गजल
फालतू पड़ते रहे
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उलझनों में फालतू पड़ते रहे।
बात कुछ भी थी नहीं डरते रहे।
दुश्मनों से जूझना आया नहीं।
आपसी में लोग ये लड़ते रहे।
आपसे ज्यादा नहीं बलवान था।
आप उसके क्यों सितम सहते रहे।
गर्दिशों में साथ कोई ना रहा।
दुख हमारे साथ में रहते रहे।
जो गिरे उनको उठाया ही नहीं।
लोग अपनी राह पर बढ़ते रहे।
जो बुरे वे नेकियों से दूर थे।
पर भले सब साथ में जुड़ते रहे।
राह कश्यप बीच दलदल के बनी।
जो फिसल के गिर पड़े ध॔सते रहे।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
भोपाल मध्यप्रदेश
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