देवचंद ने सात साल कुवैत में रहकर मिस्त्री का काम किया था। लेकिन भारत में अच्छी संभावनाए देखकर वे पाँच साल पहले फिर अपने देश में आ गए थे और ख़ुशहाल होकर अपनी जिंदगी जी रहे थे। उनके दोनों बच्चे और पत्नी देविका भी खुश थी। वे बड़े ऊँचे सपने सजाकर कुवैत में गए थे पर वे सपने वहाँ रहकर कुछ दिनों में ही चूर चूर हो गए थे। आखिर उन्हें वापस अपने वतन में आना पड़ा था। बारह साल पहले उनके कुवैत जाने में उनके मित्र सतीश का बड़ा योगदान था। वो बड़ी ऊँची ऊँची बात करता था। जब भी घर आता तो खूब पैसे खर्च करता था। उसकी बातें सुनकर देवचंद का भी मन हो गया विदेश में जाकर खूब रुपया कमाने का। उनका बड़ा बेटा ऋषभ तब पाँच साल का था और बेटी रिद्धि तीन साल की। उन्होंने अपने बड़े भाई हरिचंद जी से भी कहा था कि वे भी उनके साथ कुवैत चलें वहाँ कमाई ज्यादा है। पर उन्होंने साफ शब्दों में इंकार कर दिया था। कुवैत में आने के बाद उन्हें ऐसा लगा जैसे उन्होंने बहुत कुछ खो दिया हो। यहाँ आकर उन्हें काम तो मिल गया, आय भी पाँच गुना बढ़ गई थी मगर उन्हें अपने देश भारत की बहुत याद आती थी। एक दिन उन्होंने एक व्यक्ति को देखा कि उसके हाथ कट...