गजल
बात कुछ कहना नहीं
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हमको सफाई में हमारी बात कुछ कहना नहीं।
लेकिन तुम्हारी बात सुन खामोश भी रहना नहीं।
सब छोड़ दें हमको भले परवाह इसकी क्यों करें।
रहके वहां उनके सितम बिल्कुल हमें सहना नहीं।
उनकी खुशी के वास्ते हंसते रहे हर हाल में।
सूखे हुए ये आंख के आंसू कभी बहना नहीं।
बाहर बहुत थी शांति भीतर सुलगता दिल रहा।
ये राख में बदले कभी दिल इस तरह दहना नहीं।
हमने निभाई दोस्ती इसका यही परिणाम है।
मजबूत हैं रिश्ते बहुत ये भरभरा ढहना नहीं।
जिसकी नहीं फितरत सही उससे हमेशा तुम बचो।
मुख में जहर इसके भरा ये सांप है गहना नहीं।
कश्यप चुनौती जो मिली उसका किया है सामना।
कपड़ा रंगे श्रृगाल सा हमने कभी पहना नहीं।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
भोपाल मध्यप्रदेश
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