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मई, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कहानी: अपना वतन

देवचंद ने सात साल कुवैत में रहकर मिस्त्री का काम किया था। लेकिन भारत में अच्छी संभावनाए देखकर वे पाँच साल पहले फिर अपने देश में आ गए थे और ख़ुशहाल होकर अपनी जिंदगी जी रहे थे। उनके दोनों बच्चे और पत्नी देविका भी खुश थी। वे बड़े ऊँचे सपने सजाकर कुवैत में गए थे पर वे सपने वहाँ रहकर कुछ दिनों में ही चूर चूर हो गए थे। आखिर उन्हें वापस अपने वतन में आना पड़ा था। बारह साल पहले उनके कुवैत जाने में उनके मित्र सतीश का बड़ा योगदान था। वो बड़ी ऊँची ऊँची बात करता था। जब भी घर आता तो खूब पैसे खर्च करता था। उसकी बातें सुनकर देवचंद का भी मन हो गया विदेश में जाकर खूब रुपया कमाने का। उनका बड़ा बेटा ऋषभ तब पाँच साल का था और बेटी रिद्धि तीन साल की। उन्होंने अपने बड़े भाई हरिचंद जी से भी कहा था कि वे भी उनके साथ कुवैत चलें वहाँ कमाई ज्यादा है। पर उन्होंने साफ शब्दों में इंकार कर दिया था। कुवैत में आने के बाद उन्हें ऐसा लगा जैसे उन्होंने बहुत कुछ खो दिया हो। यहाँ आकर उन्हें काम तो मिल गया, आय भी पाँच गुना बढ़ गई थी मगर उन्हें अपने देश भारत की बहुत याद आती थी। एक दिन उन्होंने एक व्यक्ति को देखा कि उसके हाथ कट...

कहानी: ठेकेदार

पी एच ई विभाग से सेवानिवृत बड़े  बाबू रमेश जी ने अपनी ग्रेच्युटी तथा  अन्य फन्ड से अपने प्लॉट पर मकान बनाने का सपना देखा था । इसके लिए उन्होंने अपने मित्र सोहनलाल के कहने पर जिस ठेकेदार  को   मकान बनाने का ठेका दिया था वो उनके पूरे नौ लाख रुपये खाकर भाग गया था । उस ठेकेदार का नाम बटनलाल था उसने अपना फोन भी  बंद कर लिया था । ठेकेदार ने तीस लाख रुपये में छः महीने में डुप्लेक्स बनाकर देने का वादा किया था मगर वो बीच में ही काम छोड़कर भाग गया था हारकर! रमेश जी ने बैंक से कर्ज लेकर  वो मकान पूरा करवाया था ठेकेदार की लूट के कारण वे डूप्लेक्स की जगह सिंगलेक्स बना पाए थे इसमें उनके पूरे दो साल लग गए थे आज उन्होंने अपने नए मकान में गृह प्रवेश किया था। फिर भी वे चिंता मुक्त नहीं हो रहे थे बैंक से जो लोन लिया था उसकी किश्त अठारह हज़ार रुपये प्रतिमाह थी जिसे उन्हें पूरे पाँच सालों तच पेंशन से चुकता करना थी। रमेश बाबू पैंतीस साल तक सरकारी मकान में रहे थे परिवार की जिम्मेदारियों के कारण वे अपना खुद का मकान नहीं बनवा पाए थे  आवासीय भूखण्ड तो उन्होंने पहले ही खरीद...

कहानी: कंजूसी का लेबल

नगर की वृंदावन कॉलोनी में दिनेश और राकेश नाम को दो सगे भाई परिवार सहित एक ही मकान में अलग भूतल और प्रथम तल के हिस्से में रहते थे उनमें राकेश के ऊपर कंजूसी का लेबल लगा हुआ था जबकि वो फिजूल खर्ची नहीं करता था दूसरी तरफ दिनेश जो कि बड़ा भाई था वो और उसकी पत्नी दीपिका खुल कर खर्च करते एक तरह से वे फिजूल खर्च थे जिसका परिणाम यह हुआ कि दिनेश के पास आज भी अपने पेतृक मकान का भूतल वाला हिस्सा था जबकि राकेश जिसका मासिक वेतन दिनेश से कम था उसके पास करोड़ों की संपत्ति थी चार मकान थे जिनमें चौबीस किरायेदार थे । सड़क के फ्रंट का सोलह सौ वर्ग फुट का शाँपिंग कॉंप्लेक्स था जिसमें तीनों तल पर बारह दुकाने थीं इन सबका किराया ही हर माह उसके मासिक वेतन से पाँच गुना ज्यादा आता था इसके बावजूद वो अब भी फिजूलखर्ची नहीं करता था जबकि दिनेश के ऊपर दस लाख का कर्ज होने के बाद भी उनकी फिजूल खर्ची पर रोक नहीं लगी थी। दिनेश सरकारी स्कूल में शिक्षक था और राकेश कृषि उपज मंडी में बाबू के पद पर कार्यरत था दिनेश की नौकरी राकेश से चार साल पहले लगी थी दिनेश की शादी भी राकेश की शादी के तीन साल पहले हुई थी। तब उनकी मा...

कहानी: बेटियों की माँ

ममता चार सुंदर बेटियों की माँ थी। पच्चीस साल पहले उसके पति नरेश ने इसी वजह से उससे तलाक लेकर रजनी से दूसरी शादी कर ली थी। ममता ने इसके बाद कभी दूसरी शादी नहीं की। अपनी बेटियों को ही पढ़ा लिखाकर योग्य बना दिया। आज उसकी चारों बेटियाँ सरकारी नौकरी कर रही थीं। जबकि नरेश के रजनी से चार बेटे हुए थे। चारों ही आवारा थे, अपराधी प्रवृत्ति के  थे। नरेश की कई बार पिटाई करने के बाद उन्होंने उसे घर से निकाल दिया था। आज नरेश को ममता ने किसी घर में भीख माँगते देखा तो उसे बडी हैरत हुई। वो अन्य भिखारियों के साथ पुल के नीचे रह रहा था। उसने ममता से तलाक के बाद सारे रिश्ते तोड़ लिए थे। फिर भी ममता उससे मिलने के लिए पुल के नीचे गई थी। वहाँ से पता चला कि वो हमेशा के लिए ये शहर छोड़ के चला गया है। कहाँ गया है किसी को पता नहीं था। ममता से जब नरेश की शादी हुई थी तब वो सिंचाई विभाग में छोटा बाबू था। ममता भी कम पढ़ी लिखी नहीं थी वो भी एम एस सी बी एड थी। फिर भी नरेश ने ममता को नौकरी नहीं करने दी थी। शुरू में उनके बीच में सब कुछ सही चल रहा था। जब ममता के पहली बेटी निकिता हुई तो उसका नरेश ने ...

कहानी: फुटपाथ का दुकानदार

सरकारी बैंक के असिस्टेण्ट मैनेजर सोमेश शर्मा पच्चीस साल बाद अपने मित्र रमेश सोनी से मिले तो उसकी हालत देखकर चकित हो गए। रमेश सोनी पचास वर्ष की उम्र में ही बूढ़ा लग रहा था। शर्मा जी ने उससे बेतकल्लुफ होने की खूब कोशिश की मगर वो शर्मा जी से झेंप रहा था। शर्मा जी ने पूछा क्या कर रहे हो आजकल? तब उसने बताया एक प्राइवेट बैंक में चपरासी हूँ। पन्द्रह हजार रुपये वेतन मिलता है उसी में चार बच्चियों का लालन पालन कर रहा हूँ। बड़ी बेटी रचना की दो महीने बाद शादी होने वाली है और रुपयों का इंतजाम हो नहीं रहा है। रमेश की बात सुनकर शर्मा जी गंभीर हो गए। बोले ये सब हुआ कैसे? तुम्हारी दुकान का क्या हुआ? और जो ज्वेलरी बनाने के लिए मशीन लगाई थी उसका क्या हुआ? रमेश बोला सब कुछ चौपट हो गया। शर्मा जी के साथ रमेश सोनी आठवीं तक पढ़ा था। इसके बाद उसने पढ़ाई छोड़ दी थी। पिताजी दशरथ सोनी सोने चाँदी के जेवर बनाते थे। उनकी छोटी सी दुकान थी। रमेश भी पिताजी के काम में हाथ बँटाने लगा था। शर्मा जी ने अपनी पढ़ाई जारी रखी थी। पढ़ाई छोड़ने के बाद भी रमेश की दोस्ती शर्मा जी से अभी भी बहुत गहरी थी।...

कहानी: जमीन का सौदा

किशनलाल जी छजूरिया गाँव में रहते थे उनके पास पाँच एकड़ जमीन थी जिसमें वे खेती कर के सुख पूर्वक अपना जीवन यापन कर रहे थे आज वही जमीन उनके इकलौते लड़के सुरेश ने सत्तर लाख रुपये में बिकवा दी थी जमीन बेचते समय उन्हें ऐसा लग रहा था जैसे वो अपनी माँ को बेच रहे हों। बहुत देर तक वे जमीन बेचने पूर्व उस धरती की मिट्टी को माथे से लगाकर फूट फूट कर रोते रहे थे। जमीन बेचने के बाद भी उनके आँसू थम नहीं रहे थे जबकि उनका बेटा सुरेश ख़ुशी से फूला नहीं समा रहा था। किशन लाल ने अपने बेटे सुरेश को बड़े लाड़ प्यार से पाला था उसकी हर जिद पूरी की थी । इसी पाँच एकड़ जमीन की फसल से उन्होंने सुरेश की पढ़ाई का खर्च भी उठाया था गाँव के स्कूल से आठवी पास करने के बाद किशनलाल ने अपने बेटे का एडमीशन श्याम नगर के हायर सेकेण्ड्री स्कूल में करा दिया था । वहाँ से हायर सेकेण्ड्री परीक्षा पास करने के बाद सुरेश ने कॉलेज की पढ़ाई भोपाल में रहकर करने की इच्छा पिताजी से जाहिर की तो किशनलाल जी ने उसका एडमीशन भोपाल के कॉलेज मैं करा दिया उसकी पढ़ाई का सारा खर्च उन्होंने उठाया सुरेश ने एम बी ए करने के बाद भोपाल में ही नौकरी कर ...

कहानी: कपूत

सरोज और उसका पति छोटेलाल मिस्री दो दिन पहले गाँव से कीरत!नगर!आए थे यहाँ उन्होंने एक बिल्डिंग में दो कमरे किराये से लिए थे सुब्ह छोटेलाल काम पर निकल गया था सरोज अपनी पड़ोसन जानकी से बात कर रसी थी तभी लगभग चालीस साल का एक अर्ध विक्षिप् व्यक्ति आया और उनसे कुछ खाने को माँगने लगा सरोज ने दो रोटी और सब्जी लाकर उसे दी और वो उसे थोड़ी दूर जाकर खाने लगा। यह देख जानकी ने सरोज से कहा तुम जानती हो ये कौन है वो बोली भिखारी है। जानकी बोली इसके अलावा ये कीरत नगर के नगर सेठ नारायण दास का बेटा राजेश है।पिता के मरने के बाद इसने सारी संपत्ति बर्बाद कर दी इसकी माँ ने भी इसका साथ दिया अब वो नगर सेठानी भी भीख माँगकर अपना गुजारा कर रही है। जानकी की बात सुनकर सरोज की उतूसुकता बढ़ी तो उसने उनके भिखारी होने का कारण पूछा तब जानकी ने बताया कि इसके पिता नारायण दास बचपन में बहुत गरीब थे । लेकिन उनमें गरीबी को दूर करने की प्रबल इच्छा थी इसके लिए उन्होंने अनथक परिश्रम किया पहले गल्ला मंडी में हम्माली की फिर उसी मंडी में गल्ला व्यापारी बन गए। फिर उन्होंने दाल मिल खोली आटा बेसन मिल खोली चालीस एकड़ कृषि भूमि ख...

कहानी: बेदखल

सौरभ बाबू को उनकी सौतेली माँ ने पैंतीस साल पहले अपने उस घर से बेदखल कर दिया जो उन्होंने खुद बनाया था। उनकी गलती सिर्फ इतनी थी कि जब प्लॉट खरीदा तो उन्होंने अपने पिताजी को आगे रखा। भू स्वामी को पैसों का भुगतान उन्होंने किया तथा पिताजी के नाम रजिस्ट्री कराने के विचार से उन्होंने पिताजी को रजिस्ट्रार के पास भेज दिया। उस दिन उन्हें ऑफिस में बहुत काम था। पिताजी ने उसकी रजिस्ट्री उनकी सौतेली माँ माया के नाम करा दी। घर पूरा बन जाने पर उसी माँ ने उन्हें घर से बेदखल कर दिया था। इसके बाद वे पैंतीस साल तक सरकारी आवास में किराये से रहे थे। रिटायरमेन्ट के बाद वे अपना घर बनवा सके थे। आज उन्होंने अपने नए घर में गृह प्रवेश किया था आज वे बड़े खुश थे। बात सैंतालीस साल पुरानी है जब उनकी उम्र मात्र पंद्रह साल की थी। उनकी माँ सरिता का निधन जब वे छः वर्ष के थे तभी हो गया था। उनके पिताजी करनसिंह ने दूसरी शादी माया से कर ली थी। सौरभ तो यह सोच कर ख़ुश हुए थे कि उनकी खोई हुई माँ उन्हें मिल गई। मगर उस माँ ने उन पर वो-वो अत्याचार किए कि सुननेवाले का कलेजा काँप जाए। सौतेली माँ के दो बेटे हुए बड़े का ...

कहानी: नया जीवन

बहू बेटों के अत्याचार से परेशान होकर जब कुलकर्णी बाबू आत्महत्या करने जा रहे थे तब विमला मेडम ने उन्हें ऐसा नहीं करने दिया था। बाद में उन्होंने विमला मेडम से शादी कर ली थी और आज वे शादी की पाँचवी सालगिरह मना रहे थे। बात आज से छः वर्ष पुरानी है। तब अरुण कुलकर्णी जी की उम्र छप्पन वर्ष की थी। वे शिक्षा विभाग में एकाउण्टेन्ट के पद पर कार्य करते थे। उस समय वे बहुत परेशान रहा करते थे। उनका इकलौता बेटा नीरज और उसकी बहू रीना ने उनका जीना हराम कर रखा था। रीना तो यहाँ तक कहती थी कि मैं तेरी जिंदगी बर्बाद कर दूँगी तुझ पर छेड़छाड़ का झूठा इल्जाम लगाकर। वो उन्हें ब्लेकमेल कर रही थी उसका चाल चलन ठीक नहीं था। उनका बेटा नीरज सब कुछ जानते हुए भी रीना का साथ देता था। वो जब उन्हें मानसिक प्रताड़ना देती तो नीरज चुप रहता था। जब वे बहुत परेशान हो गए तो आत्महत्या करने का विचार उनके मन में आया। यह विचार इतना मजबूत हुआ कि उन्होंने उसी रात को अपनी जीवन लीला खत्म करने का निर्णय ले लिया। विमला जो कि सरकारी स्कूल में शिक्षक थी। वो उस दिन ऑफिस में जी पी एफ पर लोन का प्रकरण लेकर आई थी। वे उसका...

कहानी: तोड़ना ही पड़ी दीवार

रायनगर के बड़े बाज़ार में शर्मा जी सत्तर साल पुरानी कचौरी की दुकान थी। उनकी दुकान की कचौरी से रायनगर की पहचान बनी थी। दिन के दस बजे से रात के ग्यारह बजे तक उनकी दुकान से हजारों कचौरियाँ बिक जाती थीं। दुकान के संस्थापक रामकिशोर शर्मा जी का निधन हुए सात साल हो गए थे। इसके बाद पाँच साल तक वो दुकान दो भागों में बँट गई थी जो दो साल पहले फिर एक हो गई थी। आखिर दोनों भाईयों ने अलग होते समय जो दीवार खड़ी की थी वो गिरा दी थी। दुकान के एक होते ही दुकान से कचौरी की बिक्री चार गुना बढ़ गई थी। आज रामकिशोर जी के दोनों बेटे हरि ओम तथा शिव ओम उस दुकान को चला रहे थे। उससे होने वाली आय को दोनों बराबर हिस्से में बाँट लेते थे। शर्मा जी की कचौरी की दुकान पन्द्रह फीट चौड़ी थी तथा नब्बे फीट लंबी। जिसमें पन्द्रह बाई साठ फीट में दुकान और होटल थी तथा ऊपर शर्मा जी अपने परिवार के साथ रहते थे। रामकिशोर शर्मा जी ने यह दुकान सत्तर साल पहले शुरू की थी। इसके पहले रामकिशोर जी की अपने पिताजी कमलकिशोर जी से कुछ कहा सुनी हो गई थी और वे घर छोड़कर चले गए थे। तब उनकी उम्र मात्र सोलह साल की थी। रायनगर से वे श्याम...

कहानी: लकड़हारा

ग्राम हिरनखेड़ा के सरपंच रतन सिंह के पूर्वज दामोदर प्रसाद सिंह अठारह सौ सत्तावन की क्रांति के समय आजमगढ़ से मध्य प्रदेश में आए थे और हिरनखेड़ा ग्राम में आकर बस गए थे। उनके पास खेती तो नहीं थी मगर बैलगाड़ी और बैल थे जिन से वे जंगल से जलाऊ लकड़ी लाकर शहर में बेचते थे। तब उनकी उम्र बाईस साल की थी। उनकी पत्नी ललिता बीस वर्ष की थी। उनके नौ लड़के थे तथा एक लड़की थी। आज उनके कुटुंब से पूरा गाँव भरा हुआ था। गाँव में उनके तीन सौ घर थे। सारे संसाधनों पर उनका कब्जा था और आसपास के गाँवों में उनका दब-दबा कायम था। दामोदार जी के विषय में लोग कहते थे कि उनका किसी से झगड़ा हो गया था। जिससे झगड़ा हुआ उसकी जाति का गाँव में बाहुल्य था। इसलिए वे दबकर रह गए थे पर उन्होंने प्रण कर लिया था कि वे गाँव में अपना प्रभुत्व बनाकर मानेंगे और उनके नौ लड़के हो गए। सबसे बड़े लड़के के नाम महावीर सिंह था। वे सब भाई मिलकर रहते थे। महावीर सिंह बहुत दबंग जुझारू इंसान था। उसने वन विभाग की डेढ़ सौ एकड़ जमीन पर कब्जा कर लिया था। गाँव में किसी की हिम्मत नहीं होती थी उनसे टकराने की। उस जमीन ने उन्हें संपन्न बना दिया था। नौ लड़क...

कहानी: ससुराल

राजेश रामा खेड़ी गाँव में दर्जी का काम करता था गाँव में ही उसकी टेलर की दुकान थी पूरे तीन साल बाद आज उसकी पत्नी विमले मायके से उसके पास आई थी विमला को अच्छी तरह से ये बात समझ में आ गई थी कि पति के साथ रहकर ही वो सुख से रह सकती है।  राजेश की शादी पाँच साल भोपाल में रामदयाल जी की बेटी विमला से हुई थी। शादी के बाद जब विमला पहली बार ससुराल आई तो उसे गाँव का माहौल,अच्छा नहीं लगा छृ महीने तो उसने जैसे तैसे निकाले फिर वो जो मायके गई तो वापस नहीं आई राजेश जब उसे लिवाने गया तो सास ने विमला को भेजने से इंकार कर दिया कहा मेरी बेटी गाँव में नहीं जाएगी तुम्हें अगर इसके साथ रहना है तो भोपाल में आकर रहो। राजेश ने यह बात गाँव में आकर,अपनी माँ से कही इस पर उसकी माँ ने कहा बेटा तेरी खुशी में हमारी खुशी तू भोपाल चला जा बहू चे साथ सुखपूर्वक रह हमें कोई एतराज नहीं है। राजेश भोपाल आकर अपनी पत्नी के साथ रहने लगा था विमला ने मायके के पास ही एक घर किराये से ले लिया था। इसके बाद भी राजेश सुखी नहीं था यहाँ आकर राजेश ने टेलर की दुकान पर नौकरी कर ली थी। वो सास की दखलंदाजी से परेशान था। विमला के दो भाई थ...

कहानी: दुकान

रायल हेयर कटिंग दुकान के मालिक घीसी लाल जी आजकल दुकान पर बहुत कम समय के लिए आते थे। उनकी उम्र सत्तर साल हो गई थी। दुकान उनका बड़ा लड़का राकेश चला रहा था। छोटे लड़के किशन लाल की इलेक्ट्रानिक्स की दुकान थी। घीसी लाल जी के पास दो मकान थे। एक मकान में उनके दोनों बेटे अपने बीवी बच्चों के साथ रहते थे और दूसरे मकान जो पहले मकान के पास ही था उसमें घीसीलाल जी अपनी पत्नी सुखिया के साथ रहते थे। उस मकान में चार किरायेदार रहते थे जिनका चालीस हजार रुपये हर महीने किराया आता था। जिनमें उनकी गुजर बसर आराम से हो जाती थी। कभी उन्हें बेटों के सामने हाथ पसारने की नौबत नहीं आती थी। उनकी एक बेटी भी थी जिसका नाम राधा था। उसकी शादी उन्होंने कर दी थी। वो भी जब मायके आती तो पिता के घर में सुखपूर्वक रहती थी। माँ उसका बहुत ख्याल रखती थी तथा उसकी जरूरत पूरी भी कर दिया करती थी। चालीस साल पहले जब घीसीलाल जी श्रीवास इस शहर में आए थे तब उनके दोनों बेटे छोटे थे। राधा चार महीने की थी। उनके पास हेयर कटिंग करने के सामान की पेटी थी और मात्र दो सौ रुपये नगद थे। शहर में आना उनकी विवशता थी क्योंकि वे जिस गाँव पीपलिया में रहते ...

कहानी: ढाई हज़ार की जमीन

गोपाल दास के पिताजी रामदास जी ने दो एकड़ जमीन आज से पचास साल पहले जो ढाई हज़ार रुपये में खरीदी थी उस जमीन पर मैरिज गार्डन बनाकर गोपाल दास जी चालीस से पचास लाख रुपये प्रतिमाह कमा रहे थे। उस जमीन ने उन्हें संपन्न बना दिया था। पचास साल पहले जब गोपालदास जी आठ वर्ष के थे तब पिताजी के पास कोई कृषि भूमि नहीं थी। उनके पिताजी और माँ सिया बाई मजदूरी कर के अपना गुजारा चलाते थे। उनका जीवन सादगी से भरा था वो किसी का भी नशा नहीं करते थे पैसा बड़ी किफायत से खर्च करते थे। उसी गाँव में शिवलाल जी बढ़ई का काम करते थे उनके लड़के हरिओम ने शहर में फर्नीचर की दुकान खोल ली थी। वो शहर मैं मकान बनाना चाहता था इसके लिए उसे पैसों की जरूरत थी। इसके लिए शिवलालजी अपनी दो एकड़ जमीन बेचना चाहते थे। उस समय ढाई हजार रुपये की रकम बड़ी रकम मानी जाती थी। उस जमीन को बहुत से लोग लेना चाहते थे पर किसी के पास इतना रुपया नहीं था। ऐसे में रामदास जी ने जो पाई पाई जोड़ी थी वो काम आ गई। उन्होंने ढाई हजार रुपये देकर वो जमीन खरीद ली थी। पूरी जमीन सिंचित थी कुएँ में भरपूर पानी था। उस जमीन ने पिताजी को मजदूर से किसान बना दिया था। उनका ...

कहानी: सपेरे का बेटा

रूपेश नाथ हीरा नाथ का बेटा था। कीरत गाँव की सपेरा बस्ती का वो एकमात्र ऐसा युवक था जो सकारी नौकरी कर रहा था। वो नायब तहसीलदार के पद पर अनूप नगर टप्पे में पदस्थ था। अनूप नगर कीरत गाँव से बारह किलोमीटर दूर था। आज रूपेश नाम दबंग ओम प्रकाश के कब्जे से अपने पिता हीरा नाथ की पाँच एकड़ जमीन मुक्त कराई थी और पिताजी से कहा था वे अब भीख नहीं माँगेगें इस जमीन पर खेती करके अपना गुजारा करेंगे। हीरा नाथ जी ने भी अपने बेटे की बात मान ली थी। कीरत गाँव में रूपेश के खानदान के सभी लोग काम नहीं करते थे। पूरे खानदान में एक सौ पचास लोग थे जो एक बस्ती बनाकर पंद्रह कच्चे घरों में रहते थे। रूपेश जब पाँच साल के थे तब उनकी बस्ती में सरकारी स्कूल के शिक्षक जगदीश सर सर्वे करने आए थे। तब वे रूपेश का नाम स्कूल की कक्षा एक में दर्ज कर गए थे बस्ती के चार बच्चों के नाम भी उन्होंने कक्षा एक में दर्ज किए थे। जगदीश सर अच्छी तरह से जानते थे कि इनमें से कोई भी स्कूल नहीं आएगा ये सब भीख माँगेंगे। मगर उनका नाम लिखना जरूरी था किसी भी बालक बालिका को अप्रवेशी नहीं रखा जा सकता था। ये बच्चे कभी स्कूल नहीं जाते थे फिर भी उन...

कहानी: कर्ज का दलदल

रोशन लाल कर्ज के दलदल में इतने धँस चुके थे कि अब उनका उससे उबर पाना संभव नहीं लग रहा था तीनों मकान बिक चुके थे पत्नी के सारे जेवर बिक गए थे । अब वे किराये के मकान में रह रहे थे वेतन आने के पहले घर में लेनदारों के चक्कर लगना शुरू सो जाते थे। कुछ लोग यह सोचकर ज्यादा जोर नहीं देते कि कहीं ये परेशान होकर आत्म हत्या न कर लें। आज उनके घर में फाकाकशी की नौबत आ गई थी जबकि वेतन मिले अभी तीन दिन भी नहीं हुए थे। वो तो रोशनलाल जी की पत्नी कंचन के भाई कैलाश ने दो हजार रुपये भाई दूज के टीके के शगुन के अपनी बहन को दिए थे कंचन उन पूरे रुपयों का गेहूँ ले आई थी तथा उनको चक्की में पिसवा भी लिया था जिससे महीने भर के लिए रोटी की व्यवस्था तो हो ही गई थी। रोशन लाल जी को उनकी पत्नी कभी भी पैसे नहीं देती थी न उनसे कोई सामान मँगवाती थी क्योंकि लेनदार उनकी जेब से रुपये निकाल लेते थे।  आज से बीस संल पहले रोशनलाल जी की स्थिति ऐसी नहीं थी। वे बहुत संपन्न परिवार से थे उनकी जब शादी हुई थी तो उसमें खूब दहेज मिला था जब वे घर से अलग हुए तब उनके नाम के शहर में तीन मकान थे । पिताजी ने तेइस लाख रुपये नगद दिए थे लाख...

कहानी: ठेकेदार

राधेमोहन शहर के सबसे बड़े ठेकेदार थे। उनके पास काम की कोई कमी नहीं थी। बहुत बड़ा ऑफिस था जिसमें अस्सी लोग काम कर रहे थे। चालीस इंजीनियर थे तथा मिस्त्री, लेबर, पलम्बर, इलेक्ट्रीशियन की गिनती निश्चित नहीं थी। वैसे हमेशा उनकी साइट पर काम चलता रहता था। दूसरी ओर उनके छोटे भाई रास बिहारी ने सिविल इंजीनियर की डिग्री में गोल्ड मेडल प्राप्त किया था। फिर दस साल तक पी डब्ल्यू डी में नौकरी और भ्रष्टाचार में लिप्त होने के कारण इन दिनों जेल में था। बचपन से ही राधे मोहन जी का पढ़ाई में ध्यान कम था। वो अक्सर थर्ड डिवीडन से ही पास होते थे। जबकि रासबिहारी हमेशा कक्षा में प्रथम आता था। राधेमोहन के पिताजी पी डब्ल्यू डी के ऑफिस में क्लर्क थे। उन्हें अच्छी तरह मालूम था कि इंजीनियर की रिश्वत से कमाई वेतन से कई गुना ज्यादा होती थी। इसलिए वे अपने दोनों बेटों को पढ़ा लिखाकर इंजीनियर बनाना चाहते थे। रासबिहारी से वे खुश रहते थे क्योंकि वो पढ़ने में तेज था। जबकि राधेमोहन को देखते ही उन्हें गुस्सा आ जाता था। राधे मोहन को घूमने-फिरना, लोगों से मिलने जुलने का शौक था। जबकि रास बिहारी हमेशा ही पढ़ाई में ड...

कहानी: माँ की सेवा

रमानाथ जीने अपने परिवार को छोड़कर पूरे बीस साल तक अपनी माँ कौशल्या की सेवा की आज जब माँ का निधन हुआ तब उनकी उम्र निन्यानवे साल की थी जबकि रमानाथ जी ही पूरे सत्तर वर्ष के हो गए थे। माँ की अंत्येष्टि के बाद वे माँ की उत्तर क्रिया की व्यवस्था के संबंध में विचार कर रहे थे। रह रह कर उन्हें माँ की याद भी आ रही थी। रमानाथ जी के पिताजी दीनानाथ जी का निधन पच्चीस साल पहले हो गया था तब माँ की उम्र!चौहत्तर साल की थी रमानाथ जी तब उद्योग केन्द्र मैं नौकरी करते थे उनकी मत्नी जानकी महिला बाल विकास विभाग में नौकरी कर रही थी तब रमानाथ जी की उम्र पैंतालीस वर्ष की थी। उनके बड़े भाई पुरुषोत्तम की उम्र पचपन साल की थी वे उनसे दस साल बड़े थे उनके पाँच लड़के थे पाँचों कम पढ़े लिखे गुंडा टाईप के थे जबकि रमानाथ जी के दो लड़के थे रवि और सोम दोनों पढ़ने में तेज थे पिता के निधन के समय रमानाथ जी इन्दौर में रह रहे थे। उनकी अंत्येष्ट के बाद उन्होंने माँ से कहा कि चलो माँ मेरे साथ रहना तो माँ ने साफ इंकार दिया बोली बेटा मैं तो यहीं रहकर अपनी मौत का इंतजार करूँगी । दीनानाथ जी की होटल थी । उस समय उन्होंने द...

कहानी: फार्म मैनेजर

शुगर फेक्टरी के कभी फार्म मैनेजर रहे दिनेश वर्मा को फुटपाथ पर दुकान लगाकर चप्पल बेचते हुए देखकर उनके सहपाठी रहे शिवलाल जी को बड़ी हैरत हुई उन्होंने कहा आप इतने बड़े पद रहे और अब फुटपाथ पर दुकान लगाकर चप्पल बेच रहे हैं कहीं ओर अच्छी नौकरी नहीं मिली क्या? तो वे बोले कि अब इस उम् में मुझे कौन नौकरी देगा। चप्पलें बेचने से ठीक ठाक कमाई हो जाती है जिससे परिवार का गुजारा चल जाता है वो अच्छे दिन तो अब आने से रहे जब घर में तीन तीन नौकर काम करते थे फेक्टरी ने रहने के लिए बड़ा बंग्ला दे रखा था। अब तो दो कमरे के एक छोटे से मकान में रहकर अपना समय गुजार रहे हैं। शिवलाल और दिनेश पहली कक्षा से हायर सेकेण्डरी तक एक ही स्कूल में साथ साथ पड़े थे शिवलाल के पिताजी मजदूरी करते थे दिनेश के पिताजी की किराने की दुकान थी पुराना दौर था । शिवलाल ने शिक्षक चयन परीक्षा दी थी उसमें उनका चयन हो गया था और वे शहर से चालीस किलोमीटर दूर सिंहपुर गाँव के प्राइभरी स्कूल के टीचर बना दिए गए थे सौ रुपये महीना वेतन था सस्ता जमाना था सवा रुपया बस का किराया था तो उन रुपयों में उनका खर्च चल रहा था एक साल बाद उनका वेतन बढने...

कहानी: ढलान

कभी अपनी रंगदारी से पूरे गाँव में आतंक मचाने वाले रज्जू दादा को आज जब मैंने उज्जैन के एक फुट पाथ पर लाचार दुखी बेबस होकर भीख माँगते रेखा तो मुझे बहुत ताज्जुब हुआ क्योंकि रज्जू दादा जामुन खेड़ा में आतंक का पर्याय था लोग उस के नाम से थर थर काँपते थे आज वही रज्जू दादा बुरे हाल में था पाँवों में छाजन हो रही थी जिससे खून रिस रहा था। दोनों घुटनोंनों में दर्द था लगड़ा कर चल रहा था। माने हुए रंगदार को उम्र की इस ढलान पर देखकर दुख भी हो रहा था। अपने घर आकर मैं उसी के विषय में सोच रहा था। ये बात उन दिनों की है जब मैं जामुन खेड़ा में रहकर वहाँ के सरकारी स्कूल में चौथी में पढ़ रहा था । पिताजी उत्तम चंद उसी स्कूल में शिक्षक के रूप में पदस्थ थे।उस समय रज्जू नवयुवक था उसके हाथ में हमेशा फर्सा रहता था कभी भी बिना हथियार लिए वो घर से नहीं निकलता था । गाँव के चार छः बिगड़े युवक लठ लेकर उसके साथ रहते थे। आए दिन वो किसी न किसी को पीटता दिखाई देता था वो कभी किसी का सम्मान नहीं करता था किसी भी उम्र तथा हैसियत के व्यक्ति को भी अपमानित करने में उसे जरा भी संकोच नहीं होता था किसानों की फसल पककर तैयारी हो ...

कहानी: दूसरी बार की शादी

शशिकाँ और किरण की शादी के आज पच्चीस वर्ष पूरहो गए थे इस अवसर पर उनके तेईस वर्ष के बेटे रोहन तथा उसकी पत्नी रीना एवं इक्कीस वर्ष की बेटी रिया तथा उसके पति रोशन ने एक भव्य समारोह का आयोजन किया था जिसमें सभी ने उन्हें सफल दांपत्य जीवन पर हार्दिक बधाई देकर शुभकामनाएँ व्यक्त की थी जबकि शशिकाँत ने किरण से दूसरी शादी की थी किरण की भी यह दूसरी शादी थी। शादी के बाद वो सफल दांपत्य जीवन जी रहे थे। बात उस समय की है जब शशिकाँत की अरेंज मैरिज रूपा के साथ हुई थी । शशिकाँत रूपा को बहुत चाहता था उसकी हर इच्छा पूरी करने की कोशिश करता था। रूपा ने अबकि दीपावली पर उससे सोने का हार दिलाने की माँग की थी । शशिकाँत के पास इतने रुपये थे नहीं इसलिए वो रुपये कमाने के लिए परदेश चला गया था। वहाँ वो फेब्रीकेशन का कार्य करने लगा था। रूपा मायके में आकर रहने लगी थी। शशिकाँत जी तोड़ मेहनत कर रहा था ।काम की कोई कमी नहीं थी काम करने वालों की कभी थी शशिकाँत के पास छः महीने का समय था। वो पत्नी को सोने का हार खरीद कर देना चाहता था। चार महोने तक तो उसकी पत्नी से फोन पर बात होती रही इसके बाद रूपा ने फोन करना बंद कर दिया उस ...

कहानी: पेंशन

नीलेश का परिवार पाँच साल पहले तक नीलेश के पिताजी की पेंशन पर आधारित था। उनकी पैंशन से ही उनका गुजारा चल रहा था। उनके देहाँत के बाद जब पिताजी की पैंशन बंद हो गई तब नीलेश की पत्नी सोनम ने मेहनत मजदूरी कर के परिवार का खर्च चलाया था। आज नीलेश के बेटे रोहित का दसवीं का रिजल्ट आया था। उसने प्रदेश की प्राविण्य सूची में चौथा स्थान प्राप्त किया था तथा जिले की मेरिट में वो प्रथम आया था। आज नीलेश का पूरा परिवार ख़ुशियाँ मना रहा था। नीलेश के पिताजी चंदन सिंह सिंचाई विभाग में क्लर्क थे। उनकी पत्नी कमला का निधन उनके सेवानिवृत्त होने के चार साल पहले ही हो गया था। नीलेश ने बी बी ए किया था बी बी ए करने के बाद नीलेश एक कंपनी में अच्छी भली नौकरी कर रहा था। उसकी शादी सोनम से हुई थी। नीलेश की बहन निकिता की शादी चंदन सिंह के रिटायरमेन्ट के बाद हुई थी। चंदन सिंह सरकारी क्वार्टर में रहते थे। सेवानिवृत होने के बाद जो फंड उन्हें मिला उससे उन्होंने एक छोटा सा मकान बनवा लिया था। बाकी जो रुपये बचे थे उससे उन्होंने निकिता की शादी कर दी थी। अब उनके पास कोई जमा पूँजी नहीं थी। जो पैंशन मिल रही थी वही उनकी आय ...

कहानी: समय का फेर

रेल्वे स्टेशन के पास भीख माँगते अस्सी साल के बुजुर्ग को देख माखन लाल चौंक गया था वो उन बुजुर्ग को पहचान गया था। वो उसके गाँव के दरियाव पटेल थे जिन्के कारण उसे तीस साल पहले अपना गाँव छोड़कर इन्दौर आना पड़ा था। इन्दौर में वो होटल मालिक था और सुखी संपन्न जीवन जी रहा था। दरियाव पटेल उसे पहचान कर भी अनजान बन गए थे। उसे भी जल्दी थी इसलिए वो ज्यादा बात किए बिना ही आ गया था। जबसे वो उनसे मिलकर आया था तब से उनके विषय में ही विचार कर रहा था। तीस साल पहले की बात है जब माखन लाल नौनीखेड़ा गाँव मैं रहता था। उस समय उसकी उम्र पच्चीस साल की थी। माखनलाल के पिताजी बटन लाल की गाँव में बाल काटने की दुकान थी। दरियाव सिंह उस गाँव के पटेल थे। उनका पूरे गाँव में दबदबा था। वे सबसे संपन्न थे और उनके कहे को टालने की किसी में हिम्मत नहीं थी। गाँव में जो दलित वर्ग के लोग रहते थे उनकी हजामत बटनलाल जी नहीं बना सकते थे ऐसा दरियाव पटेल जी का हुक्म था। जिसका सख्ती से पालन करना बटनलाल जी के लिए जरूरी थी। माखनलाल को पिताजी ने शहर में आधुनिक तरीके से बाल कटिंग करने का प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए शहर भेज दिया था। वहाँ से...

कहानी: समय का फेर

रेल्वे स्टेशन के पास भीख माँगते अस्सी साल के बुजुर्ग को देख माखन लाल चौंक गया था वो उन बुजुर्ग को पहचान गया था। वो उसके गाँव के दरियाव पटेल थे जिन्के कारण उसे तीस साल पहले अपना गाँव छोड़कर  इन्दौर आना पड़ा था। इन्दौर में वो होटल मालिक था और सुखी संपन्न जीवन जी रहा था। दरियाव पटेल उसे पहचान कर भी अनजान बन गए थे। उसे भी जल्दी थी इसलिए वो ज्यादा बात किए बिना ही आ गया था। जबसे वो उनसे मिलकर आया था तब से उनके विषय में ही विचार कर रहा था। तीस साल पहले की बात है जब माखन लाल नौनीखेड़ा गाँव मैं रहता था। उस समय उसकी उम्र पच्चीस साल की थी। माखनलाल के पिताजी बटन लाल की गाँव में बाल काटने की दुकान थी। दरियाव सिंह उस गाँव के पटेल थे। उनका पूरे गाँव में दबदबा था। वे सबसे संपन्न थे और उनके कहे को टालने की किसी में हिम्मत नहीं थी। गाँव में जो दलित वर्ग के लोग रहते थे उनकी हजामत बटनलाल जी नहीं बना सकते थे ऐसा दरियाव पटेल जी का हुक्म था। जिसका सख्ती से पालन करना बटनलाल जी के लिए जरूरी थी। माखनलाल को पिताजी ने शहर में आधुनिक तरीके से बाल कटिंग करने का प्रशिक्षण प्राप्त कर...

कहानी: दगा

अपने खास दोस्त रवीन्द्र के दगा देने के कारण नौकरी गँवा चुका सुरेन्द्र घर से भी बेदखल हो गया था अब उसकी आय!का एक मात्र जरिया रिक्शा चलाना ही रह गया था जो पत्नी घर के काम करती थी उसे भी बाहर काम करना पड़ रहा था वो एक निजी अस्पताल में सफाई कर्मी का काम कर रही थी। सुरेन्द्र आर्य धर्म शाला में चौकीदारी का काम करता था उसकी ड्यूटी रात की थी इष के लिए समिति ने रहने को घर भी दिया था दिन में सुरेन्द्र रिक्शा चलाता था इससे उसका गुज़ारा आराम से चल रहा था तीन महीने पहले की बात है अचानक सुरेन्द्र के पास ख़बर आई की माँ की तबियत बहुत खराब है तुरंत आओ। सुरेन्द्र समिति के सचिव के पास गया तथा उन से छुट्टी माँगी तो सचिव ने कहा अपनी जगह पर किसी विश्वसनीय को रखकर जाओ तो छुट्टी मिलेगी वरना छुट्टी देने में हम असमर्थ रहेंगे ऐसे में सुरेन्द्र को अपने ख़ास मित्र रवीन्द्र की याद आई उसने रवीन्द्र को अपनी परेशानी बताई तो रवीन्द्र उसकी जगह पर काम करने को तैयार हो गया। सुरेन्द्र गाँव चला गया और माँ के उपचार कराने में जुट गया बहुत इलाज कराने के बाद भी माँ को बचाया न जा सका माँ की उत्तर !क्रिया करने के बाद जब सुरे...

कहानी: मिलनसार

मिलनसार स्वभाव के सेवानिशृत प्रशासनिक अधिकारी वीरेन्द्र जी की जान अपने इस स्वभाव के कारण बची थी सुब्ह जब वे पार्क में नहीं दिखे तो उनके साथी उनके घर आए उन्हें बेसुध देखकर तुरंत अस्पताल ले गए इससे उनका समय पर इलाज हो गया और उनकी जान बच गई थी डॉक्टरों ने कहा था यदि थोड़ी देर हो जाती तो इन्हें बचाना मुश्किल हो जाता आज उन्हें अस्पताल से छुट्टी मिल गई थी वहाँ उनसे मिलने वालों का ताँता लगा रहता था ।उनकी पत्नी विमला उनको ह्रदय से धन्यवाद दे रही थी जिन्होंने उन्हें समय पर अस्पताल पहुँचाया था। वीरेन्द्र जी की उम्र अड़साठ साल की थी वे एक उच्च पद के अधिकारी से रिटायर हुए थे। जब तक वे पद पर रहे तब तक उनका लोगों से अधिक मेलजोल नहीं था क्योंकि उन्हें तटस्थ रहना पड़ता था ताकि कोई उन पर पक्षपात करने आरोप न लगा सके लेकिन जब वे रिटायर हो गए तो फिर उन पर यह बंधन नहीं रहा । उन्होंने तय कर लिया था कि वे सब से घुल मिल चर रहेंगे छोटे बड़े का भेद नहीं रखेंगे एक दूसरे की दुख मुसीबत में काम आएँगे वे हर सार्वजनिक कार्यक्रम में शामिल होंगे इसका कारण यह था कि उनसे पूर्व एक वरिष्ठ अधिकारी योगेन्द्र जी सेव...

कहानी: निष्कासित

खरी और कड़वी बात मुँह पर कहने वाले मानवता के पक्षधर जवाहर सिंह को इमलियाँ गाँव के लोगों ने गाँव से निष्कासित कर दिया था। वो गाँव से तीन किलोमीटर दूर अपने दो एकड़ के खेत में झोपड़ी बनाकर रह रहा था। छोटे सा खेत ही उसके जीवन यापन का जरिया बना हुआ था। गाँव के सभी लोगों ने उसका साथ नहीं छोड़ा था।कुछ लोग उससे छिपकर मिलने आ ही जाते थे। जिनकी वह अपने स्तर पर मदद कर दिया करता था। जवाहर सिंह किसी से दुश्मनी नहीं रखता था फिर भी लोग उससे नाराज थे। बचपन में जवाहर सिंह जब स्कूल गया तो शिक्षक के द्वारा छात्रों से किए जा रहे पक्षपात का उसने विरोध किया। दलित बच्चों से भेदभाव करना उसे ठीक नहीं लगा। इसका विरोध करने में शिक्षक उससे नाराज हो गए। उन्होंने उसकी शिकायत उसके पिताजी राजमल से कर दी कहा कि ऊँची जाति का होने के बाद भी ये दलित बच्चों के साथ रहता है तथा उनका पक्ष लेता है। इस बात पर राजमल ने जवाहर सिंह को बहुत डाँटा कहा ऐसा कर के तू हमारे गाँव की व्यवस्था बिगाड़ना चाहता है। स्कूल में वो चौथी से आगे नहीं बढ़ सका। शिक्षकों ने उसे स्कूल से निकालकर ही दम लिया। स्कूल से निकलने के बाद...

कहानी: बेमुरब्बत

गिरधारीलाल ने अपने साढ़ू भाई सतीश के लड़के नीलेश को बचपन से अपने बेटे की तरह अपने घर में रखा था। उसे पढ़ाया लिखाकर सरकारी अफसर बनवाया था। आज उसी ने मुँह फेर लिया था। अपना काम कराने के लिए वे उसके ऑफिस के बाबू को तीस हज़ार रुपये को रिश्वत देकर आए थे। वही आज बेमुरब्बत हो गया था। गिरधारीलाल जी की जब रूपा से शादी हुई थी तब उनके साढ़ू भाई सतीश के तीन बेटे और दो बेटियाँ थे। उनमें से नीलेश पाँच वर्ष का था। गिरधारीलाल शिक्षा विभाग में सहायक शिक्षक के पद पर पदस्थ थे। शादी के तीन साल बाद जब उन्हें कोई संतान नहीं हुई तब उनहोंने अपनी तथा पत्नी की मेडिकल जाँच कराई जिसमें पता चला कि रूपा कभी माँ नहीं बन सकती। यह सुनकर रूपा दुखी हो गई। तब गिरधारीलाल जी ने उसे खूब दिलासा दी। इसका फायदा सतीश ने तथा उसकी पत्नी कंचन ने उठाया। सतीश की आर्थिक स्थिति खराब थी। वो पाँच संतानों का पालन ठीक से नहीं कर पा रहा था। नीलेश उस समय कक्षा चार में पढ़ रहा था। एक दिन सतीश और कंचन नीलेश को लेकर गिरधारीलाल जी के घर आए। वहाँ उन्होंने अपनी बातों में लेकर कहा कि आज से नीलेश आपका बेटा अब आप इसे रखो यह आपके पास ही रहेगा। रूपा क...

कहानी: भलमनसाहत

रतनपुर गाँव के अस्सी वर्षीय हरलाल जी गाँव के सबसे भले इंसान माने जाते थे। हर परिस्थिति में उन्होंने अपनी भल मनसाहत नहीं छोड़ी थी। जबकि उन्होंने कई बार धोखे खाए थे। लोगों ने उनकी शराफत का अनुचित लाभ उठाया था फिर भी वे भलाई पर कायम रहे थे। बीस एकड़ जमीन एवं बड़ा मकान बेटे बहू को देने के बाद वे एक छोटे से झोपड़ी नुमा घर में अपनी पत्नी रेशम बाई के साथ रह रहे थे। मंदिर के सामने फूल बेचकर अपना गुजारा कर रहे थे। किसी के सामने हाथ पसारकर भीख माँगना उनके स्वभाव के विपरीत था। हरलाल जी बचपन से ही भले थे। उनका छोटे भाई बाबूलाल चालाक था तथा माँ बाप का चहेता था। यही कारण था कि जब उनके माता पिता ने उनकी शराफ़त से तंग होकर उन्हें घर से अलग किया तो सबसे बेकार जमीन उन्हें दी। पुश्तैनी मकान में हिस्सा न देते हुए गाँव के कोने पर बना एक बाड़ा उन्हें दे दिया जहाँ जानवर बाँधे जाते थे। हरलाल फिर भी खुश थे संतुष्ट थे आनंदित थे। उन्हें किसी के प्रति कोई मलाल नहीं था। हरलाल जी ने कड़ी मेहनत से उस खराब जमीन को भी उपजाऊ बना लिया था। खुद कुआँ खोदकर सिंचाई का साधन कर लिया था। दो साल में उस बाड़े में उन्होंने अच्...

कहानी: मज़दूर का बेटा

सी एम राइज  के स्कूल की बिल्डिं के निर्माण में मिस्त्री का काम करने आए हीरालालजी ठेकेदार अर्जुन लाल का बदला हुआ रुख देखकर चकित थे कल तक जो ठेकेदार यह कह रहा था कि चालीस करोड़ की इस बिल्डिंग  को बीस करोड में बनाना है बाकी का पैसा सभी मिल बाँट कर खाएँगे। वही ठेकेदार अब पूरी ईमानदारी से भवन निर्माण करने की बात कह रहा था उसका कारण यह था कि जिले के कलेक्टर बदला गए जो नए कलेक्टर आए थे उनका नाम अनूप कुमार था वे सत्ताइस साल के युवा थे उनमें ईमानदारी कूट कूट कर भरी थी यह बात ठेकेदार को पता चल गई थी । इसिलिए  वो ईमानदारी से भवन के निर्माण करने की बात कह रहा था । हीरालाल को यह सुनकर बड़ी खुशी हुई वो मन  ही मन मुस्कुराए पर इसकी भनक उन्होंने ठेकेदार को नहीं लगने दी। दर असल सच बात यह थी की नवागत कलेक्टर अनूप कुमार जी हीरालाल जी के बेटे थे । अनूप जी ने खूब कहा था कि अब आपको मज़दूरी करने की जरूरत नहीं है आपने बहुत काम कर लिया अब आप आराम करो आप मेरे साथ रहो बहुत बड़ा सरकारी बंग्ला है हम सब आराम से रहेंगे लेकिन हीरालाल जी ने साफ मना कर दिया था वे बोले थे कि अभी मेरी उम्र मात्र पचास सा...