गजल
तपता रहा
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जेठ में जो खूब ही तपता रहा।
बादलों की ओट ले छिपता रहा।
रौब अपना जो दिखाता खूब था।
आज क्यों हर ऐक से डरता रहा।
चोट खा बैठा नहीं चुपचाप वो।
दोगुना ले जोश फिर लड़ता रहा।
लोग सुनके अनसुनी करते रहे।
जब सही हर बात वो कहता रहा।
आपसे सुख की हमें उम्भीद थी।
दुख मगर क्यों आपसे मिलता रहा।
जो सही थी बात उसने वो कही।
आपको चाहे बुरा लगता रहा।
झूठ वादे आपने कश्यप किए।
मानकर सच राह वो तकता रहा।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
भोपाल मध्यप्रदेश
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