गजल
सिर क्यों झुकाए हैं।
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आप उनके सामने सिर क्यों झुकाए हैं।
लादकर जो पाप अपने साथ लाए हैं।
है हमें मालूम आगे क्या करेंगे वो।
चाल उनकी देखकर ये जान पाए हैं।
सामने सबके भले बनते रहे थे जो।
राज उनके खुल गए तो तिलमिलाए हैं।
लोग शामिल हो गए अपनी लड़ाई में।
आज पहली बार दुश्मन मात खाए हैं।
जिंदगी में आप जबसे आए हो मेरी।
सुख तभी से और ये नजदीक आए हैं।
दोस्ती दुख से हमारी इस तरह की है।
ये मिले जब भी हमें हम मुस्कुराए हैं।
कर रहा अभिनय हमारे सामने कश्यप।
झूठ उसने आंख से आंसू बहाए हैं।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
भोपाल मध्यप्रदेश
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