गजल
यादें बची हैं
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खो गया सारा समय यादें बची है।
फैसले के बाद फरियादें बची हैं।
बाप मां का हों बुढ़ापे में सहारा।
अब बहुत ही कम वो औलादें बची हैं।
काम से उसको कभी फुरसत मिली ना।
बोझ जिम्मेदारियां लादे बची हैं।
था भवन ऊंचा वहां मैदान अब है।
बस जमीं में शेष बुनियादें बची हैं।
लोग सारे हो गए जालिम वहां के।
अब रहमदिल की न इमदादें बची हैं।
लोग अच्छी बात अब सुनते नहीं हैं।
वाहवाही वो नहीं दादें बची हैं।
फंस गईं कश्यप पड़ीं जो गफलतों में।
हिरनियां ये जाल को फांदें बची हैं।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
भोपाल मध्यप्रदेश
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