गजल
धोखा दिया है।
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हमें क्यों आपने धोखा दिया है।
भलाई का यही बदला दिया है।
बिछे जो जाल मुश्किल से हटाए।
हमें फिर आपने उलझा दिया है।
वही अच्छा यहां इक आदमी था।
उसे भी आपने बहका दिया है।
समझ में आएगा सच किस तरह से।
गलत को ही सही ठहरा दिया है।
हमारी बात वो सुनता नहीं हैं।
उसे सबने यहां बहका दिया है।
नतीजे में सिफर निकला सभी के।
गलत हल आपने बतला दिया है।
नहीं मिलता कहीं पे चैन कश्यप।
जख्म उसने मिरा गहरा दिया है।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
भोपाल मध्यप्रदेश
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