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गजल
मेघ तुम कब आओगे
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दे रही संदेश धरती मेघ तुम कव आओगे।
ढा रहा सूरज कहर जल आप कब बरसाओगे।

सूखकर धरती फटी ऐड़ी के जैसी लग रही।
कब जखम इसके भरोगे कब मलम मलवाओगे।

खेत सब सूखे नदी सूखी सभी तालाब भी।
कब बताओ जल भरोगे राहतें पहुंचाओगे।

पात अपने सब गिराकर पेड़ हैं हड़ताल पर।
एक इनकी मांग पूरी आप कब करवाओगे।

क॔ठ सूखे हैं परिंदों के कहीं पानी नहीं।
आ गए हैं प्राण मुंह में कब तलक तरसाओगे।

ताकते हैं आस्मां को लोग मन में आस ले ।
गड़गड़ा के खूब अपनी कब चमक दिखलाओगे।

जेठ ने कश्यप तपा के कर दिया बेहाल था।
माह सावन का सुहाना आप कब तक लाओगे।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
भोपाल मध्यप्रदेश

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