गजल
साहूकार माने
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चोर को क्यों लोग साहूकार माने।
जो मचाएं लूट चौकीदार माने।
उस नकारा को सभी सिर पे चढ़ाएं।
आदमी जो काम का बेकार माने।
हीन समझें जो करे सबकी भलाई।
डाकुओं को लोग ये सरकार माने।
हाथ फैलाए नहीं हमने कभी भी।
लोग फिर भी क्यों हमें लाचार माने।
नफरतों की दीन दुनिया छोड़कर हम।
प्यार से सुंदर बना संसार माने।
नफरतों की जीत से बदतर नहीं कुछ।
ठीक इससे प्यार में हम हार माने।
यार कश्यप जब मिले बिछड़ा हमारा।
उस दिवस को हम बड़ा त्यौहार माने।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
भोपाल मध्यप्रदेश
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