गजल
सूखी है नदी
****************
ताल सूखे और सूखी है नदी।
आग पानी की हुई कब दोस्ती।
लोग नफरत पाल के जीते रहे।
प्यार से हमने गुजारी जिंदगी।
ये समय गुजरा कहीं ठहरा नहीं।
आखिरी में हो गई इसकी कमी।
झूठ का पल्लू सभी थामे रहे।
जो सही थी बात वो किसने कही।
हो गईं सबकी खतम मनमानियां।
ना तुम्हारी ना हमारी ही रही।
याद हमने सब जुबानी कर लिया।
लिख नहीं हमने रखी खाता बही।
आपको कश्यप लगे छोटी भले।
हर खुशी हमको लगी सबसे बड़ी।
********
रचनाकार
प्रदीप कश्यप
भोपाल मध्यप्रदेश
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें