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गजल
सोने से वो चमके नहीं
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धूप में काले पड़े सोने से वो चमके नहीं।
देख अपना रंग गहरा यार वे चहके नहीं।

लोग लापरवाह थे जो वे फिसलकर गिर गए।
बोझ जिनकी पीठ पर था वो जरा बहके नहीं।

शांत मन जिनका बहुत था सोच जिनकी थी नरम।
वे रहे शीतल हमेशा आग में दहके नहीं।

आंसुओं का इक समंदर आंख के भीतर रहा।
घोर दुख आए भले पर ये जरा छलके नहीं।

पेड़ था सबसे घना वो छांव से भरपूर था।
बीज कुछ ऊगे मगर उस छांव में पलके नहीं।

दुश्मनों ने फायदा उनका उठाया खूब ही।
लोग जो लड़ते रहे लेकिन रहे मिलके नहीं।

नेकियां कश्यप सफर   आसान सारा कर गईं।
लोग सीथे और सादे राह से भटके नहीं।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
भोपाल मध्यप्रदेश

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