गजल
नेकियों के साथ
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नेकियों के साथ हम रहते रहे।
काम हर अच्छे भले करते रहे।
लोग चाहे कह रहे नादान हों।
पर बदी से खूब हम डरते रहे।
इस शहर में अजनबी हम ना रहे।
रोज ही रिश्ते नए बनते रहे।
लाभ गैरों ने उठाया खूब ही।
आपसी में लोग ये लड़ते रहे।
दुख तुम्हें देकर हुआ वो खुश बहुत।
तुम सितम चुपचाप क्यों सहते रहे।
खुद लुटे अपनी खुशी से यार हम।
वो ये समझे कि हमें ठगते रहे।
रोक वो पाए नहीं कश्यप हमें।
हम हमारी राह पे बढ़ते रहे।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
भोपाल मध्यप्रदेश
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