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अक्टूबर, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

व्यंग्य: छोड़कर जाने के बाद

अक्सर ऐसा होता है । कि हम जिसके साथ रहते हैं उसके महत्व का हम आँकलन नहीं कर पाते हमे उससे उकताहट होने लगती है फिर हमारे उससे संबंध खराब होने लगते हैं। अगर वो हमारा आश्रित तो हम उसे बोझ समझने लगते हैं। कुछ तो यह तक कह देते हैं कि हराम की खा रहा है । जब खुद कमाकर खाएगा तब पता चलेगा कि कितनी मुश्किल से पैसा कमाया जाता है। डससे संबंध अधिक कटु हो जाते हैं तो इनका अंत तभी होता है जब कोई छोड़कर चला जाता है। उसके जाने के बाद उसकी अहमियत का पता चलता है। तब उसकी कमी खूब खलती है लेकिन फिर वो हमारी पहुँच से बहुत दूर हो जाता है। रश्मि ने जब बी एस सी कर ली तो बी एड करने के लिए वो अपने भाई भाभी के पास बड़े शहर में आ गई। भैया भाभी और उनका एक वर्ष का बैटा था रिंकं भाई का थ्री बी एच के फ्लेट था। एक कमरा उसे रहने के लिए दे दिया गया। रश्मि पढ़ाई के अलावा घर के कामों में भी सहयोग करती थी उसकी पढ़ाई का सारा खर्च उसके पापा उठा रहे थे भाई के यहाँ तो वो भोजन करती थी और रहती थी। बाजार से सामान भी खरीद कर वो लाती थी रिंकू की देखभाल भी करती थी। कभी कभी रसोई में भी हाथ बँटाती थी । फिर भी रश्मि की भाभी को ...

व्यंग्य: जानबूझकर अवसर गँवाने वाले

जीवन में अच्छे अवसर बड़ी मुश्किल से मिलते है। और जो लोग ऐसा अवसर यह सोचकर गँवा देते हैं कि आगे चलकर इससे अच्छा अवसर मिलेगा उसका लाभ उठा लेंगे ।फिर ऐसा अवसर कभी नहीं आता । और अवसर गँवाने वाले के पास सिवाय पछतावे के और कुछ नहीं बचता। कई बार ऐसा होता है । जिसे हम छोटा अवसर समझकर छोड़ देते बाद में वही बेहतर अवसर साबित होता है। जो फिर हमें कभी नहीं मिलता। आलोक और सुरेश कामर्स विषय से हायर सेकेण्डरी में पढ़ रहे थे। बारहवीं की परीक्षा देने के बाद सुरेश को एक अवसर मिला गल्ला व्यापारी लाभमल जी को एक लिखापड़ी करने वाले की जरूरत थी । वे सुरेश को जानते थे। उन्होंने उससे अपने यहाँ काम करने को कहा वेतन कम था । इसलिए उसने मना कर दिया लाभमल जी बोले । कोई ओर काम करने का इच्छुक हो तो बताना सुरेश ने यह बात आलोक से कहते हुए कहा कि बी कॉम करेंगे तो अच्छा रहेगा किसी दुकान पर लिखा पढ़ी का काम कर के क्यों अपना भविष्य बिगाड़ें। मगर आलोक की सोच ऐसी नहीं थी। वो लाभमल जी के पास पहुँचा और काम करने की इच्छा प्रकट की। लाभमल जी ने उसे काम पर रख लिया। दिनभर की लिखापढ़ी का काम तीन घंटे में पूरा हो जाता था। ...

व्यंग्य: विश्वासघाती

कहते हैं कि विश्वास को बड़ी मुश्किल से कायम किया जाता हैं। आज के दौर में आसानी से विश्वास नहीं जमाया जा सकता जबकि विश्वास को तोड़ना आसान हैं लेकिन फिर टूटे हुए विश्वास को जोड़ना मुमकिन नहीं है। जो विश्वास तोड़ देते हैं । वे विश्वासघाती कहलाते हैं। जिन पर दुबारा कोई कभी विश्वास नहीं करता। जो चतुर चालाक चपल अवसरवादी टाइप के लोग होते हैं वे जरा से लोभ में विश्वास तोड़ने में देरी नहीं करते। ऐसे लोग बहुत बड़ी गलती कर बैठते हैं जिसके परिणाम का उनको भी अंदाज नहीं होता। पुरुषोत्तम दास जी एक ईमानदार नेक दिल और भले इंसान थे । उनकी बाजार में दुकान थी कुछ लेनदेन का काम भी करते थे। कुल मिलाकर वे सुखी जीवन जी रहे थे । लोग भी उनसे खुश थे और उन्हें भी किसी से कोई शिकायत नहीं थे। आज तक उन्होंने किसी का विश्वास नहीं तोड़ा था। न ही उनका किसी ने भरोसा तोड़ा था। इसिलिए उनका कारोबार आराम से चल रहा था उनकी जुबान से निकली बात पत्थर पर लिखी लकीर की तरह मानी जाती थी। उनका इकलौता लड़का था। हरीश उसके अपने पिताजी से गहरे मतभेद थे। वो अपने पिताजी की कार्य प्रणाली से संतुषट नहीं था। वो अति महत्वाकाँक्षी था। वो ...

व्यंग्य: सामंती सोच

वैसे तो सामंतवाद दुनिया से कब का खत्म हो चुका है लेकिन सामंती सोच अभी तक खत्म नहीं हुई है। यह अभी भी कायम है। शहरी क्षेत्र में ये अलग रूप में है और ग्रामीण क्षेत्रों में अलग रूप में है। जो सामंती सोच वाले हैं वे अक्सर संपन्न और प्रभावशाली वर्ग के होते हैं इनके क्षेत्र में कोई भी गतिविधा इनकी सहमति के बिना नहीं हो सकती कोई कितना ही सक्षम क्यों न हो पर इनकी बराबरी करने की सोच भी नहीं सकता। ग्रामीण क्षेत्रों में तो इन सामंतवादी सोच रखने वालों ने लोगों का जीना मुश्किल कर रखा है। एक गाँव के त्रिभुवन सिंह का रौब भी ऐसा ही था। गाँव में उनसे बड़ा किसी का मकान नहीं था । कोई उनसे आँख से आँख मिलाकर बात नहीं कर सकता था बाहर से जो भी अतिथि या कोई और किसी काम से आता तो उसे सबसे पहले उनके दरबार में उपस्थित होना पढ़ता था। कोई मँहगे और अच्छे कपड़े भी नहीं पहन सकता था भले ही वो कितना ही संपन्न क्यों न हो कोई अगर मेहमानी करने गाँव से बाहर जाता तो वो अच्छे कपड़े गाँव की सीमा के बाहर पहनता था। और जब वापस आता तो कपड़े बदल कर गाँव की सीमा में प्रेवेश करता था एक बार की बात हैं एक ग्रामीण कुंजीलाल ने एक...

व्यंग्य: चाहत के रूप

किसी के दिल में किसी के प्रति जो चाहत उत्पन्न होती है उसके कई कारण हो सकते हैं ठीक उसी प्रकार नफरत भी कई कारणों से हो सकती है। चाहत का मतलब प्रेम ही नहीं होता। ये चाहत कभी स्लार्थ के कारण भी हो सकती है। जिससे काम निकालना हो उसके प्रति भी चाहत होती है।  जो संबंध स्वार्थ के आधार पर बनते हैं उनमें प्रेम का अभाव होता है । ऐसे संबंध स्वार्थ पूरा होने पर टूट भी जाते हैं।  जिस तरह प्रेम किसी से भी हो सकता है । उसी तरफ नफरत भी किसी से भी हो सकती है प्रेम विवाह करने वाले भी शादी के कुछ साल बाद यह कहते नजर आते हैं कि तुमसे शादी के बाद पछता रहे हैं। जब पति पत्नी के बीच संबंध कटु हो जाते हैं तो बच्चों का मोह उन संबंधों को बनाए रखता है। सच्चा प्रेम इन सबसे हटकर होता है। सच्चे प्रेम त्याग समर्पण और बलिदान का जज्बा रहता है इस में प्रेमी प्रेमिका एक दूसदरे की चाहत में अपनी जान तक भी दे सकते है। यदि हम संबंधों को प्रेम का आधार बना लें तो स्वार्थ का भाव ही तिरोहित हो जाएगा। दिल में प्रेम रखकर हम यदि किसी का काम करेंगे तो उस काम को करने से खुशी मिलेगी । न उकताहट झुँझलाहट और बैचेनी। होगी...

व्यंग्य: सुख के सपने

जिनके पास दुखों की भरमार है वे सुख के सपने सजाकर अपनी जिंदगी जीते रहते हैं । वे सोचते हैं कि कभी वो दिन भी आएगा जब हमें भी खूब सुख मिलेंगे हमारी भी सारी कामनाएँ पूरी होंगी। दिन गुजरते चले जाते हैं इच्छित सुख भी मिलते हैं फिर भी इंसान सुखी नही दिखता । क्योंकि फिर वो नए सुख के सपने देखने लगता है। नई कामनाएँ उत्पन्न हो जाती हैं और वो इनकी पूर्ति में जुटा रहता है। यह सब करते हुए वो उम्र की गिनती भी भूल जाता है समय के साथ व्यक्ति तो बूढ़ा हो जाता है लेकिन मन जवान रहता है। जब शरीर साथ नहीं देता कार्यक्षमता घट जाती है । तब उसे पुराने दिन याद आते हैं। फिर वो सोचता है कि पुराने दिन कितने अच्छे थे सब कुख कितना बेहतर था। आज की तुलना में तो कई गुना बेहतर था । बुढ़ापे में अक्सर लोग पुराने दिनों की यादों को तरोताजा करने लगते हैं। क्योंकि भविष्य से उनकी आस खत्म हो जाती है वे समझ जाते हैं कि बुढ़ापे का भविष्य मौत है । वे इस मौत के डर को भुलाना चाहते हैं इसिलिए अतीत में खोए रहते हैं।     नरेन्द्र जी एक सरकारी विभाग में अधिकारी थे खूब रुतबा था मोटी तनखा मिलती थी। ऑफिस में सब उन से डरते थे हर...

व्यंग्य: आगे निकलने की होड़

एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ ने आदमी का सुख चैन छीन लिया हैं अच्छा मकान है अच्छी नौकरी है सारे सुख साधन है। फिर भी व्यक्ति को संतोष नहीं है वो अपने सुखों से इतना सुखी नहीं होता जितना दूसरों के सुखों को देखकर दुखी होता है। किसी के पास सात लाख की कार है और कोई उसका परिचित पन्द्रह लाख की कार ले आया तो उसे अपने सात लाख की कार बुरी लगने लगेगी ऐसा रोहन के साथ हुआ जैसे ही उसके प्रतिद्वंदी रितिक ने पन्द्रह लाख की कार खरीदी वैसे ही रोहन की सात लाख की कार की खुशी दुख में बदल गई । उसकी पत्नी उससे ज्यादा दुखी रहने लगी उनका इम्प्रेशन डाउन हो रहा था। वे खुद को अपमानित महसूस कर रहे थे। रोहन की इतनी आमदनी भी नहीं थी। फिर भी वे बैचेन थे ये कार खरीदे उन्हें छ़ महीने ही हुए थे। और अंततः यह हुआ कि वो कार उन्होंने चार लाख रुपये में बेच दी और बाइस लाख की कार वे ले आए अब रोहन का परिवार खुशी से फूला नहीं समा रहा था जबकि रितिक के यहाँ मातम पसरा हुआ था उन्हें अब अपनी पन्द्रह लाख की कार बुरी लगने लगी थी। इस प्रतियोगिता ने उन्हें गहरे आर्थिक संकट में डाल दिया था। हम भौतिक वस्तुओं पर गर्व कर रहे हैं ...

व्यंग्य: अपमानित

कई परिवारों में ऐसे बुजुर्ग मिल जाएँगे जो बहू बैटों के द्वारा किए गए अपमान को सहकर अपने बुढ़ापे के दिन गुजार रहे हैं । इनमें उन पिताओं की संख्या ज्यादा है जिन्होंने अपनी सारी जिंदगी परिवार को सँवारने में गुजार दी व्यवसाय जमायः बच्चों को पढ़ाया लिखाया उनका विवाह किया नाती पोतों की वरवरिश में भी अहम भूमिका निभाई जब वे ज्यादा बूढ़े हो गए और उनके सारे कारोबार पर बेटों ने कब्जा कर लिये तो अब उन्हें अपमानित होकर जिंदगी जीना पड़ रहा है।  स्थिति तब और बिगड़ जाती है जब उनकी बूढ़ी जीवन संगिनी का निधन हो गया हो ऐसे में वे अपने मन की बातें भी नहीं कह पाते और अपमान सहकर घुटते रहते हैं।    सोमनाथ जी ने गाँव से शहर आकर एक होटल में वेटर का काम कर धन कमाना शुरू किया था उन्होंने खूब परिश्रम किया जिसके परिणाम स्वरूप उन्होंने एक मिष्ठान्न भंढार और एक होटल तथा एक भोजनालय खोल लिया । बड़ा मकान बनवाया दो बेपों एक बेटी की शादी धूमधाम से की परिवार को समृद्ध और सुखी बनाया। फिर अपना सारा कारोबार बेटों को सौप दिया वे यह सोचकर खुश थे कि अब वे अपने बुढ़ापे के दिन आराम से गुजारेंगे। बेटे क...

व्यंग्य: बुरी नियत वाले

कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनकी नियत बहुत बुरी होती है ये खुद चिपड़ी रोटी खा रहे हों मेवा मिषाठान्न का सेवन कर रहे हों उसकी उन्हें इतनी खुशी नहीं होती जितना दुख किसी रूखी सूखी खाने वालो को दो टाइम का भर पेट भोजन मिल जाए तब होता है। यह उससे जलने लगते हैं। इनसे कम हैसियत वाला अगर कार खरीद ले तो इनके कलेजे पर साँप लोटने लगता है। फिर ये उसके पीछे हाथ धोकर पड छाते हैं उसकी आय के स्त्रोत बंद करने का प्रयास करते हैं उसके सामने आर्थिक संकट खड़े कर देते हैं। उसका पैसा खर्च कराने की साजिशें रचते हैं ओर जब वो घोर आर्थिक संकट में घिर कर अपनी कार को औने पौने दाम में बेच देता है तो इनके कलेगे को बड़ी ठंडक पहुँचती है। कुठ लोग की नियत दूसरे की जमीन जायदाद पर लगी होती है । किसी का घर इन्हें समझ में आ जाए तो उसे बिकवाने की कोशिशें करना ये शुरू कर देते हैं।  रामलाल का मकान सड़क पर था पिछले कुछ सालों में वहाँ अच्छा बाजार विकसित हो गया था । सोहनलाल का मकान गली में था उसकी दुकान किराये की थी । उसकी गलत नजर रामलाल के मकान पर लगी हुई थी । वो उस मकान को हड़पना चाहता था । उसकी सोच यह थी कि अगर रामला...

व्यंग्य: गलती किसकी

आजकल माता पिता इस बात से दुखी रहते हैं कि उनके बच्चे संस्कारी नहीं हैं मतलबी हैं संवेदना विहीन हैं लालची हैं गुस्सैल हैं ।किसी की मजबूरी का फायदा उठाने में भी उन्हें संकोच नहीं होता है। पर इसमें गलती किसकी है ।  कभी इस पर भी तो विचार करों क्या उनके माता पिता की कोई गलती नहीं है क्या एक युवक कह रहा था कि शाम को मैं और पिताजी एक साथ शराब का सेवन करते है। ऐसे लोग अपने बच्चों से भले की उम्मीद रखते हैं। बच्चा छोटा था आपने उसे झूठ बोलना सिखाया आपने उसे छल कपट करना सिखाया बेईमानी करना सिखाई आपने उसे बड़ों की इज्जत करना नहीं सिखाई अगर उसने आपके सामने बड़ों की बेइज्जती की तब भी आपने कुछ नहीं कहा। अब जब वो आपको दुख दे रहा है परेशान कर रहा है तो आप तिलमिला रहे हो ऐसे संस्कार विहीन बच्चे ही तो माँ बाप को वृद्धाश्रम में छोड़ जाते हैं। यहि आप बच्चों को संस्कारी बनाना चाहते हैं तो आपको भी संस्कारी बनना ही होगा आपको बच्चों के सामने अपना उदाहरण प्रस्तुत करना पड़ेगा तब कहीं बच्चे संस्कारी हो पाएँगे। बच्चों को अंपनी संस्कृति का ज्ञान चरना भी आवश्यक है। महापुरूषों के जीवन के उदाहरण बताना जरूरी...

व्यंग्य: ख़ुशियाँ बाँटने वाले

वैसे तो दोपावली खुशियों का त्यौहार है ये रोशनी हमारी खुशी और आनंद को बढ़ाने वाली होती है । लोग यह त्यौहार खुशी के साथ मनाते हैं पर आपके लिए खुशी जुटाने वाले आपको खुशियाँ बाँटने वाले किस हाल में रहते हैं ये कोई जानने का प्रयास नहीं करता लोगों को खुशी बाँटने वाले यह लोज ठीक से त्यौहार भी नहीं मना पाते। कपड़े सीने वाले त्यौहार के दिन तक भी लगातार काम करते हैं जब वह रात को ग्यारह बजे घर पहुँचते हैं तब उनके यहाँ लक्ष्मी जी का पूजन होता है और दिए जलते हैं इसी तरह दुकानों पर काम करने वाले भी लगातार काम करते रहते हैं दीपावली के दिन बाजार में खूब भीड़ होती है। और व्यापारी तथा उनके यहाँ काम करने वाले लगातार काम करते रहते हैं कमर सीधी करने की भी उन्हें फुरसत नहीं मिलती । जो धनवान हैं साधन संपन्न हैं वे तो धूमधाम से त्यौहार मना लेते हैं लेकिन जो गरीब हैं उनका त्यौहार फीका ही रहता है। किशनलाल जहाँ काम करता था वहाँ से उसका काम छूट गया फिर उसकी तबियत खराब हो गई। इसी बीच दीपावली का पर्व आ गया घर में कुछ नहीं था थोड़े से चावल बनाए दो दीपक जला लिए और इस तरह दीपावली पूजन करके आधा पेट भोजन करके उनका त...

व्यंग्य: अपनी खुशियों को बाँटकर तो देखो ज़रा

ऐसा कहा जाता है कि यदि अपना दुख किसी को बता दो तो वह कुछ कम हो जाता है। ठीक उसके विपरीत खुशियों को अगर बाँट दो तो वह कई गुना बढ़ जाती है। अब मन में यह विचार आता है कि ये खुशियाँ कहाँ बाँटी जाएँ । तो इसका सीधा सरल जवाब है कि इन्हें हमारे आसपास के लोगों में भी बाँटा जा सकता है । ढूँढोगे तो ऐसे बहुत से लोग मिल जाएँगे जिन्हें आपकी मदद की जरूरत है।  कारखाने में काम करने वाला हीरा बीमारी के कारण दो महीने तक काम पर नहीं जा सका जिसके कारण न उसे वेतन मिला न ही बोनस उसके मालिक में इतनी संवेदना नहीं थी जो वे इस ओर ध्यान देते दीवाली के त्यौहार पर उन्हें कई बड़े लोगों को लाखों रुपयों के गिफ्ट देने थे उसका खर्च निकालने के लिअः उन्होंने इस बार श्रमिकों के बोनस में भी कटौती कर दी कितनों की तनखा काट दी थी । या रोक दी थी। आर्थिक संकट से पीड़ित हीरा की पत्नी त्यौहार के एक दिन पहले गोयल जी के घर आई और उनकी पत्नी सुरेखा से बोली दीदी पन्द्रह हज़ार रुपये की जरूरत है । आप मेरे ये सोने के कान के टॉपस गिरवी रख लो और पैसे दे दो तो आपकी बड़ी कृपा हो जाएगी और हमारा त्यौहार मन जाएगा। यह बात गोयल साहब...

व्यंग्य: समझदारी या मूर्खता

सामान्य ध्यमवर्गीय परिवार में नौकरी को प्राथमिकता दी जाती है । उस परिवार में अगर कोई युवक पढ़ लिखकर सरकारी नौकरी हासिल करने में सफल हो जाए तो उसे उसकी बहुत बड़ी उपलब्धि माना जाता है उसके पिता का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है । विवाह योग्य कन्याओं के पिताओं का आना उनके यहाँ शुरू हो जाता है लाखों रुपये दहेज के ऑफर मिलते हैं। धूमधाम से शादी होती है लडके के हर नाज नखरे ससुराल वालों द्वारा उठाए जाते हैं ऐसे में अगर लड़के को रिश्वत की कमाई हो रही हो तो उसे अच्छा मान लिया जाता है उसका रुतबा ऐसे लोगों के बीच बढ़ जाता है। इस तरह के परिवारों में अगर कोई लड़का मेधावी हो अच्छे अंकों से उच्च शिक्षित हो और वो नौकरी नहीं करना चाहे तो उसके परिजनों को यह नागवार लगता है।  रोहित ने हमेशा कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। उसने बि ई में यूनिवर्सिटी में टॉप किया था। नौकरी करने की उसकी इच्छा नहीं थी इससे उसके पिता दुखी रहा करते थे। एक बार एक सरकारी विभाग में क्लर्क की नौकरी निकली तो उसके पिता ने जोर देकर उसका आवेदन जमा करा दिया चयन मैरिट बेस पर होना था। उसका स्कोर अच्छा था । इसलिए उसका चयन ह...

व्यंग्य: किसी की मौत पर ख़ुशी मनाने वाले संवेदना विहीन लोग

वैसे तो किसी के यहाँ अगर किसी की मौत हो जाए तो उनके दुखों को देखकर पत्थर दिल वाला भी पिघल जाता है दुश्मन भी अपनी दुश्मनी भुलाकर संवेदना प्रगट करने लगता है पर ऐसे लोगों को क्या कहोगे जो किसी की मौत से मन ही मन खुश होते हैं और ऊपर से घड़ियाली आँसू बहाते हैं ऐसे लोगों में अगर खास अपने रिश्तेदार भी शामिल हों तो आप उन्हें क्या कहोगे । आपको शायद विश्वास न हो पर ये सच है । अगर आप मालूम करोगे तो ऐसे उदाहरण आपके आस पास ही बहुत सारे मिल जाएँगे। कुछ ऐसे उदाहरण है जिनका यहाँ उल्लेख करना उचित होगा। दो सगे भाई हैं। एक भाई को तीन लड़कियों के बाद पुत्र की प्राप्ति हुई उसकी उसे खुशी तो हुई पर जब कुछ दिन बाद उसके सगे भाई के यहाँ दूसरे पुत्र का जन्म हुआ तो उसकी दुगुनी खुशी ने इसको दुख में डुबा दिया । लेकिन जब कुछ दिनों बाद उसके दूसरे पुत्र की अकस्मात मौत हो गई तो इसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा अपने बेटे की मौत से दुखी माँ को जब किसी ने बताया कि तुम्हारा सगा देवर यह कह रहा था कि अच्छा हुआ इसका बेटा मर गया। इसे अपने दो बेटों के होने पर बड़ा गर्व था इसका वो गर्व चूर चूर हो गया। यह सुनकर मृत बेटे की म...

व्यंग्य: क्या वाकई शराफ़त का ज़माना नहीं है

कई लोग अक्सर यह कहते नजर आते हैं कि आजकल शराफत का ज़माना नहीं है वे गुजरे हुए जमाने की बातें हैं जब लोग सब भले थे नेकदिल थे एक दूसरे के सुख दुख में काम आते थे आज का जमाना तो मतलबियों का है बिना मतलब के कोई किसी से वास्ता नहीं रखता लोग रिश्तों का भी लिहाज नहीं रखते सब एक दूसरे के हकों पर डाका डाल रहे हैं। विश्वास डगमगा गया है सब एक दूसरे को संदेह की नजरों से देख रहे हैं बुरे लोगों का महिमा मंडन हो रहा है उन्हें खूब सम्मान मिल रहा है। जो भले हैं उन्हें दबाया जा रहा है कुचला जा रहा है उनके साथ सरासर अन्याय हो रहा है उनकी कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही लेकिन जब इस पर गंभीरता से विचार करें तो बात इतनी बिगड़ी नहीं है जितनी प्रचारित की जा रही जैसे कोरोना काल में एक ओर जहाँ कुछ लोग लोगों की मजबूरी का फायदा उठाते रहे थे कुछ ने चार पाँच गुना तक मुनाफा कमाया। दूसरी ओर अनेक भले लोग ऐसे भी थे जिन्होंने भूखों को निशुल्क भोजन कराया उन्हें कपड़े तथा दवाइयाँ दी और उनकी हर संभव मदद की आज भी बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो सच्चे मन से समाज सेवा कर रहे हैं निशुल्क भोजन करा रहे हैं गरीबों को कपड़े बाँट रह...

व्यंग्य: पेन्शन के भरोसे

सामान्य मध्यम वर्गीय ऐसे बहुत से परिवार हैं जिनके परिवार की गुजर बसर सेवानिवृत्त दादाजी की पेंशन पर चल रही है। ऐसे रिटायर्ड कर्मचारियों के पास फंड भी नहीं बचा है जो पेंशन मिल रही है उससे बहू बेटों तथा पोते पोतियों का खर्च भी उठा रहे हैं और विवाहित बेटी की भी आर्थिक रंप से मदद कर रहे हैं । ऐसे बुजुर्ग इस बात से भी दुखी हैं कि जब वो इस दुनिया से चले जाएँगे और उनकी पेंशन मिलना बंद हो जाएगी तब इन बच्चों का क्या होगा इनकी गुजर बसर कैसे होगी बच्चे अपनी जिम्मेदारी समझ ही नहीं रहे हैं इस बात का भी उन्हें टुख है। रामलाल जी चार साल पहले सेवानिवृत्त हुए थे तब उन्हें पैंतालीस लाख रूपये फंड के मिले थे उन पैसों से उन्होंने बेटी की शादी की मकान में तीन कमरे और बनवाए बड़े लड़के की दुकान खुलवाई छोटे लड़के ने दस लाख रुपये किसी दलाल को दे दिए जिसने उसकी सरकारी नौकरी लगवाने का आश्वासन दिया था वो उसके पैसे लेकर भाग गया छोटे लड़के की सरकारी नौकरी नहीं लग सकी उसको उन्होंने एम बी ए कराया था वो बारह हजार रुपये महीने पर प्राइवेट में नौकरी कर रहा था जहाँ कार्यरत एक लड़की से उसने शादी कर ली रामलाल ज...

व्यंग्य: अपनों के साथ धोखाधड़ी और ठगी

समाज में उन लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। जो अपनों के साथ धोखा धड़ी और ठगी करने में बिल्कुल संकोच नहीं करते ऐसे लोग विश्वास घाती होते हैं जुबान के बहुत मीठे होते हैं ओर बडी सफाई से धोखा दे देते हैं । अपना समझकर जब लोग इन पर भरोसा करते हैं। तो यह उसका लाभ उठाकर अपना मतलब हल कर लेते हैं।      रामकिशोर जी को अपने नव निर्मित मकान में बिजली की फिटिंग करानी थी ये बात उनके सगे साले संतोष को पता चली तो उसने रामकिशोर जी से कहा मेरी पहचान का एक दुकानदार है उससे बाजार से कम दाम में सामान दिलवा दूँगा रामकिशोर जी ने उस पर विश्वास कर उसकी बात मान ली । जो सामान संतोष ने जिस भाव में दिलवाया वो उन्होंने खरीद लिया । और उनका भुगतान कर दिया। जीजाजी को सामान दिलवाने के बाद संतोष दुकान पर पहुँच गया और अपना कमीशन माँगा दुकानदार ने उसके मजे लेने के लिए कहा कि अरे भाई वो अपने जीजाजी हैं यही सोचकर मैंने उन्हें भाव से सामान दिया। पर संतोष अड़ गया बोला मुझे इससे कोई मतलब नहीं मेरा कमीशन दो । तब दुकानदार बोला मुझे मालूम है तुम्हारी फितरत इसलिए मैंने पहले ही तुम्हारा कमीशन निकाल लिया ...

व्यंग्य : प्रतिभाओं का गला घोंटने वाले प्रतिभाहीन

कुछ चालाक चतुर चपल शातिर टाइप के तिकड़म बाज लोग जिनमें प्रतिभा तो होती नहीं है फिर भी अपने इन दुर्गुणों के कारण प्रतिभाशाली लोगों के हकों पर डाका डालने में सफल हो जाते हैं और उनके स्थान को हथियाकार मान प्रतिष्ठा हासिल करने में भी सफल हो जाते हैं ळुई बार तो ये बड़े सम्मान और पुरुस्कार भी हथिया लेते हैं। ऐसे ही एक जुगाड़ू दरबारीलाल हैं जो हिन्दी में एम ए प्रथम श्रेणी में जुगाड़ से करने के बाद जुगाड़ से ही पी एच डी करके तिकड़म भिड़ा के पहले तो प्रोफेसर बने फिर युनी वर्सिटी में हिन्दी के विभागाध्यक्ष हैं। लगभग साहित्य के सारे सम्मान हासिल कर चुके हैं शहर की सारी साहित्यिक संस्थाओं पर उनका दब दबा है। ज्यादा पढ़ना लिखना उन्हें नहीं आता । एक नकल कराकर पैसे लेकर डिग्री दिलाने वाले व्यक्ति के माध्यम से उन्हों ने प्रथम श्रेणी में एम ए की उपाधि हथिया ली थी । इसके बाद किसी की थीसिस चुराकर पी एच डी प्राप्त कर ली इसके बाद प्रभाव तथा तिकड़म लगाकर प्रोफेसर बने और अब विश्व विद्यालय में हिन्दी के विभागाध्यक्ष के पद को कलंकित कर रहे हैं। वे जाने कितने फर्जियों को पी एच डी की उपाध...

व्यंग्य: बिना मतलम के बुरा चाहने वाले

अक्सर हम जिनके बीच रहते हैं । जिन्हें हम अपना समझकर हर बात बताते हैं उनमें से कुछ ऐसे भी होते हैं जो मन में ईर्ष्या पालकर बैठे रहते हैं यह लोग ऊपर से तो शुभचिंतक होने का दिखावा करते हैं पर भीतर भीतर हमारा बुरा चाहते हैं। और अगर संयोग से हमारा बुरा हो जाए तो यह झूठी सहानुभूति दिखलाते हुए हमारी परेशानियों को देखकर मन ही मन आनंदित होते हैं। अशोक जी नगर के प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं। आर्थिक रूप से संपन्न भी हैं। वे गरीबी से उठकर अमीर बने हैं। उनसे सबसे अधिक जलने वाला नरेश उनका बचपन का दोस्त है जो अभी भी गरीब है । अशोक जी के दो लाख रुपये हजम कर के बैठा है। वो इस बात से सबसे ज्यादा दुखी रहता है कि अशोक जी इतने धनवान क्यों हैं । अशोक जी को उसको ईर्ष्या की आग में जलता हुआ देखकर अच्छा लगता है। अशोक जी की प्रतिष्ठा उसकी जलन का सबसे बड़ा कारण है। वो यह जानता है कि वो अशोक जी की बराबरी ज़िदगी में कभी नहीं कर पाएगा इसलिए वो उनसे हर समय जलन रखता है उन्हें दिन रात कोसता है बिना मतलब के बददुआएँ देता है जब उसकी बददुआओं का अशोक जी पर कुछ असर नहीं होता तो दुखी हो जाता है।। एक कहावत है हाथी अपनी चाल से अ...

पढ़े लिखों की कमाई (व्यंग्य)

आज के इस दौर में जब शिक्षित बेरोजगारों की अच्छी संख्या है। तब जो पढ़े लिखे उच्च शिक्षित युवा हैं वे बहुत कम वेतन में प्राइवेट में नौकरी करने को विवश हैं। उनसे ज्यादा रुपया तो कम पढ़े लिखे लोग छोटा मोटा काम कर के कमा रहे हैं। शर्मा जी का ऐ सी खराब हो गया था जो मेकेनिक उसे सुधारने आया वो ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं था। एक घंटे में उसने ऐ सी सुधार दिया। कुछ सामान भी अपनी तरफ से लगाया जिसका चार हजार रुपये उसे मिला। तभी शर्मा जी का लड़का रोहित आया उसने एम बी ए किया था और बारह हजार रुपये महीने के वेतन पर नौकरी कर रहा था। उसकी तनख्वाह जानकर मैकेनिक को बड़ी हैरत हुई। क्योंकि दो हजार रुपये तो उसने शर्मा जी का ऐ सी सुधारने में कमा लिए थे। सामान तो दो हजार का ही लगा था। पूरे दिन में उसने आठ हजार रुपये कमाए थे। शर्मा जी का लड़का एम बी ए करने के बाद जितने रुपये महीने भर में कमा रहा था उतना पैसा तो वो मैकेनिक मात्र डेढ़ दिन में ही कमा लेता था। यही हाल प्रताप चंद के लड़के का था। उसने सिविल इंजीनियरिंग में बी ई की थी तथा सोलह हजार रुपये के मासिक वेतन में एक बिल्डर के यहाँ साईट इंजीनियर था। प्र...

व्यंग्य: बुझे हुए दीपक

दीपक में जब तक तेल बाती रहती है और वो जलता है तब सबका उसी पर ध्यान रहता है जलता हुआ दीपक रोशनी देता है जो अंधेरी रात में बेहद जरूरी होती है जलते हुए दीपक को हवा से आँधी से तूफान से बचाया जाता है रात बीतने के बाद तथा तेल बाती जलने के बाद जब वो दीपक बुझ जाता है तब किसी को उसकी कोई परवाह नहीं रहती।   बुझे हुए दीपक की तरह समाज में ऐसे लोगों की अच्छी खासी संख्या है जो अपने सुनहरे दिनों में महतवपूर्ण पदों पर विराजमान थे तब उनकी बड़ी पूछ परख थी कितने ही लोगों को उनसे काम पड़ता था और वे अहम में चूर होकर किसी से सीधे मुँह बात तक नहीं करते थे । आज जब वे पद पर नहीं है तो उनका रुतबा भी खत्म हो गया है। ऐसे लोगों का अहं खत्म नहीं होता जिसके कारण वे किसी से संपर्क नहीं रखते किसी को इस लायक नहीं समझते कि वो उनका दोस्त बन सके ये लोग अपने सुनहरे अतीत मैं खोए रहते हैं और एकाकी जिंदगी जीते हैं मगर अकड़ कम नहीं होती ये अभी भी अपने को वी आई पी समझते हैं और बाकी सभी को हेय नजरों से देखते हैं । इनके जीवन का अंतिम भाग बढ़ा दुखद होता है। बुझे चिराग में तो फिर तेल बाती रखकर जलाया जा सकता है ढला हुआ...

व्यंग्य: अंतहीन पाने की होड़

कुछ लोग ऐसे होते हैं कि थोड़े में ही संतुष्ट हो जाते हैं अधिक की कामना नहीं करते न ही इसके लिए प्रयास  करते हैं। इसके विपरीत अनेक लोग ऐसे भी मिल जाएँगे  जो  पाने  की अंतहीन  होड़ में अपनी सारी जिंदगी  गुजार देते हैं। जीवन जीने का सारा आनंद  भूलकर पाने में ही लगे रहते हैं इनमें से  कई ऐसे भी होते  हैं जो इकठ्ठा तो बहुत कुछ कर  लेते हैं। मगर उसमें से  किसी को  कभी बाँटते कुछ भी नहीं हैं। शहर के  चर्चित चेहरे  किशोर सिंह ऐसे ही थे उनके पास सब कुछ असीमित था एक बार उनके घर पर जाना हुआ तो देखा कि उनका घर बहुत बड़ा था  सम्मान मान पत्र स्मृति चिन्हों का ढेर लगा हुआ था   पाँच बड़े बक्से इनसे भरे पड़े  थे हजारों तो  शाल थीं उनके पास इसके बाद भी सम्मान हासिल करने की उनकी भूख मिटी नहीं थी चाहे उसके लिए उन्हें कितनी ही पापड़ कंयों न बेलने पड़ें। । कुछ कंजूस  टाइप के लोग  करोड़ों रुपये के स्वामी होने के बाद भी गरीबों से भो बदतर  जिंदगी जीते हैं।  किशनलाल वो किसान था जिसके बैंक में पूरे प...

व्यंग्य: दूसरों की गिरहबान में झाँकने वाले

उन लोगों का क्या करोगे जो अपने लाखों ऐबों को छिपाकर दूसरों की गिरेहबान में झाँकते हैं। अपने बड़े से बड़े ऐब की भनक नहीं लगने देते और दूसरों की छोटी से छोटी बुराई को बढ़ चढ़कर बताते हैं। यह लोग बातें बनाने में बड़े होशियार होते हैं । यह अपनी जुबान के कमाल से भले से भले आदमी को सबसे बुरा साबित कर सकते हैं यह झूठ भी इस तरह से बोलते हैं कि सुनने वाले को वो एकदम सच लगता है। रामनरेश जी की अपनी कॉलोनी में रहने वाले राकेश जी से कोई खास जान पहचान नहीं थी एक बार जब रामनरेश जी को उनसे काम पड़ा तो राकेश जी ने सहर्ष उनके कार्य को पूरा कराने में सहयोग दिया तबसे उनमें थोडी अच्छी जान पहचान हो गई एक दूसरे के हालचाल पूछने लगे । यह सब दिनेश जी से सहन नहीं हुआ वे रामनरेश जी से पता नहीं किस बात से खुन्नस खाए हुए बैठे थे। उन्होंने राकेश जी से मिलकर रामनरेश जी की बुराईयाँ करना शुरू कर दीं उसमें ज्यादातर झूठी थी पर दिनेश जी के कहने के लहजे से वे सच्ची लगती थी। जब तक दिनेश जी ने उनका पीछा नहीं छोड़ा तब तक उनको रामनरेश जी से नफरत नहीं हो गई। नतीजतन राकेश जी ने रामनरेश जी से बोलचाल बंद कर दी। रामनरेश सम...

व्यंग्य: दोस्ती या दुश्मनी

आपके आसपास ऐसे लोग भी मिल जाएँगे जिनके आपस के बर्ताव को देखकर आप यह अंदाज नहीं लगा पाएँगे कि ये दोस्त हैं या दुश्मन दूसरों के सामने एक दूसरे की जमकर बुराई करेंगे। और जब आपस में मिलेंगे तो खूब गलबहियाँ से अपनापन दिखलाएँगे यह लोग कभी आपस मे सबके सामने जोरदार लड़ाई करके भ्रम में डाल देते हैं ।लोग यही समझते हैं ।कि इनमें दुश्मनी ठन गई है अब यह आपस में कभी दोस्त नहीं बन सकेंगे। ऐसे लोगों का भ्रम जल्दी ही टूट जाता है जब वो उनको आपस में प्रेम से बातें करते हुए देखते हैं। इनका जो बोच बचाव करता है वो मूर्ख सिद्ध होता है कुछ समझदार और अनुभवी लोग उनकी लड़ाई के बीच में नहीं पड़ते वे अच्छी तरह जानते हैं कि यह लड़ाई ज्यादा देर तक नहीं चलने वाली थोड़ी देर बाद यह साथ बैठकर चाय पीते हुए नजर आएँगे। यह दोनों अच्छी तरह जानते हैं कि वे एक दूसरे की खूब बुराई करते हैं फिर भी उनकी दोस्ती नहीं टूटती । इनकी दोस्ती की जड़ें इतनी गहरी होती हैं कि कोई हिला भी नहीं सकता। ऐसे ही शहर में दिनेश और सुरेश की दोस्ती थी वे कभी कभी एक दूसरे की खूब बुराई करते थे कुछ दिनों तक उनका बोलचाल भी बंद रहता था । फिर ...

व्यंग्य: मतलब परस्ती

समाज में मतलब परस्त लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है इनमें नैतिकता नाम मात्र की भी नहीं होती ये सिर्फ अपना मतलब देखते हैं। अगर इनका मतलब निकलता हो तो ये किसी भी हद तक गिर जाते हैं लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करते हैं कितनों की ही जान माल खतरे में डाल देते हैं यह इतने गिर जाते हैं कि देश के साथ गद्दारी करने में भी इन्हें कोई हिचक नहीं होती। नैतिकता विहीन मतलबी लोग जहाँ भी होते हैं वहीं गड़बड़ी करते हैं। एक स्थान पर वाहनों की चेकिंग हो रही थी जगह ऐसी चुनी गई थी जहाँ कोई सी सी टी वी कैमरा नहीं था जिसके माध्यम से रिश्वत ली जा रही थी वो एक साधारण आदमी था रिश्वत लेने के बाद वाहन केसा भी हो उसे छोड़ा जा रहा था चाहे वो आगे चलकर दुर्घटनाग्रस्त ही क्यों न हो जाए। चंद रुपयों के फेर में कितनी ही जाने चली जाएँ उस से इन्हें कोई मतलब नहीं। इस तरह मिली भगत से अमानक खाद्य पदार्थों की बिक्री हो रही है नकली मावा नकली दूध बिक रहा है। जानलेवा रसायनों का खाद्य सामग्री में उपयोग किया जा रहा है। जिससे आम आदमी की जान पर खतरा बना हुआ है। हाल ही में एक समाचार ने विचलित कर दिया कफ सिरप में ऐसा पदार्...

व्यंग्य: नहीं जला बुराई का रावण

जैसे ही रावण के पुतले में आग लगी तो दशहरा मैदान में जमा हजारों लोग खुशी से तालियाँ बजाने लगे सब ऐसे खुश हो रहे थे जैसे रावण के साथ सारी बुराइयाँ भी जलकर भस्म हो गई हैं ।पर ऐसा हुआ नहीं बुराईयाँ वैसी की वैसी थीं बुरे लोगों ने भी बुराईयों को छोड़ा नही था। रिश्वतखोरी वैसे ही जारी थी मुनाफाखोरी चरम पर थी धोखा बाजी हो रही थी विश्वासघातियों की संख्या में कमी नही आई थी । फटेहाल आम आदमी से कार वाला सूटेड बूटेड आदमी यह कहकर रिश्वत ले रहा था कि सूखी तनख्वाह से क्या होता है अगर वो रिश्वत नहीं लेगा तो उसके बीवी बच्चे भूखे मर जाएँगे। अवसरवादी लोग भी कम नहीं हुए। लूट डकैती चोरी ठगी खूब हो रही थी अपराधियों को संरक्षण देने वालों की भी कमी नहीं थी महिलाओं पर?अत्याचारों मे कमी नहीं आई थी रावण के सिर्फ पुतले का दहन हुआ था रावण करोड़ों रूपों में आज भी जिंदा था और खुलकर अपनी मनमानी कर रहा था रावण की आसुरी सेना का भी नाश नहीं हौआ था पूरी सेना आम लोगों के बीच में जाकर उन पर अत्याचार कर रही थी। लोग बेबस होकर असुरों के बढ़ते हुए प्रभाव को देख रहे थे बुराई के रावण ने अधिकाँश लोगों को जकड रखा था। यह सब ...

व्यंग्य: रावण ही रावण

त्रेता युग में रावण एक ही था और उसने माता जानकी का हरण कर उनको अशोक वाटिका में रखा था उसके इस अपराध का दंड उसे यह मिला कि उसका कुल सहित नाश हो गया उसके वध को बुराई पर अच्छाई की जीत का दिन कहा जाता है। आज तक दशहरे पर रावण के पुतले का दहन अनेक स्थानों पर किया जाता है।  आज के इस दौर में रावणों की संख्या बहुत बढ़ गई है हर तरफ रावण ही रावण नजर आ रहे हैं कलियुग के रावणों के पापों की तो कोई गिनती नहीं है त्रेता युग के रावण के पाप तो सामने थे पर कलियुग के इन रावणों के पाप छिपे हुए रहते हैं अगर इनके पाप सारे उजागर हो जाएँ तो लोग हैरत में पढ़ जाए ये घोर से घोर पाप करने के बाद भी महान कहे जा रहे हैं इन्हें दंड देने वाले भी बेबस हो जाते हैं क्योंकि ये कोई सबूत ही नहीं छोड़ते और बरी होकर आ जाते हैं तथा फिर से बुरे काम करने लगते हैं कुछ तो ऐसे हैं जो कभी पुलिस के घेरे में नहीं आए। ऐसे लोग सफादपोश बनकर रह रहे हैं। रावण की आत्मा यह सब देखकर कितना दुखी होती होगी कि उससे कई गुना बुरे काम करने वाले उसके पुतले को जलता हुआ देखने आए हैं। और पुतला दहन के बाद बड़े खुश हो रहें हैं । ये लोग खुद क...