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अक्टूबर, 2024 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कहानी: ख़ुशियों का त्यौहार

शहर के डेरी व्यवसायी कृष्ण मुरारी इस वर्ष दीपावली का त्यौहार खूब खुशियों के साथ बड़ी धूमधाम से मना रहे थे अपनी पत्नी सरोज को उन्होंने हीरों का हार दिलाया था अपने बेटे राकेश को मन पसंद बाईक तथा बिटिया मोहिनी को मँहगा वाला लेपटॉप ।चार साल से घर की पुताई नहीं हुई थी इस बार उन्होंने घर पर भी रंग रोगन कराया था खूब बिजली की झालरे लगाई थी आतिशबाजी भी सत्तर हज़ार रुपये की खरीदी थी पूरा परिवार त्यौहार की खुशियों में मग्न था। आज के दिन कृष्ण मुरारी जी को पिछली दीपावली की याद ताजा हो गई पिछली दीपावली जैसी दुखद दीपावली उनकी कभी नहीं रही थी पिछली दीपावली पर वो अस्पताल में भर्ती हुए थे उन्हें हार्ट अटेक आया था तथा उनकी ऐंजियो प्लास्टी हुई थी पूरे डेढ़ महीने वे अस्पताल में भर्ती रहे थे घर के सभी लोग अस्पताल में थे खास दीपावली के दिन उनकी एंजियो प्लास्टी हो रही थी पिछले वर्ष वे देव दिवाली भी नहीं मना सके थे।  बात तब की है जब नवरात्रि का नौ दिवसीय पर्व प्रारंभ हुआ था कृष्णमुरारी जी को हाई ब्लड प्रेशर था और वो इसकी गोली का नियमित सेवन कर रहे थे डॉक्टर ने सख्त हिदायत दी थी की गोलियों का सेवन किसी ...

कहानी: फीकी दिवाली

लखनलाल की दिवाली इस बार भी फीकी मनने वाली पाँच एकड़ जमीन में मात्र पंद्रह क्विंटल सोयाबीन की फसल हुई थी सोयाबीन के भाव भी अच्छे नहीं थे मगर बेचना मजबूरी थी सारे खर्चे काटने एवं उधारी चुकता करने के बाद मात्र चार हजारर रुपये बचे थे बस इन्हीं रुपयों से उसे दिवाली मनानी थी चार हज़ार रुपये जो वो भैंस का दूध बेचता था उससे प्राप्त हुए थे वे मिलाकर कुल आठ हजार रुपये थे उसमें तीनों बच्चों को कपड़े दिलाना था पूजन सामग्री लाना था मिठाई खरीदना था पत्नी को भी साड़ी दिलाना था वो बहुत परेशान था खेत में गेहूँ की फ़सल की बुआई करना थी उसकी उसे अलग चिंता थी। विगत गर्मी में उसे ग्रामीण आवास योजना के तहत शासन से रुपये मिले थे उसमें उसने दो कमरे किचन और बरामदा बनवा लिए थे मगर पलस्तर और फर्स का काम बाकी था सोचा था तीन लाख रुपये की सोयाबीन बेच देगा और मकान के बाकी काम कराकर दिवाली नए मकान में मनाएगा मगर फसल का उत्पादन ही इतना कम हुआ था कि सारे मनसूबे चकनाचूर हो गए थे सोयाबीन का उत्पादन कम होने से उसके परिवार के सभी लोग उदास थे छोटी बेटी रिंकी जो नए स्कूल बेग मिलने की उम्मीद कर रही थी अब अपने पुरा...

कहानी: ख़ुशकिस्मत

रामस्वरूप ने बाजार में सड़क के कोने पर अपनी दुकान लगा रखी थी वो उस दुकान पर कई तरह के सामान बेचा करता था यह दुकान वो पिछले दो वर्षों से लगा रहा था इससे उसकी गुजर बसर आराम से हो रही थी मगर दिवाली के पन्द्रह दिन पूर्व उस क्षेत्र क रंगदार रोहन ने बलपूर्वक उसकी दुकान वहाँ से हटवा दी थी । जब कमाने के दिन आए तब उसकी दुकान हटना उसके लिए बहुत दुखद था पर बिना दुकान के तो वो रह नहीं सकता था इस लिए उसने अपनी दुकान बाजार क्षेत्र से लगे हुए दशहरा मैदान के किनारे पर लगा ली थी। तीन दिन पहले तक वो धंधा नहीं चलने के कारण दुखी और निराश था उसे लग रहा था कि शायद इस बार की उसकी दिवाली फीकी मने मगर इन तोन दिनों ने उसकी तस्वीर बदल दी थी तीन दिनों में जो उसकी ग्राहकी चली वो उसके लिए अकल्पनीया था हुआ यह कि त्यौहार के कारण मुख्य बाजार में ग्राहकों की भीड़ उमड़ रही थी तहबाजारी करने वालों ने अपनी दुकान लगाकर सड़क सँकरी कर दी थी। इसे देख नगर प्रशासन हरकत में आया मेन मार्केट की सारी तहबाजारी की दुकाने हटा दी गईं तथा उन्हें दशहरा मैदान में अपनी दुकान लगाने के अनुमति पत्र दिए तथा दुकानों के लिए जगह भी आवंटित क...

कहानी: सरकारी नौकरी के फेर में

कुसुम की पच्चीस साल पहले जिस प्रापर्टी डीलर गोपाल कृष्ण से शादी होने वाली थी । वो आज शहर का सबसे बड़ा बिजनेसमेन बन गया था जबकि उसके पति कमलेश अब भी स्टेनोग्राफर के पद पर ही कार्यरत थे। वे अपने अठ्ठाईस साल की सर्विस में सिर्फ एक डुप्लेक्स ले पाए थे वो भी बैक से हाऊस लोन लेकर जिसकी किश्त के रूप में हर महीने उन्हें पैंतालीस हज़ार रुपये जमा करना पड़ रहे थे दवाओं का खर्च निकालने के बाद आधी तनख्वाह बचती थी उसमें ही वे अपना गुजर बसर कर रहे थे दोनों बच्चों को भी वे एजुकेशन लोन लेकर पढ़ा रहे थे वे एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार से थे और गोपाल जी की शहर के गणमान्य रईसों में गिनती होती थी। उनके ऑफिस में ही डेढ़ सौ कर्मचारी काम कर रहे थे जिन्हें वे पच्चीस हज़ार रुपये से लेकर दस लाख रुपये प्रतिमाह तक वेतन दे रहे थे। कुसुम से जब कमलेश ने गोपाल कृष्ण के विषय में बताया तो वो समझ तो गई कि ये वही हैं जिनसे उसकी शादी होने वाली थी ।   पिताजी ने ही अपनी तरफ से इंकार कर दिया था जबकि वे लोग इस शादी के लिए पूरी तरह सहमत थे। उनकी दहेज की भी कोई माँग नहीं थी जबकि कमलेश से शादी पर उन्हें ...

कहानी: छोटी नौकरी से बुलंदी

आइ ए एस अधिकारी रामदीन कुशल एवं ईमानदार अधिकारी के रूप में जाने जाते थे वे लोगों के चहेते अधिकारी थे वे जहाँ जहाँ भी कलेक्टर बनकर रहे वहाँ वहाँ अपनी गहरी छाप छोड़ के आए थे रामदीन सर ने जिस नगर निगम में चपरासी की नौकरी से शुरूआत की थी वहाँ के वे आयुक्त बनकर आए थे और अपनी प्रशासनिक क्षमताओं से सबको कायल कर दिया था। आज मुख्य मंत्रीजी ने उन्हें बुलाकर उनसे कहा था कि आपको केन्द्र में बुलाया जा रहा था पर मैं नहीं चाहता था कि आप जैसा अधिकारी हमारे प्रदेश से जाए । इसलिए मैंने आपको स्थान्तरित नहीं होने दिया मैंने ठीक किया न रामदीन जी ने कहा यह मेरे लिए बहुत ख़ुशी और गर्व की बात है कि आप मुझ पर विश्वास रखते हैं तथा मुझे खुलकर काम करने का अवसर देते हैं। यह बात सुनकर मुख्यमंत्री जी हल्के से मुस्कुरा दिए थे। रामदीन लगातार बिना थके काम करने वाले अधिकारियों में शामिल थे इसका एक कारण यह भी था कि बचपन से ही उन्होंने बहुत संघर्ष किया था। बात तब की है जब रामदीन जी ने आठवीं परीक्षा सर्वोच्च अंकों से पास कर ली थी और नवीं में एडमीशन का फार्म लेकर आए थे। तभी ख़बर आई कि उनके पिताजी सुखदीन जो राज म...

कहानी: दिवाली के लिए पैसे की जुगाड़

हरिमोहन फर्नीचर के कारखाने में मिस्त्री का काम करता था वेतन भो ठीक ठाक था उस कारखाने में लगभग डेढ़ सौ लोग काम करते थे। लेकिन हरिमोहन को दो महीने पहले काम से निकाल दिया गया था। कारखाने का मैनेजर संदीप उस से चिड़ा हुआ था जिसके कारण उसे नौकरी से हाथ धोना पड़ा था दूसरी नौकरी मिल नहीं रही थी दिवाली का त्यौहार सिर पर आ गया था बिने रुपये पैसे के दिवाली का त्यौहेर कैसे मने उधार रुपये लो तो दस पर सेन्ट मासिक ब्याज कैसे अदा करो। आखिर हरिमोहन को उपाय सूझ हो गया पूरे'दो दिन तक वो घर का कबाड़ा इकठ्ठा करता रहा और आज उसने उसे बेचकर पूरे पंद्रह हज़ार रुपये लाकर पत्नी शोभा को दे दि और कहा बस यही रुपये हैं इसी में दिवाली मनाना है शोभा बोली ठीक इसी में दिवाली मना लेंगे। मैनेजर संदीप अच्छा इंसान नहीं था वो कारखाने में काम करने वाली महिलाओं को बुरी नज़र से देखता था ढाई महीने पहले शोभा कारखाने में आई थी हरिमोहन को खाने का टिफिन देने तब संदीप की नज़र उस पर पड़ गई और उसके मन में बुरे भाव उत्पन्न हो गए। दो दिन बाद उसने हरिमोहन से कहा आखिर कब तक मिस्त्री का काम करोगे मैं सेठजी बे कहकर तुम्हें...

कहानी: बँटवारा

सतीश और रमेश दोनों सगे भाई थे। दोनों के हिस्से पंद्रह  पंद्रह एकड़ कृषि भूमि आई थी पर बड़ा भाई सतीश कर्ज में डूबा हुआ परेशान रहता था जबकि रमेश उतनी ही जमीन में खुशहाल था। जबकि उसके पास उसके बूढ़े पिता रामप्रसाद और माँ सियाबाई भी रहती थी। दोनों भाईयों के बीच मनोमुटाव था। दोनों एक दूसरे से बात तक नहीं करते, देवरानी जेठानी में भी खूब बैर था जिसका कारण भी सतीश ही था। रमेश तो कई बार भाई से बोलने की कोशिश करता था पर सतीश हमेशा उसे देख कर मुँह फेर लेता था। वो उसकी तरक्की से बहुत जलता भी था जबकि सतीश ने बँटवारे के समय ट्रेक्टर जबरन हथिया लिया था और रमेश ने ट्रेक्टर अपने पैसों से खरीदा था। सतीश का ट्रेक्टर कबाड़खाने में पड़ा था और रमेश का ट्रेक्टर खूब चल रहा था रमेश उससे कमाई भी कर रहा था। उसके पास बड़ा थ्रेशर था और अनेक कृषि यंत्र थे जिनके किराये से उसकी अतिरिक्त आमदानी हो जाती थी। हाल ही में सतीश ने पाँच एकड़ जमीन पच्चीस लाख रुपये में खरीद थी उसमें बोर लगवाया था जिसमें भरपूर मात्रा में पानी निकला था। यह जानकर सतीश जल-भुनकर खाक हो गया था पर इसके अलावा और वो कर भी क्या सकता था। रमेश की पूरे...

कहानी: इंसाफ़

महानगर के डॉन अजय साथी ने पिछले छः माह में तकीपर गाँव में सक्रिय रहकर गाँव को दबंग दलीप सिंह के आतंक से मुक्ति दिला दी थी। फिर शहर से अपने साथ लेकर आए चार्टर्ड एकाउण्टेन्ट उमेश और उनकी टीम से पूरा हिसाब बराबर कर सबको कर्ज के चंगुल से मुक्त करा दिया था। तथा उनकी छीनी हुई जमीन और मकान भी वापस दिला दिए थे। दलीप सिंह का दबदबा खत्म होते ही वो रात के अंधेरे में भागने की कोशिश कर रहा था। जिसे अजय साथी ने पकड़ लिया था और कहा था अभी तेरे पर गाँव वालों का दस करोड़ रुपये का कर्ज बाकी है। वो खाकर तुझे नहीं जाने दूँगा और अगर चला भी गया तो दुनिया के किसी भी कोने से पकड़कर यहीं ले आऊँगा। दलीप सिंह की गैंगस्टर अजय साथी के सामने कोई हैसियत नहीं थी। अब उसके पास कुछ भी नहीं बचा था लोगों का कर्ज कैसे चुकाता। वो अजय से रहम की भीख माँग रहा था जबकि अजय का कहना था कि अब तुझे इसी गाँव में रहकर मजदूरी कर के अपना जीवन गुजारना पड़ेगा। अजय साथी इसी गाँव का रहने वाला था। उसके पिता गिरवर की बीस एकड़ जमीन थी। जब गिरवर का निधन हो गया तब अजय साथी अपनी जमीन पर गया तो दलीप सिंह अपने लठैतों को लेकर...

कहानी: आज़ादी

रूपा को पूरे पन्द्रह साल बाद नर्क जैसी ज़िंदगी से मुक्ति मिली थी आज उसका पति मनीष उसके बारह साल के लड़के आलोक को भी उसके पास छोड़ गया था रूपा एक प्राईवेट स्कूल में पढ़ा रही थी उसे बारह हज़ार रुपये महीना वेतन मिलता था तथा बारह हजार रुपये ही वह टयूशन सः कमा लेती थी चार हज़ार रुपया भहीना मकान कैराया देने के बाद बीस हज़ार में उसका गुजारा आराम से चल रहा था । उसकी बेटी रूपाली चौथी कक्षा में पढ़ रही थी तथा बेटे आलोक का एडमीशन उसने सातवीं कुक्षा में करा दिया था। स्कूल स्टॉफ में होने के कारण उसे बच्चों की फीस नहीं देनी पड़ती थी पिछले एक वर्ष से वो अपने पति से अलग रह रही थी। मगर आज वो पूरी तरह आजाद हो गई थी आज उसका बेटा भी उसके पास आ गया था। बात एक वर्ष पहले की है जब रूपा के पिताजी रूपचंद जो सरकारी स्कूल में पढ़ाते थे वे एक शादी समारोह में सागौनी गाँव में आए थे तो उन्होंने सोचा की अपनी बेटी रूपा की ससुराल भी चला जाऊँ बहुत दिनों से बेटी से नहीं मिला उसे भी देख लूँगा कैसी है जब रूपचंद बेटी की ससुराल आए तो सीधे बेटी के कमरे में आ गए और वहाँ का हाल देख कर गुस्से और दुख से भर गए दोनों बच्च...

कहानी: बहनोई

राकेश की बेटी प्रभा विवाह के बाद पहली बार अपने मायके आई थी और अपनी ससुराल की बाते अपनी मम्मी सुमन को बता रही थी । जब वो अपने पति सौरभ के विषय में बात करने लगी तब राकेश बोले बेटी जब तू पाँच साल की थी तब तूने मुझे अपने मामाजोवर मेरे साले उनसे मुझे कई बार पिटवाया था। अब अगर तेरा भाई प्रमोद अगर तेरे सामने तेरे पति सौरभ की पिटाई करे तो तुझे कैसा लगे यह सुनकर प्रभा बोली पापा आप वो बातें भूल क्यों नहीं जाते उसमें आपकी गलती भी तो होती थी इस पर सुमन बोली उसका दुख तो मुझे आज भी याद कर के बहुत होता है। राकेश को अपने वो पुराने दिन याद आ गए थे राकेश राजमिस्त्री का काम करता था उसकी शादी रायनगर में हुई थी जो उसके गाँव आँवली खेड़ा से दस किलोमीटर दूर था। उसे रोज काम के लिए रायनगर आना पड़ता था जब उसकी शादी रायनगर में सुमन से हुई तो वो भी रायनगर में आकर रहने लगा था । सुमन का परिवार भी साधारण था उसके दोनों भाई मोहन और बलवंत कंपनी में सुरक्षा गार्ड थे पिता मूलचंद सब्जी का ठेला लगाते थे । घर का मकान था उसमें सब एक साथ रहते थे सुमन और राकेश कोष उन्होंने अपने घर के पास ही किराये का मकान दिलवा दिया...

कहानी: अटा सटा

मालवाक्षेत्र में अटा सटा से भी शादी प्रचलित है जिसमें दोनों परिवार वालों लड़की के बदले लड़की और लड़के के बदले एच दूसरे के परिवार में शादी करना होती है हर खेड़ी दिनेश की और मनीषा तथा आलमपुर के दीपक तथा बबीता की ऐसी ही शादी हुई थी जिससे दोनों ही परिवारों में कई प्रकार की समस्याएँ आए दिन उत्पन्न होती रहीं थीं उनकी शादी को पूरे पच्चीस साल हो गए थे जिसमें बीस साल तो उनके बीच लड़ाई और मनमुटाव में ही निकल गए उनके बच्चे नाना नानी के घर रह कर पढ़े थे अब जब बच्चे बड़े हो गख़ तब उनके बीच के ये आए दिन के झगड़े खत्म हुए थे। पच्चीस वर्ष पूर्व जब दिनेश और दीपक की कहीं शादी नहीं हो रही थी कोई उन्हें लड़की देने को तैयार नहीं था दीपक के पिता सुरेश और दिनेश के पिता सतीश की भेंट मोलूखेड़ी में एक तेरहवीं के कार्यक्रम में हुई तब दोनों ने अपने अपने लड़के लिए लड़की देखने की बात कही थी बातों के दौरान पता चला कि वे दोनों ही भूमिहीन हैं और मजदूरी करते हैं दोनों के बेटे बस ड्राईवर थे तब सतीश ने कहा आपके यहाँ कोई लड़की कुँवारी है तो उन्होंने कहा मेरी बेटी कुँवारी है। सुरेश से जब यही सवाल किया तो...

कहानी: तलाक

प्रमिला का जिन परेश से पच्चीस वर्ष पहले तलाक हुआ था उन्हें वृद्धाश्रम में देखकर वो चकित हो गई थी। वो तो बहुत संपन्न परिवार से थे और बुढ़ापा वृद्धाश्रम में काट रहे हैं, यह प्रमिला के लिए हैरत की बात थी। प्रमिला अपने पोते अंकुर की पहली वर्षगाँठ के उपलक्ष्य में वृद्धाश्रम को एक समय भोजन कराने की राशि जमा करने आई थी। तभी प्रमिला की नजर बरामदे में कुर्सी डाल कर बैठे हुए परेश पर पड़ी थी परेश भी उसे पहचान गए थे। प्रमिला साठ वर्ष की और परेश बासठ वर्ष के थे पर बहुत कमजोर तथा अशक्त लग रहे थे। पूरे वृद्धाश्रम में वे सबसे कम उम्र के थे फिर भी सबसे कमजोर नजर आ रहे थे। वे प्रमिला को पहचान तो गए थे, बोले कैसी हो। प्रमिला ने कहा ठीक हूँ सुखी हूँ पति विवेक का बिजनेस अच्छा चल रहा है बेटे उपेन्द्र की शादी हमने इक्कीस वर्ष की उम्र में ही कर दी थी। बाइस वर्ष की उम्र में उसके यहाँ बेटे अंकुर का जन्म हुआ। उसकी पहली वर्षगाँठ पर हम वृद्धाश्रम में एक समय के भोजन के अंशदान की राशि जमा करने आए थे। एक बेटी है करुणा वो बी टेक कर रही है। सब कुछ ठीक चल रहा है। आप ...

कहानी: दामाद का घर

कौशल्या के दो बेटे एवं एक बेटी कुसुम थी। भरा पूरा परिवार होने के बाद भी वे पिछले दस सालों से अपने दामाद नरेन्द्र के साथ रह रही थीं। दामाद के यहाँ ही उन्होंने अंतिम साँस ली थी। अंतिम संस्कार के लिए जब नरेन्द्र ने उनके बड़े बेटे राजेश और अशोक को फोन पर सूचना दी तो उन्होंने साफ मना कर दिया कि हम न अंत्येष्टि में आएँगे न तेरहवीं में तुम्हें जैसा उचित लगे वैसा कर लो। नरेन्द्र क्या करते उन्होंने जब यह बात कुसुम से कही तो वो बड़ी दुखी हुई। फिर सँभलकर बोली माँ का दाह संस्कार हमारा बेटा दीपक करेगा। नरेन्द्र बोले पर वो तो अभी आठ वर्ष का है। तो होने दो इससे दाह संस्कार करने में क्या अड़चन है। नरेन्द्र बोले ठीक है और कौशल्या का दाह संस्कार उनके पोते दीपक ने ही किया। दाह संस्कार से नरेन्द्र और दीपक अभी आए थे और सासू माँ के गुजरने के बाद उनके मन में तरह-तरह के ख्याल आ रहे थे। नरेन्द्र को पन्द्रह साल पहले की कई घटनाएँ याद आने लगीं जब उनके ससुर राघव कॉर्पोरेशन की नौकरी से रिटायर हुए थे। तब जो भी फंड के रुपये मिले उससे उन्होंने अपने दोनों मकान ठीक कराये थे तथा एक नया मकान भी खरीदा था। पेंशन का...

कहानी: त्याग पत्र

सतेन्द्र पाँच साल पहले डिस्ट्रीब्यूटर दिनेश गोयल के यहाँ नौकरी करते थे। अपनी दस वर्षों की नौकरी में उन्होंने गोयल को अमीर बना दिया था। लेकिन गोयल ने उनकी निष्ठा, ईमानदारी और लगन की कोई कीमत नहीं की और उन्हें नौकरी से त्यागपत्र देने के लिए मजबूर कर दिया था। सतेन्द्र जी को गोयल ने इतना परेशान किया कि आखिर उन्हें नौकरी छोड़ना पड़ी। नौकरी छोड़ने के दस वर्ष पूर्व जब सतेन्द्र जी ने दिनेश गोयल के यहाँ नौकरी की थी तब गोयल की हैसियत ज्यादा अच्छी नहीं थी। तब गोयल का व्यवहार सतेन्द्र के प्रति बहुत अच्छा था। तब वो कहा करता- तुम तो मेरे भाई हो, बहुत अपनापन दिखाता था। सतेन्द्र के अथक परिश्रम से गोयल का कारोबार खूब बढ़ गया था। पहले तो गोयल उनको तनख्वाह के अलावा कमीशन के रूप में अच्छी रकम देता रहा जो उनकी मेहनत के मुकाबले काफी कम थी। हर साल तनख्वाह बढ़ोतरी होने के कारण सतेन्द्र जी की तनख्वाह अच्छी खासी हो गई थी पर तनख्वाह से दस गुना कमाई वे गोयल को देते थे पर गोयल को उनकी तनख्वाह खटकने लगी थी, उसने उन्हें कमीशन देना बंद कर दिया था। फिर वो उन्हें ताने देने लगा, जूनियरों के सामने उनकी बेइज्जती करने लगा ...

कहानी: अवसर का लाभ

एक एकड़ जमीन से खेती की शुरुआत करने वाले राजेन्द्र कुमार जी मात्र दस वर्षों में ही सत्तर एकड़ जमीन के मालिक बन गए थे साथ ही कोल्हूखेड़ी गाँव के सबसे संपन्न किसान भी। इसके अलावा वे गाँव के सरपंच भी थे। दस वर्ष पूर्व राजेन्द्र कुमार के पिताजी किशनलाल का जब निधन हुआ तब उन्हें पता चला कि वे उन्हें मात्र एक एकड़ जमीन ही देकर गए हैं। बाकी पूरी तीस एकड़ जमीन उनके सौतैले भाई विजय कुमार के नाम कर गए हैं। मकान के नाम से उसी एक एकड़ जमीन पर बनी छोटी सी टपरिया उन्हें दे गए थे। यह सब उनकी सौतेली माँ रूपा के कारण हुआ था। राजेन्द्र कुमार की माँ सरोज का तभी निधन हो गया था जब वे पाँच वर्ष के थे। इसके बाद किशनलाल जी ने रूपा से शादी कर ली रूपा से उन्हें एक लड़का हुआ जिसका नाम विजय रखा गया। विजय के जन्म लेने के बाद से ही राजेन्द्रकुमार जी के दुर्दिनों की शुरूआत हो गई थी। किशनलाल पूरी तरह से अपनी दूसरी पत्नी के कहने में थे। उन्होंने तीस एकड़ जमीन खुद ही खरीदी वो पैतृक नहीं थी। इसका फायदा रूपा ने उठाया। रूपा ने किशनलाल को अपनी बातों के जाल में फँसाकर सारी जमीन अपने लड़के विजय के नाम ...

कहानी: मीनू का रूबी

पूरे दो दिनबाद मीनू अपनी बकरी भूरी और उसके मेमने रूबी से मिली थी आज वो बहुत ख़ुश थी दो दिन से उस का रो रोकर बुरा हाल था उसने ठीक से खाना भी नहीं खाया था आज बेमन से स्कूल गई थी स्कूल में भी उसका मन नहीं लगा था अभी थोड़ी देर पहले स्कूल से मुँह लटकाए हुए आई थी तभी रूबी की मैं मैं की आवाज सुनकर वह चौंकी और जब उसने बाड़े में देखा तो भूरी को अपनी ओर प्रेम भरी नजर से देखता पाया उसका मेमना रूबी उसे देख कर उछल उछल कर हर्ष प्रकट कर रहा था यह देख रूबी के पापा प्रकाश और'उसकी मम्मी नीरा भी खुश हो रही थीं घर में फिर से रौनक आ गई थी। दो दिन पहले भूरी और रूबी को साहूकार छीतरमल का आदमी जबरदस्ती अपने साथ ले गया था कुछ महीने पहले प्रकाश ने साहूकार से पाँच हजार रुपये का कर्ज लिया था जिसका ब्याज अदा न कर पाने के कारण वो उसकी बकरी तथा उसके मेमने को जबरन खोलकर ले गया था प्रकाश बेबस होकर यह सब देखते रहे थे लेकिन छः वर्ष की नन्हीं मीनू के लिए यह ह्रदय विदारक दृश्य था उसी दिन से उसका रो रोकर बुरा हाल था अभी रुबी एक हफ्ते का तो था ही मीनू उसके साथ हमेशा रहती थी दो दिन तक रुबी इस कारण से स्कूल तक नही...

कहानी: बेटे बेटी में भेद

रजनी वैसे तो प्राथमिक शिक्षक थी पर स्कूल में बच्चों की पिटाई पर प्रतिबंध के कारण स्कूल में तो बच्चों की पिटाई नहीं करती थी पर अपनी बेटी प्रगति जो दसवीं में पढ़ती थी उस की बेरहमी से पिटाई करती थी। आज सुब्ह उसने अपनी बेटी को बड़ी बेरहमी से मारा था उसका होंठ फट गया था खून निकल आया था पर वो उसे रोता हुआ छोड़कर स्कूल आ गई थी पड़ोस की रोशनी भाभी ने प्रगति को चुप कराया था उसका खून पौंछा था प्रगति फिर तैयार होकर स्कूल चली गई थी। उसे मालूम था कि अगर वह सकूल नहीं जाती तो शाम को उसकी मम्मी उसकी पिटाई और ज्यादा करती लेकिन जब शाम को प्रगति स्कूल से घर आई तो पता चला कि उसकी मम्मी को पुलिस पकड़कर ले गई है । वो यह सुनकर घबरा गई पापा और भैया प्रवीर भी थाने में मम्मी को छुड़ाने गए थे।  उसने रोशनी भाभी से पूछा तो वो बोलीं तुम्हारे कारण पुलिस उन्हें पकड़कर ले गई है। प्रगति बोली मेरे कारण कैसे तब रोशनी ने बताया कि आज जब सुबह तुम्हारी मम्मी तुम्हारी बेरहमी से पिटाई कर रही थी तब किसी ने उस पिटाई का वीडियो बना लिया तथा उसे सोशल मीडिया पर डाल दिया पुलिस तुम्हारे भाई प्रवीर को भी ले गई है क्योंकि जब ...

कहानी: नौकरी छोड़कर

दबंग नेता एवं राज्य के केबिनेट मंत्री सियाराम सरन आज लोकप्रियता का शिखर छू रहे थे। बहुमुखी प्रतिभा के धनी श्री सरन दस वर्ष पहले शिक्षा विभाग में माध्यमिक शिक्षक के पद पर कार्यरत थे। वहाँ से वे नौकरी छोड़कर राजनीति में आए थे और आज कामयाब नेता बनकर उभरे थे। सियाराम सरन जी का बचपन घोर गरीबी में बीता था। उनके पिताजी शिव सरन शराबी थे और कोई काम नहीं करते थे। उनकी माँ शीला मजदूरी कर परिवार का भरण पोषण करती थी। उसी में उनका पति शराब के लिए रुपये छीन लेता था। ऐसी परिस्थति में रहते हुए उन्होंने आठवीं तक की पढ़ाई बरखेड़ा गाँव में की थी। इसके बाद वे गाँव के मुखिया सोमेश्वर के लड़के अमित के नौकर बनकर शहर में आ गए थे। अमित ने शहर के महँगे पब्लिक स्कूल में एडमिशन लिया था। इसके साथ ही मुखिया जी ने सियाराम सरन जी का नवमी में एडमीशन सरकारी स्कूल में करा दिया था। सियाराम सरन जी का काम घर की देखभाल करना, बाजार से सामान लाना, चाय-नाश्ता और खाना बनाने का था, इसके अलावा और भी कई घरेलू काम करना था। जब अमित स्कूल चला जाता इस के बाद श्री सरन स्कूल जाते थे। स्कूल से आने के बाद ...

कहानी: भले बुरे

कौशल्या की नुक्कड़ पर सब्जी की छोटी सी दुकान थी। आज सुबह उन्हें कोई पाँच सौ रुपये का नकली नोट थमा गया था। जिससे उनकी बोनी खराब हो गई थी पर दुकान बंद करने तक आज उनके साथ जो अच्छा हुआ उससे वो सुबह का हुआ नुक्सान भूल गईं। शाम को जब वो घर आई तो पाँच सौ के पंद्रह सौ रुपये ज्यादा लेकर आई आज उनका सारा सामान बिक गया था जिससे वो बहुत खुश थीं। सुबह जब कौशल्या जी ने अपनी दुकान खोली तो उस पर थोड़ी देर बाद एक व्यक्ति आया उसने एक किलो टमाटर लिए तथा पाँच सौ का नोट दिया। कौशल्या जी ने वो नोट सरसरी नजर से देखा तो वो नोट उन्हें ठीक लगा। उन्होंने साठ रुपये टमाटर के काटकर चार सौ चालीस रुपये वापस कर दिए जिसे वो व्यक्ति लेकर फौरन चला गया। उस दिन की वो बोनी थी इसलिए कौशल्या जी ने गल्ले के सारे खुल्ले पैसे दे दिए थे। जब और ग्राहक आए और उन्हें खुल्ले पैसों की जरूरत पड़ी तो वो सामने अतुल किराना स्टोर पर गईं। तब पता चला कि वो नोट तो नकली है। कौशल्या की पाँव के नीचे की जमीन खिसक गई। इतना तो वो दिन भर बैठकर नहीं कमा पाती जितना वो एक झटके में चला गया था। वो बड़ी देर तक उदास रहीं बाद में जब ग्राहक आने लगे तो वे उनमे...

कहानी: बकरी

वनक्षेत्र के समीप स्थित गाँव खुशामदा के बकरी पालक रमणलाल ने इस बार के पशु मेले में पाँच लाख रुपये के बकरे बेचे थे। दो महीने पहले वो तीन लाख रुपये की बकरियाँ बेच चुका था इसके अलावा हर महीने वो चालीस हज़ार रुपये का बकरी का दूध भी बेच देता था। उसने गाँव में पक्का मकान बनवा लिया था और अच्छे से अपना जीवन यापन कर रहा था। जबकि दूसरी और उसका पड़ोसी किसान ओम प्रकाश दस एकड़ का भूमि स्वामी होने के बाद भी गले-गले तक कर्ज में डूबा हुआ था। दो लाख रुपये कर्ज तो रमणलाल ने भी उसे दे रखा था। रमणलाल के पास आठ साल पहले कुछ नहीं था। वो अत्यंत गरीब खेतिहर मजदूर था। महीने में कभी बीस दिन तो कभी दस दिन ही उसे काम मिलता था। जिसमें उसका मुश्किल से गुजर बसर होता था। रमणलाल ने तब गाँव के किसान हेमराज के यहाँ कुआँ की खुदाई के कार्य में मजदूरी की थी उसके एक हज़ार रुपये बकाए थे। वो अपने रुपये का तकाजा करने हेमराज के पास गया था। हेमराज को उदास देखकर उसने कारण पूछा तो हेमराज ने दौखक होकर कहा कि बच्चे को बकरी का दूध पिलाने का परामर्श वैद्य जी ने दिया था। उसके लिए मैं बाजार से बकरी लाया था जो दो चार दिन में जनने वाली थी...

कहानी: कम पढ़ा लिखा

राम स्वरूप और शिवस्वरूप दोनों सगे भाई थे राम स्वरूप छठी कक्षा तक ही पढ़ा था जबकि शिवस्वरूप ने गणित में प्रथमश्रेणी में एम सी की डिग्री ली थी तथा बी एड किया था शिवस्वरूप की उम्र बयालीस वर्ष की हो गई थी और अभी तक बेरोजगार था उसकी शादी भी नहीं हुई थी जबकि राम स्वरूप शहर के सबसे अच्छे रोशनी रेस्टोरेन्ट का मालिक था उसकी शादी को पन्द्रह साल हो ग गए थे उसकी पत्नी का नाम जानकी था उसको दो बच्चे थे बच्ची का नाम अनुराधा तथा बच्चे का नाम अनुपम था दोनों शहर के सबसे अच्छे स्कूल में पढ़ते थे रामस्वरूप की शहर के बड़े रईसों में गिनती होती थी वह रोटरी क्लब का अध्यक्ष था जबकि शिवस्वरूप पिता राम किशोर जी की पेन्शन के सहारे से रह रहा था। आज रामस्वरूप रात के ग्यारह बजे घर आया था । पत्नी से कह रहा था काम बढ़ता ही जा रहा है सुब्हसे शाम तक ग्राहकों की भीड़ कभी कम ही नहीं होती जितना माल बनाओ सब बिक जाता है। रामस्वरूप के पिताजी पन्द्रह वर्ष पहले कृषि विभाग में बढ़े बाबू थे रामस्वरूप पढ़ नहीं पाया था इसलिए वे उसे हिकारत भरी नजरों से देखते थे सबके सामने उसकी बेइज्जती करते रहते थे । शिवस्वरूप उनका बडा ...

कहानी: रिश्तों की खटास

रोशनलाल ने पाँच साल पहले अपनी पत्नी कुसुम एवं ससुर रामलाल के कहने पर साले वीरेन्द्र को मकान खरीदने के लिए पूरे दस लाख रुपये बैंक से पर्सनल लोन लेकर दिए थे। जिसकी एक पाई भी वीरेन्द्र ने नहीं चुकाई थी। फोन उठाना बंद कर दिया था बात करना मिलना जुलना सब बंद हो गया था। ससुर ने भी कन्नी काट ली थी और पत्नी कुसुम की मनोदशा भी ठीक नहीं थी क्योंकि  वे पैसे उनके लिऐ बहुत जरूरी थे जो उसका भाई हज़म कर गया था। रोशनलाल ने पूरे पाँच साल तक उस लोन की किश्त बैंक में भरी थी। दस लाख के अलावा तीन लाख का ब्याज भी भरा था। लेकिन वीरेन्द्र को इसका जरा भी मलाल नहीं था। जब वीरेन्द्र को पैसे लेना थे तब उसने रोशनलाल से बड़ी बड़ी बातें कहीं थीं जीजाजी आप मुझसे छोटे हो आपका पैसा खाकर मैं पाप में क्यों पड़ूँगा। ससुर रामलाल ने कहा था दामाद जी मेरी पूरी जवाबदारी है अगर मेरा बेटा आपके पैसे नही देगा तो मैं दूँगा लेकिन वे अब इस बात से इंकार कर रहे थे। कह रहे थे मैंने कब कहा ऐसा आप दोनों का मामला आप दोनों जानों मुझे इससे कोई लेना देना नहीं है। इस पर ससुर दामाद में खूब कहासुनी हुई ...

कहानी: दत्तक पुत्र

बलरामपुर के फुड इंस्पेक्टर रविकिशन ने जिस श्याम बेकरी का निरीक्षण कर नमूने लिए थे उसकी जाँच रिपोर्ट आने के बाद उन्होंने वो बेकरी सील करवाकर उसका फूड लाइसेन्स रद्द कराया था तथा बेकरी के मालिक सतीश राय के खिलाफ प्रकरण ऐसा बनाया था जिसके कारण अदालत ने उसे तीन साल के कारावास की सजा सुनाई थी। उन्होंने अपना काम ईमानदारी से किया था। पूरे पाँच लाख की रिश्वत का ऑफर भी ठुकरा दिया था। दरअसल ये बेकरी उसकी थी जिसकी पत्नी कमला ने उनको आसरा होम से गोद लिया था और बाद में जब उनका खुद का बेटा हो गया तब महज ग्यारह साल की उम्र में उन्हें घर से निकाल दिया था। बात बत्तीस वर्ष पुरानी है जब कमला अपने पहले पति रामकिशन के साथ रहती थी। दोनों की शादी को तीन साल हो गए थे। उनको कोई संतान नहीं हुई थी। रामकिशन की किराने की दुकान थी। जब उन्होंने अस्पताल में इसकी जाँच कराई तो पता चला कि रामकिशन कभी पिता नहीं बन सकेंगे। ऐसी स्थिति में उन्होंने किसी अनाथ बच्चे को गोद लेने का निर्णय लिया। वे इसी तलाश में थे कि उन्हें पता चला कि आसरा होम में एक तीन महीने का बालक है जो लावारिस अवस्था में रेल्वे स्टेशन के प्लेटफाॅर्म पर मिला...

कहानी: मिर्च का भाव

महानगर के न्यू मार्केद के एक हिस्से पर गाँव से आए कुछ किसानों की एक दर्जन सब्जी फल फूल की दुकाने थीं उनमें जो सबसे बड़ी दुकान थी वो किशनलाल पटेल की थी सभी किसान बमूलिया गाँ के थे जो महानगर से पच्चीस किलोमीटर दूर था पिछले पाँच सालों से वे ये दुकान लगा रहे थे और सभी खूब संपन्न थे वे सब अपने खुद के खेत में उपजी सब्जी फल फूल बेचते थे । इसमें बिचौलियों की कोई भूमिका नहीं थी सब्जी सीधे उत्पादक द्वारा ग्राहकों तक प हुँचती उचित भाव से ताजी सब्जी लेकर ग्राहक भी बहुत खुश होते थे यही कारण था कि सुब्ह शाम न्यू मार्केट के उस सब्जी फल वाले कार्नर पर ग्राहकों की भीड़ उमड़ पड़ती थी रात के आठ बजे तक पूरी सब्जी बिक जाती थी आज भी किशनलाल सब्जी बेचकर बमूलिया आए थे रात के नौ बजने वाले थे सब्जी उत्पादक के साथ ही फुटकर विक्रेता बनने से आज वे करोड़पति किसान बन गए थे उनका घर गाँव में सबसे आलीशान था। किशन लाल आज जो बिक्री हुई थी उसका हिसा जोड़ रहे थे पूरे डेढ लाख रुपये की सब्जी बिकी थी उन्होने हिसाब लगाया यदि यही सब्जी वे दलालों को देकर आते तो इस के मुश्किल से तीस हज़ार रुपये ही मिलते जिसमें प हजार र...

कहानी: सब्जी पूड़ी का ठेला

दो साल पहले शिवलाल जी का सब्जी पुड़ी का ठेला शहर के मुख्य स्थान चौक में लगता था। उन्हें एक दिन में चौदह घंटे तक फुर्सत नहीं मिलती इतनी सब्जी पुड़ी की बिक्री होती थी। वे तीस रुपये में पाँच पुड़ी एवं सब्जी देते थे। जिसे लेने के लिए लोग टूट पड़ते थे। आसपास काम करने वाले लोगों की कमी नहीं थी जो अपने सुबह का नाश्ता शिवलाल जी की दुकान से करते थे। आज वही शिवलाल की बहुत बुरी हालत थी वो भी उनसे हुई भूल के कारण। दो साल पहले अतिक्रमण हटाओ अभियान के तहत उनका ठेला चौक से हटा दिया गया था। इसके बाद उनकी लाख कोशिशों के बाद भी वे वापस अपना ठेला वहाँ नही लगा सके थे। वहाँ से हटने के बाद जहाँ उन्होंने अपना ठेला लगाया था वहाँ उनकी बिक्री बहुत कम थी। कहाँ तो उनकी दुकान पर छः नौकर काम करते थे और अब हालत ये थी की वे अकेले ही काम सम्हाल रहे थे। जिसमें अधिकाँश समय उनका फुर्सत में ही व्यतीत होता था। दो साल पहले तक सब कुछ ठीक था। तब उनके ठेले पर राजू काम करता था। राजू के हाथों में कमाल था वो सब्जी बनाता था पूड़ी भी वही बनाता था। शिवलाल जी तो भुगतान लेते थे। शिवलाल जी से...

कहानी: धंधा

हरीश वर्मा ऑफिस में एकाउण्टेन्ट थे जहाँ से उन्हें सत्तर हज़ार रुपये प्रतिमाह तनख्वाह मिलती थी। उन्हीं के बगल में एक ठेले पर धंधा करने वाला फेरीवेला श्यामलाल भी रहता था। आज हरीश नौ बजे ऑफिस गए थे और पूरे बारह घंटे में नौ बजे रात को घर आए थे। सर दर्द से फटा जा रहा था। दिन भर खूब काम किया था। लंच करने के लिए सिर्फ दस मिनट का वक्त मिला था। जबकि श्याम लाल ने कुल तीन घंटे ठैले की फेरी लगाई थी बाकी पूरे दिन घर रहा था। हरीश उसके ठाठ बाट देखकर हैरान रहते थे। आज श्यामलाल ने उनसे पूछ ही लिया था कि बाबूजी ऐसी कौन सी नौकरी कर रहे हैं आप जो रोज नौ बजे जाते हो और रात के नौ बजे घर आते हो। हरीश जी ने कहा सरकारी विभाग में एकाउन्टेन्ट हूँ। श्यामलाल ने पूछा कितनी सैलरी मिलती है, हरीश गर्व से बोले पूरे सत्तर हज़ार रुपये महीने। यह सुनकर श्यामलाल बोला बस इतनी कम तनख्वाह और इतना सारा काम। रोज के तेइस सौ रुपये पड़ते हैं आपको घर का खर्च मुश्किल से निकलता होगा। यह सुनकर हरीश जी को तैश आ गया बोले- बोल तो ऐसा रहा है जैसे खुद लाखों रुपये रोज के कमा रहा हो। इस पर श्यामलाल ने कहा लाख रुपये रोज तो नहीं पर हाँ रोज ठीक-...

कहानी: जेल की हवा

पी डबल्यू डी के बड़े बाबू राधेश्याम भ्रष्टाचार के जुर्म में जेल की हवा खा रहे थे उन्हें तीन साल का कारावास मिला था महज दस हज़ार रुपये की रिश्वत में उनकी नौकरी भी चली गई और सज़ा मिली वो अलग इसके साथ ही बदनामी भी खूब हुई थी। राधेश्याम जी की पी डब्ल्यू डी में पन्द्रह वर्ष पहले नौकरी लगी थी वे छोटे बाबू के पद पर नियुक्त हुए थे नौकरी के लगते ही उनकी शादी के प्रस्ताव आना शुरू हो गए जल्दी ही उनकी शादी नीरा से हो गई शादी में उन्हें खूब दान दहेज मिला वे खुशी से फूले नहीं समा रहे थे।दूसरी और उनके साथ पढ़ने वाला किशोर सिंह न्यूज पेपर एजेन्ट बन अखबार बेच रहा था सरकारी नौकरी नहीं होने के कारण उसकी?शादी नहीं हो रही थी हॉकर समझकर भी उन्हें कोई शादी का प्रस्ताव नहीं दे रहा था राधेश्याम को तनख्वाह के अलावा ऊपर की कमाई भी खूब हो रही थी। वो बड़े ठाठ बाट से रहते थे ।किशोर सिंह का तो बस गुज़ारा चल रहा था। एक दिन किशोर सिंह ने विचार किया राधेश्याम ने और उसने एक साथ ही बी ए किया था राधेश्याम ने इसके बाद नौकरी के लिए खूब मेहनत की थी सो उनकी तो नौकरी लग गई थी लेकिन किशोर सिंह ने लापरवाही कर दी थी ।...

कहानी: मनचली कचौड़ी

हाइवे किनारे एक कस्बा था वीरपुर, वहाँ मनसुख लाल की मनचली कचौड़ी दूर दूर तक प्रसिद्ध थी। जो भी उधर से गुजरता था वो कचौड़ी तो खाता ही था। साथ में बीस-बीस कचौड़ी पैक करा कर भी ले जाता था। मनसुख लाल के अलावा और भी कई दुकानें थी जो मनचली कचौड़ी के नाम से कचौड़ी बेचती थीं पर उनकी दुकान पर ग्राहकों की वैसी भीड़ नहीं रहती थी जैसी मनसुख भाई की दुकान पर हर समय रहती थी। आज मनसुख भाई पूरे तेरह घंटे बाद काउंटर से उठे थे। उनके बड़े लड़के रवीन्द्र ने कउण्टर सम्हाल लिया था। हालत यह थी की उनकी दुकान चौबीसों घंटे खुली रहती थी। मनसुखलाल जी की उम्र बहत्तर साल की हो गई थी। बावन साल से वे कचौड़ी बेच रहे थे। इसकी शुरूआत उन्होंने अपने घर से ही की थी। तब वे बीस साल के थे। उन्हें कुकिंग का शौक था। वे कचौड़ी बहुत अच्छी बनाते थे। वीरपुर में उन दिनों हायर सेकेण्डरी स्कूल था। उसका होस्टल था जिसमें सौ बच्चे रहते थे चार रसोईये काम करते थे उसमें से एक रसोईया सोहन एक महीने की छुट्टी लेना चाहता था। वार्डन ने कहा अपनी जगह किसी ओर की व्यवस्था कर के जाओ तब सोहन ने मनसुख जी से कहा कि वो उनकी ऐवज में काम कर ले। मनसुख भाई तैय...