गजल
वफा करते रहे
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बेवफा तुझसे वफा करते रहे।
इस तरह जीते हुए मरते रहे।
जब जरूरत प्यार की सबको पड़ी।
फालतू में लोग तब लड़ते रहे।
नेकियां उनसे नहीं बिल्कुल हुईं।
पाप का लेकिन घड़ा भरते रहे।
आखिरी में दोस्ती करना पड़ी।
जिंदगी भर मौत से डरते रहे।
पेट की इस आग से लाचार हो।
जो नचाया नाच वो नचते रहे।
मन रही थी मौज सबकी खूब ही।
दुख हमारे रोज ही बढ़ते रहे।।
कर दिया कश्यप हमें सबसे अलग।
दोस्त भी सब दूर से बचते रहे।
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रचनाकर
प्रदीप कश्यप
भोपाल मध्यप्रदेश
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