अक्सर ऐसा होता है । कि हम जिसके साथ रहते हैं उसके महत्व का हम आँकलन नहीं कर पाते हमे उससे उकताहट होने लगती है फिर हमारे उससे संबंध खराब होने लगते हैं। अगर वो हमारा आश्रित तो हम उसे बोझ समझने लगते हैं। कुछ तो यह तक कह देते हैं कि हराम की खा रहा है । जब खुद कमाकर खाएगा तब पता चलेगा कि कितनी मुश्किल से पैसा कमाया जाता है। डससे संबंध अधिक कटु हो जाते हैं तो इनका अंत तभी होता है जब कोई छोड़कर चला जाता है। उसके जाने के बाद उसकी अहमियत का पता चलता है। तब उसकी कमी खूब खलती है लेकिन फिर वो हमारी पहुँच से बहुत दूर हो जाता है। रश्मि ने जब बी एस सी कर ली तो बी एड करने के लिए वो अपने भाई भाभी के पास बड़े शहर में आ गई। भैया भाभी और उनका एक वर्ष का बैटा था रिंकं भाई का थ्री बी एच के फ्लेट था। एक कमरा उसे रहने के लिए दे दिया गया। रश्मि पढ़ाई के अलावा घर के कामों में भी सहयोग करती थी उसकी पढ़ाई का सारा खर्च उसके पापा उठा रहे थे भाई के यहाँ तो वो भोजन करती थी और रहती थी। बाजार से सामान भी खरीद कर वो लाती थी रिंकू की देखभाल भी करती थी। कभी कभी रसोई में भी हाथ बँटाती थी । फिर भी रश्मि की भाभी को ...