गजल
ले नाम बस छलते रहेंगे
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दोस्त अपने प्यार का ले नाम बस छलते रहेंगे।
यूं लगेगें वे पराये पर सगे बनते रहेंगे।
लोग सुनके बात उनकी मान लें सच्चा भले ही।
बात झूठी वो मगर हर बार ही कहते रहेंगे।
सामने सबके भले ही रौब से रहते रहे हों।
पर अकेले में खुदी से लोग ये डरते रहेंगे।
साफ सुथरे लोग उनकी भीड़ में शामिल नहीं हैं।
लोग जो कालिख पुते वे कालिखें मलते रहेंगे।
जिंदगी अपनी भले ही मुश्किलों के साथ बीते।
प्यार के लेकिन बराबर सिलसिले चलते रहेंगे।
रास्ते चाहे कठिन हों चाह मंजिल की हमें है।
ये हवा झुलसाएगी तन पांव भी जलते रहेंगे।
बिजलियां कश्यप गिराकर खुश हुई थी बदलियां ये।
पर सुबह उजड़े परिंदे घोसला बुनते रहेंगे।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
भोपाल मध्यपूरदेश
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