गजल
सूना लगा संसार सारा
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तुम नहीं थे एक बस सूना लगा संसार सारा।
ढूंढते हम थक गए हैं खो गया है प्यार सारा।
जो निडर हो सच कहे इतनी नहीं हिम्मत किसी में।
चापलूसों से भरा है आपका दरबार सारा।
चीज हर इक बिक रही है कीमते सबकी लगी हैं।
घर दुकाने हो गई हैं बन गया बाजार सारा।
बिक गई उसकी हंसी हर इक अदा का मौल ठहरा।
मतलबों से चल रहा है प्यार का व्यापार सारा।
आखिरी में पास अपने कुछ नहीं हमने रखा है।
बांटकर अपना सभी खाली किया भंडार सारा।
डगमगा वो भी गया जिसने कदम अपने सम्हाले।
जो सहेजा था जतन से वो हुआ बेकार सारा।
कर रहा सबका बुरा कश्यप वही बेचैन हैं अब।
खूब की जिसने बदी सब भूलकर उपकार सारा।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
भोपाल मध्यप्रदेश
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