गजल
नहीं फिर भेद पाला है।
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किया है प्यार जब दिल से नहीं फिर भेद पाला है।
अंधेरे को हटाकर आ गया कितना उजाला है।
अमीरों के लिए रोटी कमाना है नहीं मुश्किल।
बहुत जोखिम भरा लेकिन गरीबों का निवाला है।
सभी कहते रहे बदलाव आएगा यहां इक दिन।
मगर इसके लिए अपना लहू किसने उबाला है।
दुखों को बांटने वाले किसी पे कब रहम करते।
खुशी जो बांटता आया चलन उसका निराला है।
उजाले की नजर कोई नहीं संभावना आए।
कुटिल हर चाल है उसकी ये दिल भी खूब काला है।
तुम्हारा जो सहारा था उसे तुम छोड़ आए हो।
सगा जिसको समझते थे उसी ने जाल ढाला है।
मुखर कश्यप रहे हमसे जरा सी बात पर झगड़े।
हमारी नेकियों का क्या यही बदला निकाला है।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
भोपाल मध्यप्रदेश
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