजरा था। आज तो उनके शिष्य बड़े बड़े पदों पर हैं। वे स्वयं भी धन संपन्न हैं।  बेटा दीपक भी अच्छे स्कूल भें पढ़ रहा है   भरापूरा परिवार है। मान प्रतिष्ठा है। सुखमय जीवन जी रहे हैं, इंसान को और क्या चाहिए। ब्रजभूषण दास जी का जिस परिवार में जन्म हुआ था वो परिवार अत्यंत गरीब था। उनके पिता गणेशराम मजदूरी करते थे।  उनका बड़ा भाई  सोहन दास पाँच वर्ष का था।  सोहन दास के बाद उनके पिता चाहते थे कि उनके घर बच्ची जन्म ले लेकिन दृष्टिहीन बेटे के जन्म ने उनकी खुशियों पर पानी फेर दिया था। उनके साथ माता पिता शुरू से ही भेदभाव करने लगे थे। सोहनदास को वे बुढ़ापे का सहारा मानते  थे और ब्रजभूषण दास को भार समझते थे। सोहनदास को उन्होंने बड़े लाड़ प्यार से पाला था । जबकि ब्रजभूषण दास  हमेशा उनसे प्रताड़ित होता रहता था।  ब्रजभूषणदास जब छः वर्ष के हुए तब पास के संगीत महाविद्यालय के प्रोफेसर शिवदयाल शास्त्री से उनका मिलना हुआ। वे भी दृ...

कहानी: जिसका कोई नहीं

नारायणदास आज भले शहर के एक बड़े उद्योगपति थे, समाज सेवी और दानदाता थे। लेकिन उनका बचपन बहुत दुखदायी बीता था। माँ छोड़ कर चली गई, पिता ने घर से निकाल दिया, एक आठ वर्ष के बालक के साथ ये सब हुआ, पर कहा जाता है न कि जिसका कोई नहीं उसका भी कोई न कोई बन ही जाता है। नारायण दास ने बचपन में जब होश सँभाला तबसे उसने माता पिता को लड़ते और कलह करते ही देखा था। नारायणदास का पिता गिरिवरदास  पक्का शराबी जुआरी और सटोरिया था। कमाता एक रुपया भी नहीं था। विरासत में जो जमीन जायदाद मिली थी उसे बेचकर अपने शौक पूरा करता था। नारायणदास की माँ रोहिणी  शौकीन महिला थी। उसकी अपने पति से बिल्कुल नहीं बनती थी। गिरिवर दास कई कई दिनों तक घर नहीं आता था। इसका फायदा उठाकर मोहल्ले के श्यामसिंह ने रोहिणी से निकटता बढाना शुरू कर दी थी। वो निकटता आकर्षण में बदल गई। एक दिन वो आया जब वो अपने आठ वर्ष के मासूम बच्चे को छोड़कर अपने प्रेमी श्यामसिंह के साथ हमेशा के लिए चली गई। नारायणदास बिना माँ के कैसे रहेगा ये भी नहीं सोचा। उसकी ममता मर चुकी थी। जब गिरिवरदास दो दिन बाद घर आया तब नारायणदास ने बताया कि माँ तो हमेशा के लिए...

कहानी: माँ जाई बहन

सुमन पूरे साल भर बाद राखी पर मायके आई थी सभी उसके आने से बहुत खुश थे। सुमन की मम्मी   सुनीता की आँखों से तो ख़ुशी के आँसू छलक पड़े थे।, दोनों भाई विजय और अजय ने  भी सुमन के आने पर कहा था अब हमारी राखी भी अच्छे से मनेगी बड़ी बहन जो आ गई है सुमन को  पापा सोहन लिवाकर लाए थे वो ही कह रहे थे कि त्यौहार पर बिटिया घर न हो तो बुरा लगता है। सुमन की बिटिया रवीना तथा बेटे विकास की तो ख़ुशी का ठिकाना नहीं था। आज सब भले ही एक दूसरे से घुले मिले लग रहे थे लेकिन पच्चीस वर्ष पहले ऐसा नहीं था।  ये तब की बात है जब सुनीता के पति  रात को मोटर सायकिल से घर आ रहे थे। रात का गहरा अंधेरा था  अचानक गाड़ी का संतुलन बिगड़ा और वे तीस फीट गहरे सूखे नाले में मोटर सायकिल समेत गिर गए उन्होंने उस समय हेलमेट नहीं पहना उनके सिर में जबर्दस्त चोट लगी थी  वे वहीं खत्म हो गए थे  तब सुमन तीन साल की थी । पति के मरने पर सुनीता के  ससुराल वालों ने उससे मुँह मोड लिया था सुनीता सुमन को लेकर मायके आ गई थी मायके में सुनीता के भाई मुकेश  भाभी मंजू  और भतीजा रोहन था मम्मी सुल...

कहानी: ईमानदार

आइ ए एस अधिकारी हरिमोहन श्रीवास्तव मुख्यमंत्री जी के सटॉफ अधिकारी थे वे अपनी ईमानदारी के लिए पूरे प्रदेश में विख्यात थे प्रदेश के मुख्यमंत्री नवीन जी भी बेदाग छवि के जन नेता थे । हरिमोहन जी को इसी एक कारण से मुख्यमंत्री जी ने अपने स्टॉफ में शामिल किया था। उनके प्रयासों से भ्रष्टाचार जड़ से तो समाप्त नहीं हुआ था पर उसकी जड़ें हिल अवश्य गईं थीं। हरिमोहन जी ने दस वर्ष पूर्व जब नौकरी की शुरूआत की थी वे तब तहसील दार थे और प्रदेश के दूरस्थ भाग में  उनकी पहली पदस्थापना हुई थी तहसील मुख्यालय का नाम था दुर्गापुर वहाँ कुछ ही दिनों में उन्होंने एक दमदार ईमानदार अधिकारी के रूप में पहचान बना ली थी।  उनका नाम मुख्यमंत्री जी तक भी पहूँच गया था मुख्यमंत्री जी ने एक दिन उन्हें राजधानी बुलाया तथा उनसे कहा  श्रीवास्तव जी मेरे क्षेत्र  के सिरपुर नगर को मैं औद्योगिक नगर बनाना चाहता हूँ लेकिन उसके लिए दस हजार एकड़ जमीन की जरूरत है। यह जमीन वहाँ उपलब्ध है जो पूरी तरह सरकारी है लेकिन उस जमीन पर जिन दबंगों ने कब्जा कर रखा है उन्होंने हमारी ही पार्टी की सदस्यता ले रखी है सारे अधिकारी उनकी जी ...

कहानी: झूठे शपथ पत्र से मिली अनुकंपा नौकरी।

परितोष  को अड़तीस वर्ष की आयु में दो साल पहले  अनुकंपा नौकरी मिली थी । आज चालीस वर्ष की उम्र में उसकी शादी संपन्न हुई थी।परितोष वैसे तो इंजीनियर  की डिग्री धारी था पर नौकरी उसे चपरासी की मिली थी क्योंकि उसकी माँ कुसुम  भी चपरासी थीं। रिटायर,मेंट में उनके चौदह  वर्ष बाकी थे। पर  स्वास्थ्य ने साथ नहीं दिया   और उनकी मौत हो गई। परितोष वैसे ही बेरोजगार था इसी कारण उसकी शादी नहीं हो रही थी। अनुकंपा नौकरी मिलने के बाद  उसकी सरकारी नौकरी देख शादी के रिश्ते आने लगे थे  अंततः आज उसका घर बस गया था। माता पिता  दोनों जीवित नहीं थे  इसलिए शादी के सारे कार्यक्रम उसके जीजा और दीदी ने  संपन्न कराए थे। परितोष की माँ कुसुम को भी अनुकंपा नौकरी मिली थी उनके पति  छगन लाल  सरकारी दफ्त में बाबू थे। वे किसी काभ से भोपाल गए थे। जहाँ   बस से उतरकर पैदल जा रहे थे तभी  एक टैंकर ने उन्हें अपनी चपेट में ले लिया था  जिससे उनकी वहीं दुखद मौत हो गई थी कुसुम ये सदमा सहन नहीं कर पाई और अचेत हो गई  तीन महीने अस्पताल में भर्ती रह...

कहानी: आत्महंता

रचना एवं अर्चना के पिता का निधन हुए पूरे पाँच वर्ष हो गए थे। आज उनकी बरसी थी जिस पर सभी उन्हें याद कर रहे थे उनके पिता  सतीश राजस्व विभाग में बड़े बाबू के पद पर कार्यरत थे।। जब रचना की शादी में एक माह शेष रह गया था तब अचानक उन्हें हार्ट में तीव्र दर्द हुआ और वे अचेत हो गए थे उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया जहाँ वे तीन दिन भर्ती रहे और अंत में उनका निधन हो गया था। सतीश की पत्नी वीणा सरकारी स्कूल में शिक्षक के पद पर कार्यरत थीं  सतीश के निधन के बाद उनकी किसी भी बेटी को इसलिए अनुकंपा नौकरी नहीं मिली क्योंकि उनकी माँ सरकारी नौकरी कर रही थी। सतीश जी का जब निधन हुआ तब उनकी उम्र बावन वर्ष की थी। दो वर्ष पूर्व भी उनके हार्ट में तकलीफ हुई थी तब भी उन्हें अस्पताल ले जाया गया था एंजियोग्राफी में उनके हार्ट की एक नली में नब्बे प्रतिशत ब्लाकेज का पता चला  था जिसे एंजियोप्लास्टी कर स्टेंट लगाकर ठीक कर दिया गया था सतीश जी को डाइबिटीज की बीमारी भी थी। डॉक्टरों ने उन्हें जो दवाएँ लिखी थीं वे आजीवन चलने वाली थीं जब उन्हें अस्पताल से छुट्टी मिली तब उन्हे हिदायत दी गई थी कि एक तो परहेज करना...

कहानी: आर्टीजन से उद्योगपति

कभी सार्वजनिक  उपक्रम में आर्टीजन से अपनी नौकरी की शुरूआत करने वाले  रेवाराम  आज शहर के सफल उद्योगपति थे करोड़ों रुपयों का उनका टर्न ओवर था हज़ारों श्रमिक उनके कारखाने में काम करते थे।  रेवाराम के पिताजी हरिशंकर जी का  बचपन में ही निधन हो गया था उनकी माँ ने मजदूरी कर उन्हें पाला था जब वे थोड़े बड़े हुए तो  एक मेकेनिक की  दुकान पर काम करने लगे वो उन्हें चालीस रुपये रोज देता था जो वे अपनी माँ को दे देते थे। उनकी पढ़ाई सरकारी स्कूल में सुई थी हायर सेकेण्डरी के बाद रेवाराम जी ने मेकेनिकल में आइ टी आई की थी  फिर शहर के बड़े सरकारी इलेक्ट्रिकल कारखाने में तीन साल प्रशिक्षु रहे इसके बाद वहीं उन्हें स्थायी नियुक्ति मिल गई। वः जिस मशीन पर वे  काम करते थे उसकी पूरी जानकारी उन्हें रहती थी एक बार जब वे काम पर आए तो देखा मशीन बंद पड़ी है। इंजीनियर और उनके शिफ्ट इंचार्ज रमेश वर्मा  के निर्देश पर काम बंद किया गया था भशीन में खराबी आ गई थी। मशीन सुधारने के लिए जर्मनी से मेकेनिक आने वाला था। जिसका आने जाने का खर्च ही लाखों में था। रेवाराम ने मशीन का मुआय...

कहानी: उमराव दादा

अमर पुरा गाँव के उमराव दादा एक सौ दो वर्ष की आयु में भी पूर्णतः स्वस्थ थे। गाँव में उनकी उम्र का कोई  जीवित नहीं बचा था आज से दो वर्ष पूर्व उनकी भी साँस रुक गई थी धड़कन बंद हो गई थी उनके अंतिम संस्कार की तैयारी शुरू हो गई थी स्कूल में  दो मिनट का मौन धारण कराकर छुट्टी कर दी गई थी रिश्तेदार और जाति बिरादरी वाले इकठ्ठे हो गए थे। तभी उमराव दादा के शरीर में हलचल हुई  और वे आँखें खोलते हुए उठ बैठे। उन्हें जीवित देख सबको सुखद आश्चर्य हुआ था। वे दिन में लाठी टेकते हुए गाँव के नीम वाले चौक पर आ जाते थे और अपने जीवन के अनुभव सबको सुनाया करते थे। आज उमराव दादा के पास दस एकड़ सिंचित जमीन है दो पक्के मकान हैं ट्रेक्टर है। सुख सुविधा के सारे साधन हैं। लेकिन उनके बचपन में उनके पास कुछ नहीं था उनके माता पिता बहुत गरीब थे। वे जब बडे हुए तो पटेल के यहाँ हाली लग गए थे। वे कहते थे हमें भरपेट भोजन नसीब नहीं होता था। कभी कभी शाम को पूरा परिवार भूखा ही सो जाता था। वे संत स्वभाव के सरल इंसान थे  गाँव में जब शिवरात्रि और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के त्यौहार आते तो वे घोषणा कर देते जो भी व्रत रखे...

कहानी: गलत कौन

रामदयाल आज चालीस साल की सरकारी नौकरी से सेवानिवृत हुए थे। सेवानिवृति उनके लिए सुखद थी जिम्मेदारी से मुक्ति मिली थी। वहीं अब पूरा समय उनका था उनका भरापूरा परिवार था। पत्नी रुचि अभी भी सरकारी नौकरी में थी उसके सेवानिवृत होने भें चार साल बचे थे। लड़का राजेश इंजीनियर था उसकी पत्नी राधिका सरकारी स्कूल में शिक्षक थी  उनकी लड़की रोशनी डॉक्टर थी उसके पति रोहित भी डॉक्टर थे। उन्हें पचपन हजार रुपये प्रतिमाह पेंशन मिलने वाली थी यह उनके लिए पर्याप्त थी। मकान घर का था जिसमें सामने पाँच दुकाने थी जिनका पिचहत्तर हजार रुपये प्रतिमाह किराया आ रहा था। रामदयाल जी ने जब नौकरी  की शुरुआत की थी तब उन्हें महज डेढ़ सौ रुपये प्रतिमाह तनख्वाह मिलती थी। तब उनके दोस्त कहते थे कि इतने कम वेतन पर नौकरी करने से लाभ क्या  इससे अच्छा तो कोई छोटा मोटा काम धंधा कर लो तो इससे कहीं अधिक कमा लोगे पर राभदयाल इस पर ध्यान नहीं देते थे वे रोज पन्द्रह किलोमीटर सायकिल चलाकर बरखेडा के शासकीय प्राथमिक स्कूल में पढ़ाने जाते थे। दो साल बाद उन्हें पाँच सौ रुपये प्रतिमाह वेतन मिलने लगा था उनके पिता शिवलाल जी ने उनकी शादी...

कहानी: सुखद परिवर्तन

शहर के सबसे बड़े रईस रामरतन  के इकलौते बेटे विवेक ने कारोबार को विगत दो वर्षों में जिस ऊँचाई पर पहुँचाया था उससे वे बहुत खुश थे जो नवाचार उसने किए थे उनके भी अच्छे परिणाम निकले थे। चार वर्ष पूर्व विवेक  ऐसा नहीं था उस वक्त वो निहायत ही गैर जिम्मेदार तथा लापरवाह किस्म का इंसान था वो अनने पिता का सबसे बड़ा निंदक था उसके सारे काम उसके पिता से विपरीत होते थे विवेक  की माँ  रजनी हमेशा विवेक का पक्ष लेती थी यह सब देखकर रामरतन बहुत चिंतित और उदास रहते थे उन्हें अपने व्यवसाय का भविष्य अंधकार में डूबा नजर आता था और याद आता था अपनी गरीबी में गुजारा बचपन रामरतन के दादाजी सूरज लाल नगर सेठ थे लेकिन उनके मरने के बाद रामरतन के पिताजी राधेलाल ने कुछ ही वर्षों में सारा कारोबार चौपट कर दिया था अंत भें उनके पास एक छोटा सा मकान बचा था। सारी जमापूँजी खत्म हो गई थी उसका एक कारण  यह था कि राधेलाल भी अपने पिता की  बातों से सहमत नहीं थे राम रतन की दादी भी अपने बेटे  राधेलाल का ही पक्ष लेती  थीं सूरजलाल ने जब देहत्यागी तब उनके पास खूब संपत्ति थी कई दुकान घर और खेती उनके पा...

कहानी: माँ का फर्ज

राधेश्याम ने दीदी माँ निर्मला  का सत्तर वर्ष की आयु होने पर  स्वास्थ्य परीक्षण कराया था वे पूरी तरह स्वस्थ  थीं यह जानकर वो बहुत खुश था । दीदी माँ को वो बहुत मानता था वैसे तो उन्हें खुद बत्तीस हजार रुपये महीने पेंशन मिलती थीं पर राधेश्याम उनसे पेंशन के पैसों का कभी हिसाब नहीं लेता था वो जो भी कुछ था दीदी भाँ के कारण था। राधेश्याम चार्टर्ड एकाउण्टेन्ट था उसकी खुद की कंपनी थी वो खुद लाखों रुपया महीना कमाता था । जिस घर में रहता था वो आलीशान था उसमें दीदी माँ का कमरा ही सबसे सादगी  पूर्ण था राधेश्याभ के दोनों बच्चे  रिचा और रितेश शहर के सबसे मँहगे स्कूल में पढ़ते थे आज निर्मला जी का सत्तरवाँ  वाँ जन्मदिवस था जो उन्होंने सादगी से मनाया था।  दीदी माँ को राधेश्याम के दोनों बच्चे दादी भुआ कहते थे।निर्मला जी का ज्यादातर समय पूजा पाठ और समाज सेवा में  व्यतीत होता था। बाकी समय वे राधेश्याम के बच्चों के बीच बिताती थीं। वे पूर्ण स्वस्थ थी  उनकी सामाजिक संस्था का नाम संपूर्णा था जिसके माध्यम से वे समाज सेवा करती थीं। आज से चालीस वर्ष पूर्व निर्भला जी का जी...

कहानी: खाई की धूल शिखर पर

वीरभान की देखते ही देखते कायापलट हो गई थी कभी दूसरों के खेत में काम करने वाला अब चालीस एकड़ जमीन का मालिक होकर संपन्न कृषक बन गया था झोपड़ी पक्के आलीशन मकान में बदल गई थी और ये सब दो साल के भीतर हुआ था। सोशल मीडिया  पर गाया उसका स्वलिखित शिव भजन खूब वायरल हो गया था। भजन वायरल होने के साथ ही उसे प्रसिद्ध भजनगायक  रामानुज  ने  अपना स्वर देकर लाँच कर दिया था। इसने देखते ही देखते उसकी सारी गरीबी दूर कर दी थी। काम करते हुए वो जो गीत भजन गाता था उसकी शब्द रचना भी वो खुद करता था। उसके रचित कई भजन और गीत आसपास के गाँवों मे खूब लोकप्रिय थे और गाए जाते थे फाग गायन कार्यक्रम उसके बिना अधूरा माना जाता था उसकी भजन मंडली उसके रचित भजन गाकर प्रतियोगिता में प्रथम पुरुस्कार लेकर आती थी। दो वर्ष पूर्व वीरभान के अंचल के अनेक लोग जो शहर की एक बस्ती में रहते थे उन्होंने वीरभान की भजन मंडली  को गायन के लिए बुलाया था आसपास की और भजन मंडलियाँ भी वहाँ आईं थीं। वहाँ वीरभान की मंडली छा गई थी ढोलक मंझीरा और हारमोनियम पर वीरभान ने स्वचरित भजन गाए थे जो गहरी छाप छोड गए थे। उस समय सोशल मीडिया...

कहानी: सशक्त महिला सरपंच

बरखेड़ा ग्राम की सरपंच कमला को मुख्यमंत्री द्वारा सर्वश्रेष्ठ  महिला सरपंच सम्मान से सम्मानित किया गया था। इसके साथ ही उनकी पंचायत को आदर्श पंचायत भी घोषित किया गया था। वह आज सम्मान कराकर गाँव आई थीं, जहाँ उनका ग्रामीणों ने भव्य स्वागत किया था। वे आज बहुत खुश थीं। उनके पति सुरेन्द्र उस गाँव के पूर्व सरपंच थे। उनके बाद कमला ग्राम की सरपंच चुनी गुईं थीं। उनके कार्यकाल के तीन वर्ष हो गए थे। इन तीन वर्षों में उन्होंने गाँव का कायाकल्प कर दिया था और अब तो वो आदर्ष  पंचायत घोषित हो गई थी। उन्होंने उसके विकास की राह खोल दी। कमला जी को इस स्थिति तक आने में बहुत परिश्रम करना पड़ा था। कई  दुश्मन बने थे और दोस्त भी। आज वे अपने कार्य से संतुष्ट थीं। कमला दलित वर्ग की सरपंच थी। जब वह चुनी गईं तो गाँव के दबंगों की त्यौरी चढ़ गई क्योंकि इसके पूर्व भी सरपंच दलित वर्ग का ही था। जो कमला के पति सुरेन्द्र थे। इस बार बरखेड़ी पंचायत की सरपंच सीट पिछड़ा वर्ग महिला के लिए आरक्षित थी। दबंग जाति के पिछड़े ग्रामीणों में हर्ष था कि अब उसकी जाति की सरपंच बन सकेगी। उन्हें सपने में भी उम्मीद...

कहानी: हायरी किस्मत

कभी संपन्न दुकानदार एवं वर्कशॉप के मालिक रहे रतनलाल जी का घोर दरिद्रता में रहते हुए दुखद निधन हो गया था। उनकी अंत्येष्टि लोगों ने चंदा एकत्र कर की थी। किस्मत ने उनके साथ वो खेल खेला था जिसमें वो कहीं के नहीं रहे थे। उनका अंतिम समय बड़ा दुखदायी और कष्टदायी बीता था। रतनलाल  इस कस्बे के रहने वाले नहीं थे वे अमृत नगर से दस वर्ष पूर्व अपने जमे जमाए कारोबार को छोड़कर आए थे। यहाँ आकर वे अपना कारोबार जमा पाने में असफल हुए जमापूँजी गँवाने के बाद निजी मकान और दुकान बेचकर उन्हें मजदूरी करना पड़ी। छोटे से किराये के मकान में रहना पड़ा था। रतनलाल जब अमृत नगर में रहते थे  तब उनकी स्टील व लोहे के फर्नीचर की दुकान थी। उससे लगी वर्कशॉप भी थी। उनके दो लड़के थे। बड़े लड़के का नाम महेश और  छोटे के नाम उमेश था। अमृतनगर में उनका कारोबार अच्छा चल रहा था, लेकिन एक घटना ने उन्हें शर्मसार कर दिया। वे कहीं मुँह दिखाने के काबिल नहीं रहे। अपना कारोबार समेट कर उन्हें यहाँ आना पड़ा। घटना कुछ इस प्रकार घटी- उनका बडा लड़का महेश जिसकी उम्र बत्तीस साल की थी वो गुजरात  में एक फेक्ट्री में काम...

कहानी: अपने पराये

लखनलाल अस्सी वर्ष की उम्र में भी स्वस्थ जीवन जी रहा था। उसके साथ उसकी वृंदा भी  निरोगी थी। वे अपने पुत्र राहुल तथा पुत्रवधु निकिता के साथ रह रहे थे। बेटी रमा की शादी कर दी थी वो अपनी ससुराल में खुश थी। उनका पोता रितेश और पोती अंजना भी उनसे काफी घुले मिले हुए थे। उनके ऐसे सुखमय बुढ़ापे का कारण उनका वो निर्णय था। जो उन्होंने सही वक्त पर लिया था अन्यथा वो नारकीय जीवन जी रहे होते। बात तब की है जब लखनलाल ड्राइवरी करता था। माता पिता के निधन के कारण उसकी शादी करने वाला कोई नहीं था। वह ट्रक लेकर दूर-दूर तक जाता था। जिस ट्रान्सपोर्ट से वो ट्रक लोड करता था, उसके पास ही उसने एक कमरा किराये से ले रखा था। वहीं वृन्दा भी अपने पूर्व पति शिवलाल के साथ रहती थी। शिवलाल मिस्त्री का कार्य करता था। शिवलाल का एक बेटा श्याम तथा दो बेटियाँ निशा और दिशा थीं।  एक दिन खबर आई कि शिवलाल का काम करते समय बहुमंजिला इमारत से अचानक नीचे गिर जाने के कारण दुखद निधन हो गया। वृंदा के ऊपर ये भारी दुख टूट पड़ा था। शिवलाल के निधन के बाद वृंदा और उसके बच्चों की देखभाल करने वाला कोई नहीं था। वृंदा के सारे रिश...

कहानी: लाड़लों की करतूत

साहब सिंह और उनकी पत्नी कुसुम जबसे अपने बड़े बेटे संतोष के यहाँ आए थे तबसे ही सुखपूर्वक रह रहे थे। इसके पूर्व वे अपने छोटे लाड़ले बेटे  के साथ रह रहे थे वहाँ वे नारकीय जीवन जी रहे थे उनका छोटा बेटा पूरा जोरू का गुलाम था और उसकी पत्नी बेरहम महिला थी। वो सास ससुर पर हर तरह के जुल्म ढाती थी और वो लड़का कुछ भी नहीं कहता था। वे फिर भी जुल्म सहकर रह रहे थे। पर हद तो तब हो गई जब उनके छोटे बेटे की पत्नी ने उन्हें घर से ही निकाल दिया।  वे दोनों सामने के एक टीन शेड में बैठे रहे, ये सोच कर की शायद बहू का दिल पसीज जाए और वो उन्हें वापस घर ले आए। इसी उम्मीद से दिन के चार बज गए थे, अब उनकी आशा निराशा में बदलती जा रही थी। उन्हें लगा कि अगर इन्होंने घर में नहीं बुलाया तो रात कैसे काटेंगे। दिन भर से उन्होंने कुछ भी नहीं खाया था, एक गिलास पानी भी उन्हें नसीब नहीं हुआ था। तभी अचानक देवदूत की तरह उनका बड़ा बेटा संतोष  अपनी पत्नी शाँति के साथ वहाँ आ गया। पहले तो उसने और उसकी पत्नी ने उनके चरण स्पर्श किए। फिर संतोष ने कहा, बाबूजी आपने मुझ तक यह खबर क्यों नहीं पहुँचाई मैं आपका लाड़ला नहीं ...

कहानी: आखिर नौकरी ही करना पड़ी

निखिल आज देर शाम को अपना काम ख़त्म कर के घर आया था वो शहर के एक बड़े होटल व्यवसायी सवाईमल जी के यहाँ एकाउण्टेन्ट के पद पर कार्यरत था जहाँ से उसे बत्तीस हज़ार रुपये  वेतन मिलता था।  उसके काम के मुकाबले वेतन कम था पर उसके पास और कोई विकल्प भी तो नहीं था।  निखिल के पापा रूपनारायण सेवानिवृत कर्मचारी थे।  उन्होंने जब निखिल को घर आते देखा तो राहत की साँस ली निखिल उनका इकलौता लड़का था देखा जाए तो उनकी बर्बादी का वही कारण था। निखिल आज नौकरी मजबूरी में कर रहा था जबकि एक साल पहले वो खुद शहर के तृप्ति रेस्टोरेन्ट का मालिक था जिसमें उसे जब्रदस्त घाटा हुआ था । और वो रेस्टोरेन्टउसे बेचना पड़ा था निखिल के  पिता रूपनारायण जी शासकीय नौकरी से तीन साल पहले रिटायर हुए थे आजकल पेंशन भोगी थे। उनको तीन साल पहले रिटायर मेन्ट के समय पचास लाख रुपये ग्रेच्युटी जी पी एफ एवं कम्युटेशन से मिले थे। दो एकड़ जमीन उन्होंने तीस लाख रुपये में बेची थी। उन दिनों निखिल  बी कॉम कर बेरोजगार था। उसे व्यापार करने की धुन सवार थी। जबकि उसे बिजनिस का कोई अनुभव नहीं था सिर्फ किताबी ज्ञान था। उसे मित्रों...