गजल
सबको जगाया बाद में
******************
पहले सुबह सूरज जगा सबको जगाया बाद में।
कांटे लगाए डाल पे गुल को खिलाया बाद में।
ये प्रेम का था इम्तहां जो फेल था वो पास है।
तड़फा दिया पहले बहुत दिल को मिलाया बाद में।
थी सामने कड़वी हकीकत जिंदगी बेहाल थी।
दिन आएंगे अच्छे यही सपना दिखाया बाद में।
थोड़ी दिलासा दे हमें उसने जताया प्यार था।
उस बेरहम से यार ने दिल को जलाया बाद में।
झूठी कसम खाकर बहुत खिलवाड़ वो करता रहा।
हमपे असर कुछ ना हुआ तो तिलमिलाया बाद में।
शैतान था दुश्मन मगर हम भी बहुत मासूम थे।
हमसे वही तगड़ी बहुत फिर चोट खाया बाद में।
कश्यप सजा जिसको समझकर रो रहा था खूब जो।
हासिल हुआ ईनाम तो वो मुस्कुराया बाद में।
*********
रचनाकार
प्रदीप कश्यप
भोपाल मध्यप्रदेश
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें