गजल
धूप से राहत मिली
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प्यार बरसाया जरा सा थूप से राहत मिली।
ताप से झुलसे हुए को छांव सी चाहत मिली।
मुश्किलों में दोस्त सारे छोड़कर के चल दिए।
इस मुसीबत में हमें बस आपसे हिम्मत मिली।
पास का सब कुछ लुटाकर साथ उनका पा लिया।
मत कहो कंगाल हमको प्यार की दौलत मिली।
इस जमाने से सिवा नफरत के हमको क्या मिला।
कह रहे खाकर कसम हम आपसे उल्फत मिली।
रोज सजती महफिलें थीं एक वो भी दौर था।
बाद में उलझे बहुत हम फिर नहीं फुरसत मिली।
जिंदगी आफत भरी ये बोझ सी लगने लगी।
मौत अपनी बात से सबसे अधिक सहमत मिली।
मौज कश्यप आपके जैसी हमारी ना मनी।
जिंदगी भर काम से हमको नहीं रुखसत मिली।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
भोपाल मध्यप्रदेश
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