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सितंबर, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

व्यंग्य: नौकरी के माया जाल में फँसे

जो बड़े लोग खुशामद पसंद होते हैं उनमेंसे आधिकाँश अहंकारी होते हैं खुशामदी लोग इनकी खुशामद करके खुश कर लेते हैं खुश करने के बाद वे इनकी कृपा पाकर जो पद हथिया लेते हैं उससे दूसरो पर रौब गाँठकर बड़े खुश होते हैं ये खुशामदी लोग कई बार योग्य लोगों के हक पर भी डाका डाल देते हैं।  प्रायः स्वाभिमानी लोग खुशामद नहीं करते न ही खुशाभद कराना पसंद करत हैं ऐसे लोग हर हाल में जीना सीख जाते हैं उन को ये खुशामदी लोग अपने से कम करके आँकते हैं।जितना बड़ासाहब होगा उसके खुशामदी उतते ही ज्यादा होंगे ये साहब की खुशामद तो करेंगी साहब के कुत्ते तक ची खुशामद करने में इन्हें कोई परहेज नहीं रहता । ऐसे ही एक खुशामदी टाइप के व्यक्ति थे चतर सिंह वे शिक्षा विभाग में नौकरी करते थे विभाग के जिलाधिकारी खुशामद पसंद थे उनकी खूब खुशामद कर के चतर सिंह ने योग प्रशिक्षण में अपना नाम का आदेश निकलवा कर पहले प्रशिक्षण प्राप्त किया उसमें भी उनकी खुशामद करने की कला काम आई वे सफलता पूर्वक प्रशिक्षण प्राप्त करके आ गए अब साहब की कृपा से इन्होंने जिला योग प्रशिक्षक का पद हथिया लिया और अपनी पोस्टिंग जिला कार्यालय में करा ली...

व्यंग्य: विश्वासघातियों से कैसे बचें

विश्वास दिला कर विष देने वालों की संसार में कमी नहीं है ऐसे में मन में सहज ही ये प्रश्न उठता है कि विश्वासघातियों से कैसे बचें क्योंकि विश्वासघाती तो खास अपना भी हो सकता है सीधा सादा सा दिखने वाला इंसान भी हो सकता है। कहने वाले कहते हैं कि अगर कोई बात राज रखना है तो वो किसी से भी मत कहो चाहे कोई कितना ही खास अपना क्यों न हो कोई कितनी ही कसम खाले फिर भी राज की बात नहीं कहना चाहिए अगर राज की बात किसी एक से भी कह दी तो फिर वो छिपी नहीं रहेगी ऐसा अनुभवी कहते हैं। जिन पर हम विश्वास करते हैं। वो हमारी सबसे बड़ी कमजोरी भी बन सकता है। और अक्सर बनता ही है। हमारे दुश्मन ऐसे लोगों को साधने में कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ते। उससे हमारी सारी बातें जान लेते हैं और फिर हमे वो चोट पहुँचाते हैं जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते कब हमारा अपना ही हमें खाई में धकेल दे इसका हम अंदाजा भी नहीं लगा सकते। आज के इस दौर में जब मतलब के लिए लोग किसी भी हद तक गिरने को तैयार रहते हैं वे विश्वास को कायम नहीं रख सकते। ये एक सामान्य बात है जो आप किसी से कह सकते हो कि आपके विश्वास को अपनों ने ही तोड़ा है आपने ज...

व्यंग्य: काम के बोझ के तनाव में खोई ख़ुशी

आज के दौर में आम हो या खास सब काम के बोझ तले दबे हुए हैं यह काम उनका मानसिक तनाव भी बढ़ा रहा है। घर सर्व सुविधा युक्त तो बना लिए पर उसमें ठीक से रहने की ही फुर्सत नहीं है। दूसरों के देखा देखी कर्ज लेकर सारे सुख के साधन जुटा लिए हैं अब उनकी ई एम आई में ही वेतन का अधिकांश हिस्सा खर्च हो रहा है । इस डर से नौकरी भी नहीं छोड़ पा रहे कि अगर दूसरी नौकरी जल्दी नहीं मिली तो ई एम आई कैसे भरेंगे । इसिलिए लोगों की खुशी खो गई सुख साधन तो खूब हैं पर खुशी लापता है।। परिवार छोटे होने के बाद भी खुशी नहीं है। पिच्यासी साल के बंशीलाल जी पार्क की बैंच पर अकेले बैठे हुए थे तभी उनके हम उम्र राधेलाल आ गए तो दोनों घुलमिलकर बातें करने लगे। कह रहे थे कि अब तो यह हाल हो गया है कि पड़ोसी ही पड़ोसी को नहीं जानता। फिर वे अपने जमाने की बात करने लगे बंशीलाल बोले गाँव में हमारा मिट्टी का खपरैल वाला मकान था दरवाजा इतना छोटा था कि बिना झुके घर में प्रवेश नहीं कर सकते थे। बिजली थी नहीं । पानी कुएँ से लाते थे माँ हाथ की चक्की चलाकर सुब्ह चार बजे एक पसेरी अनाज पीसकर आटा तैयार करती थी फिर दही को मथानी से मथकर...

व्यंग्य : बार बार की असफलता के बाद मिली सफलता का सुख

कोई व्यक्ति अन थक प्रयत्न कर ने के बाद भी अस फल रहे और ऐसा बार बार हो। इसके बाद अगर उसे सफलता मिल जाए तो इस से जो सुख मिलता है उसका वर्णन तो वो भी नहीं कर सकता। अक्सर ऐसा होता है कि एक दो बार की असफलता के बाद बहुत से लोग प्रयत्न करना छोड़ देते हैं यह असफल लोग दूसरों का मनोबल तोड़ने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। इन्हें खुद तो सफलता मिली नहीं तो सोचते हैं कि ऐसी सफलता किसी और को कैसे मिलेगी। जब इनसे कोई इस संबंध में बात करता है तो यह नकारात्मक बात करते हैं फिर अपने अनुभव बताने लगते हैं कि उन्होंने कितने पापड़ बेले जमीन आसमान एक कर दिया इसके बाद भी सफलता नहीं मिली तो तुम्हें कैसे मिल सकती है उनकी बात सुनकर कमजोर मनोबल वाले व्यक्ति अपना इरादा ही त्याग देता है लेकिन जिसका मनोबल मजबूत होता है वो ऐसे लोगों की बात सुनकर विचलित नहीं होता ना ही अपने मनोबल को गिरने देता। उसके इरादे नहीं बदलते ऐसा व्यक्ति जब प्रयास करना शुरू करता है तब यह उसकी बहुत खिल्ली उड़ाते हैं उसकी बुराई करते हैं उसे मूर्ख सिद्ध करने में कोई कसर नहीं रखते। और जब असफल हो जाता है तो ये मन ही मन बहुत खुश होते हैं उसकी हर बार ...

व्यंग्य: प्रेम से बुलाकर अपमानित करने वाले

कुछ कुटिल प्रवृत्ति के लोग यदि किसी से खुन्नस खाए हुए हों तो वे उसके अपमान का एक भी अवसर नहीं खोते। इनकी सारी कोशिशें उसे अपमानित करने के लिए होती हैं ये लोग खुलकर दुश्मनी नहीं करते बल्कि आपके हितैषी होने का दिखावा करते। हैं ये लोग इतना मीठा बोलते हैं कि सुनने वाला मोहित होकर इनके बिछाए जाल में फँस जाता है। जब वो जाल में फँस जाता है तो ये उसे तड़फता देखकर मन ही मन खुश होते हैं। ये दोहन करने में तो माहिर होते हैं पर दाना पानी कभी नहीं देते। दोहन करने के बाद ये दंड से प्रहार कर भगाने में जरा भी देर नहीं करते। ऐसे लोग जब किसी से अत्यंत मीठे लहजे में बात कर रहे हैं तो समझ लेना कि उससे इनका कोई बहुत बड़ा मतलब हल होने वाला है । जिससे इनका काम नहीं होता उसकी तरफ देखना भी पसंद नहीं करते न ही उसके अभिवादन का कोई उत्तर देते। ऐसे ही शहर में एक व्यक्ति थे फतेह सिंह वो बहुत घटिया इंसान थे । लेकिन बड़े जुगाड़ू और चलते पुर्जे टाइप के थे। एक बार उनकी एक कार्यक्रम में खूब किरकिरी हुई। उन्हें उनके एक परिचित धनलाल पर शक हो गया वो यह समझ कि धनलाल की वज्ह से उनकी किरकिरी हुई है। जबकि इसमें धन...

व्यंग्य: चापलूसी से मिली उपलब्धियाँ।

चापलूसी से मिली उपल्बिधियों का जब लोग बड़े गर्व से बखान कर के फूले नहीं समाते । तब खुद्दार टाइप के लोग उन पर अधिक ध्यान नहीं देते पर कुछ चापलूस टाइप के लोग उन्हें बड़ी हसरत से देखते हैं वे उनके जैसा बनकर वे सब उलब्धियाँ हासिल करने के ख्वाब देखने लगते हैं। ऐसे ही एक सेवानिवृत कर्मी अपनी उपलब्धियों का बखान कर रहे थे कुछ गौर से सुन रहे थे कुछ ऊब रहे थे वहीं सुरेश जी उनकी बात सुनकर मन ही मन मुस्का रहे थे क्योंकि उन्हें उनकी असलियत पता थी। किसी ने उन से पूछ लिया आप भी सतीश जी के विभाग में कार्यरत थे आपकी और इनकी नौकरी की शुरूआत एक ही पद से हुई थी फिर ये इतनी तरक्की क्यों कर गए जरा इस विषय में कुछ बताएँगे वे बोले अगर हम बताएँगे तो ये नाराज हो जाएँगे लोगों ने कहा कुछ भी हो आप तो बताइए वे बोले तो सुनो। नौकरी से पहले हम मित्र थे तब हमें मालूम नहीं था कि ये खुदगर्ज टाइप के चापलूस इंसान हैं। हम दोनों की पोस्टिंग फील्ड में हुई थी। हम किसी की चापलूसी नहीं करते थे और अपने काम से मतलब रखते थे। जबकि इन्होंने मुख्य कार्यालय में अपनी चापलूसी से घुसफैठ कर ली थी कहीं जातिवाद कहीं क्षेत्रवाद कही भाषाव...

दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग (व्यंग्य)

कबीर जी ने निंदक को इसलिए हितकारी कहा है क्योंकि वो हमारी बुराइयों को उजागर करते हैं और हम उन्हें दूर करते चले जाते हैं। इस तरह हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है। लेकिन आज के दौर में दुर्भावना रखकर निंदा करने वालों की संख्या ज्यादा हो गई है। ऐसे लोग हमारी बुराईयों को उजागर नहीं करते बल्कि हमारी खूबियों को छिपाकर मन में दुर्भावना रखते हुए हमारी निंदा करते हैं। इन लोगों से दूर रहने में ही भलाई है। अगर इनको साथ रखा तो ये हमारा मनोबल तोड़कर रख देंगे। हमें नकारा साबित करने की कोशिश करेंगे हमारे आत्मविश्वास को डगमगा देंगे। ये दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग अपने विरोधियों को निपटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उसके सारे अवसर या तो खत्म कर देते हैं या छीन लेते हैं। ये लोग हद दर्जे के मतलबी इंसान होते हैं। जिस से मतलब निकालना हो उसकी झूठी तारीफों के पुल बाँधते हैं। उसकी खूब चापलूसी करते हैं उसे महान सिद्ध कर देते हैं और समाज में एक भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं। ये ग्रुप बनाने में माहिर होते हैं। जो इनके गुट में शामिल हो जाता है ये उसके हर ऐब ढँक लेते हैं। उसे स्थापित करने के हर स...

व्यंग्य: उधार लेकर अदा नहीं करने वाले

चार्वाक ने बहुत पहले ही कह दिया था जब तक जियो सुख से जियों कर्ज लेकर घी पियो। उनके अनुसार सुख में कमी नहीं होना चाहिए चाहे इसके लिए कर्ज ही क्यों न लेना।हो इस प्रवृति के लोग कर्ज तो ले लेते हैं पर उसे कभी अदा नहीं करते उनके पास अपना कुछ नहीं होता सब उधारी का होता है। यह लोग उधार लेते समय बड़े विनम्र होते हैं। उधार लेने के बाद कुछ दिनों तक इनमें विनम्रता रहती है फिर ये कठोर होते चले जाते हैं और अंत जब ज्यादा तकरार हो जाती है तो कह देते हैं नहीं देना एक पैसा भी तुमसे जो बने सो कर लो। कॉलोनी के एक दुकानदार प्यारेलाल फ्लेट में किराये से रहने वाले सतीश के यहाँ चार बार आ चुके थे पड़ोसी ने पूछ बात क्या है वे बोले सतीश से चौबीस हजार रुपये उधारी के वसूलना है। वे बोले चौबीस रुपये भी नहीं वसूल पाओगे वो दस दिन से गायब हैं फ्लेट के मालिक का चार महीने का किराया भी हड़प गया है। कल जब पुलिस की मौजूदगी में ताला तुड़वाया। तब पता चला कि घर तो पूरा खाली है मालिक के लगाए पंखे सोफा और बेड तक गायब थे फ्लेट मालिक को पूरे दो लाख की चपत लगाकर सतीश चंपत हुआ है। उसके ऊपर लाखों की उधारी थी इसलिए शहर...

व्यंग्य: अभिनय में माहिर फर्जी लोग

ऐसे लोगों की संख्या में दिनों दिन वृद्धि होती जा रही है जो अपने लाभ के लिए हर तरह का अभिनय कर अगले को प्रभावित कर अपना काम निकाल लेते हैं ।कुछ लोग ऐसे भी हैं ।जो दूसरों की सहानुभूति पाने के लिए रोने भी लगते हैं ।उनके आँसू घड़ियाली होते हैं ।रोते रोते ही यह नार्मल भी हो जाते हैं ।यह लोग व्यक्ति की फितरत देखकर यह तय करते हैं कि उन्हें किस तरह का अभिनय करना है। एक अपनी बेटी के इलाज के लिए रुपये माँग रहा था। अपनी दयनीय दशा बना रखी थी ।लोगों को दया आ गई हाथों हाथ सभी ने अच्छी धनराशि एकत्रित कर उसे सौंप दी वो राशि लेकर चलता बना ।कुछ दिन बाद दूसरी कॉलोनी में भी वो ऐसा ही कर रहा था। कुछ लोगों का जब उसकी असलियत पता लगी । तो। इसकी उसे भी भनक लग गई और वो वहाँ से भाग गया। ऐसे आपने बहुत से उदाहरण देखे होंगे जिसमें भले चंगे लोग दिव्यांग बनकर भीख मागते नजर आते हैं यह भी अभिनय करने में माहिर होते हैं इन्हें दूसरों को प्रभावित करने की कला अच्छी तरह से आती है ये अपनी बातों से सम्मोहित कर देते हैं और लाभ उठाकर चंपत हो जाते हैं। इनसे बचने का कोई ठोस उपाय नहीं है। जाति छिपाकर असल पहचान छिपाकर ...

व्यंग्य: अपने वाले अगर जलने लगें तो

हमने किसी से पूछा अपने वाले ही अगर जलने लगें तो उसने जवाब दिया अपने वाले ही तो जलते हैं। वो बोला कि ये वो अपने अनुभव से कह रहा है और जब अपने वाले जलते हैं तो बहुत मज़ा आता है हमने कहा इसमें कैसा मज़ा? गुस्सा आना चाहिए ।वो बोला गुस्सा नहीं मज़ा आता है। क्योंकि अगर आप को देखकर अपने वाला जल रहा है तो समझ लेना की आप निरंतर प्रगति कर रहे हैं । ऐसे में आप वो सब करते रहें जिससे वो लगातार जलता रहे और आपको आनंद आता रहे उसको इतना भी नहीं जलाना चाहिए कि वो जल भुनकर राख हो जाए बल्कि समय समय पर उस पर ठंडे पानी का छिड़काव करते रहें ताकि वो धीरे धीरे जलता रहे और आपको आनंद प्रदान करता रहे। अक्सर ऐसा होता है जब कोई अपने लक्ष्य को पाने के लिए संघर्ष करता है तब चंद अपने वाले मन ही मन खुश होते हैं वे यह मानकर चलते हैं कि सफल होना इतना आसान थोड़ी है थोड़े दिनों में जब आटे दाल का भाव मालूम पड़ेगा तब सारा भूत उतर जाएगा। फिर वो दूसरों से हमारी निंदा करेगा और हमारे पास आकर झूठी हमदर्दी दिखाएगा। वो हमें दिलासा नहीं देगा बल्कि यह कहेगा कि हम कोशिश करना छोड़ दें क्योंकि उसमें कोई लाभ नहीं है। इ...

व्यंग्य: दिखावे की दुनिया

आज के इस दौर में असल की पहचान मुश्किल होती छा रही है दुनिया दिखावे की हो गई है रिश्तों की मिठास खत्म हो गई है बिन मतलब के कोई किसी से वास्ता नहीं रखना चाहता निकट के संबंधों का भी विश्वास डगमगा गया है। सुंदर दिखने की चाह में ब्यूटी पार्लरों की भरमार हो गई है कई घरों में पति पत्नी के रिश्ते ठीक नहीं है पर लोगों के सामने वे ऐसा जाहिर करते हैं जैसे उनमें आपस मे गहरा लगाव है। भाई भाई से ईर्ष्या एवं द्वेष रख रहा है। दोस्ती का गणित भी गड़बड़ा गया है लोग इतने चालाक हो गए हैं कि कौन दोस्त है और कौन दुश्मन इसका पता ही नहीं चलता लोग झूठ बोलने में माहिर हो गए हैं। झूठ बोलने में उनकी जबान जरा भी नहीं लड़खड़ाती कसम खाकर झूठ बोलना आम हो गया है लोग अपने ऐब बड़ी सफाई से छिपा जाते हैं और अपने उन गुणों का बखान करते हैं जो उनमें हैं ही नहीं ऐसे माहौल में जीने के लिए अधिक संघर्ष करना पड़ रहा है। सतर्कता बरतते हुए संबंध रखना पड़ रहा है । क्या पता जिसे हम अपना दोस्त समझ रहे हैं वो ही हमें खाई में धकेल दे। हाल ही में घटित एक घदना ने मन विटलित कर दिया जिस पत्नी ने प्रेमी से मिलकर अपने पति की जान ले ...

व्यंग्य: वरिषूठता के बदलते हुए मापदण्ड

मतलबी लोगों से भरे हुए इस दौर में नैतिकता ईमानदारी सच्चाई योग्यता को ताक पर रख दिया गया है। इसका स्थान झूठ छल कपट चापलूसी चालाकी चोरी और सीना जोरी ने ली है यह जितने भी अवगुण हैं ये सफलता प्राप्त करने की खूबी बन गए हैं इन्हें पोषण देने वाले उस बिच्छू माँ की तरह है जो जिनको अपनी पीठ पर लादकर चलती है वे उसको ही मार कर खा जाते हैं तभी तो उनका दंश सबसे ज्यादा पीड़ा दायी होता है। जो बिच्छू माँ मारी जाती है उसने भी अपने बचपन में अपनी माँ को खाया था।  शहर के एक वास्तविक वरिष्ठ कवि थे रोशन जी वे सीधे सरल साधारण हैसियत के अच्छे इंसान थे उनकी टेलर की छोटी सी दुकान थी। बहुत अच्छे गीत और ग़ज़ल लिखते थे। पर वो किसी अकादमी के कर्ता धर्ता नहीं थे कोई बड़ा पद उनके पास नहीं था न कोई राजनैतिक बैक ग्राउण्ड था न उन्हें किसी की चापलूसी करना आती थी वे चालीस साल से गीत ग़ज़ल लिख रहे थे । पर मतलबी लोग उन्हें अब भी जुनियर ही मानते थे जबकि वे आम लोगों के चहेते थे। जो उन्हें कोई लाभ तो दे नहीं सकते थे न उनको कभी रेडियो पर बुलवाया गया न दूरदर्शन पर न कवि सम्मेलनों में उनके गीत ग़ज़लों को चुरा चुराकर पढ़न...

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

व्यंग्य: आम आदमी की हालत

देश का सबसे खास आम आदमी सबसे आम है उसकी हालत सबसे अधिक दयनीय है और उसकी गाढ़ी कमाई को लूटने वाले हर तरह के सुख भोग रहें हैं खूब साधन संपन्न है और आम आदमी उन्हे ठगा सा देखता रहता है इसके अलावा वो कुछ नहीं कर पाता। आम आदमी को बड़े अफसर से बहस करने का अघोषित रूप से अधिकार नहीं है। इसके बाद भी अगर वो बहस करता है उसे बचाने वाला कोई नहीं उसका बुरा अंजाम उसे ही भोगना है। आम आदमी रिश्वत जरूर दे सकता है ये अधिकार तो उसे अघोषित रूप से मिला है उसके सारे काम रिश्वत के सहारे ही होते हैं रिश्वत देने के अधिकार के कारण ही वो ठीक से रह पा रहा है और जी रहा है। हमसे एक बहुत बड़े अधिकारी ने कहा था ये देश वी आई पी लोगों के लिए है हम लोग भी दिन रात उन्हीं की सेवा में लगे रहते है देश के नब्बे प्रतिशत संसाधनों सुख सुविधाओं पर उनका कब्जा है वो कुछ भी नहीं करते फिर भी उनका समय बहुत कीमती है उन्हें कहीं घण्टों लाइन में खड़े नही रहना पड़ता है हर जगह उनकी आव भगत होती है।  एक वी आई पी जानबूझ के आम लोगों के पास आ गए और उनसे बातें करने लगे सब कुछ ठीक चल रहा था तभी एक आम आदमी ने भूल से उनसे ऐसी बात कह दी ...

हिन्दी के वास्तविक सेवी (व्यंग्य)

एक दिन हिन्दी दिवस मानकर पूरे साल अंग्रेजी में काम करने वाले अंग्रेजी बोलकर अपना रौब ज़माने वाले तो बहुत है। हिन्दी के नाम से विदेश घूमकर आने वाले भी हैं। पर क्या यह वास्तविक हिन्दी सेवी हैं? सही मायने में हिन्दी सेवी कौन है? इस पर तनिक विचार करें तो बहुत सी बातें हमारे सामने उजागर होंगी। योजनाएँ अंग्रेजी में बनाने वालों को भी हिन्दी की जरूरत पड़ जाती है। आज जो हिन्दी जन जन की भाषा है तो उसमें आम लोगों का ही योगदान है। हिन्दी के नाम लाखों करोड़ रुपये खर्च करने वालों ने हिन्दी के लिए कितना किया और आम लोग जिन्होंने हिन्दी को दुनिया के कोने कोने तक पहुँचाया उन्हें इसके लिए कितना रुपया मिला? जवाब होगा एक धेला तक नहीं। पिक्चर बनाने वाले जो हिन्दी में फिल्में बनाते हैं। वे अंग्रेजी में संवाद करते हैं अंग्रेजी फिल्में देखते हैं। और आम आदमी महँगे टिकिट खरीदकर इनकी जेबें भरता है। सरकार को टैक्स देता है और इन फिल्मों को देखता है। जो मजदूर बन कर विदेश गए वे कोई हिन्दी के प्रोफेसर नहीं थे न ही हिन्दी अधिकारी। वे सिर्फ हिन्दी बोलते थे। उन्होंने विदेश में रहकर विदेशी भाषा न अपनाते हुए हिन्द...

व्यंग्य: बेहयाई की हद पार कर चुके लोग

अपना फायदा देख किसी भी तरह का समझौता कर लेने वाले लोग बेहयाई की हर हद पार करने में ज़रा भी संकोच नहीं करते। इनका काम बनना चाहिए चाहे किसी का कितना ही बड़ा नुक्सान क्यों न हो जाए यह लोगों का इस्तेमाल सीढ़ी की तरह करते हैं और काम निकल जाने पर सीढी को तोड़ मोड़ कर फेंक देते हैं ताकि कोई ओर इस सीढ़ी का इस्तेमाल नहीं कर सके कुछ अगर गुरूघंटाल हैं तो ऐसे लोग उनका भी फायदा उठाने में माहिर होते हैं। रमेश जी विधायक जी के करीब माने जाते थे । इसका फायदा एक चपल चालाक अवसरवादी व्यक्ति राकेश ने उठाया पहले उसने रमेश से दोस्ती की फिर रमेश जी का भरोसा जीता उनका सहारा लेकर वो विधायक जी तक पहुँचा इसके बाद दो महीने में ही उसने अपना कमाल दिखा दिया आजकल वो विधायक जी का खास है । रमेश को विधायक प्रतिनिधि के पद से हटवा दिया गया और वो उस पद पर काबिज हो गया है। रमेश जी ने नाराज होकर संगठन सचिव के पद से इस्तीफा दे दिया राकेश ने उसको मंजूर करा दिया उस पद पर अपने मतलब का आदमी बिठा दिया। अब वो विधायक जी का सहारा लेकर प्रभारी मंत्री जी का करीबी बनने का प्रयास कर रहा है जैसे ही वो इसमें सफल हो जाएगा तो विधाय...

व्यंग्य: रिश्तों पर हावी होता हुआ स्वार्थ

आज के इस दौर में कुछ लोग स्वार्थ में अंधें होकर इतने गिर गए हैं कि सगे रिशते वालों को भी वे अपने जरा से स्वार्थ के कारण बड़े से बड़ा नुक्सान पहौँचाने में भी देरी नही करते वे सिर्फ अपना फायदा देखते हैं । बाकी उन्हें किसी से कोई मतलब नहीं रहता बिना मतलब के वे किसी से बात तक करना पसंद नहीं करते जिससे मतलब हो उसकी खूब खुशामद करते हैं उसके तलवे चाटने में उन्हें परम सुख की प्राप्ति होती है। अशोक जी को विवाह के लिए कपड़े खरीदना था तो वे अपने खास दोस्त की दुकान पर चले गए उसने उनकी खूब आव भगत की ये तक कहा कि आपकी अपनी दुकान है। घर की बात है । आपसे मुनाफा थोड़ी लूँगा लाभ कमाने के लिए दुनिया पड़ी है। अशोक जी अपने मित्र की बात सुनकर गदगद हो गए इस खुशी में उन्होंने ज्यादा ही खरीदारी कर ली। न भाव पूछे न मौलभाव किया उसने कसम खा खा कर सामान बेच दिया और वे पैसे देकर आ गए। दूसरे दिन वे एक परिचित को कपड़े दिखा रहे थे उसकी भी दुकान थी। उसने जब भाव पूछा तो चौंक गया उसने हिसाब जोड़कर बताया कि अशोक जी आपके जिगरी दोस्त ने आपको पूरे बारह हज़ार रुपये की चपत लगाई है ये छत्तीस हजार रुपये के कपड़े चौबीस हजार ...

व्यंग्य : छिपे हुए हत्यारे

जो जाहिर तौर किसी की हत्या करते हैं वे तो कानून की गिरफ्त में आ ही जाते हैं और उन्हें कड़ी से कड़ी सज़ा भी मिल जाती है पर जो छिपे हुए हत्यारे हैं उनको सजा नहीं मिल पाती बल्कि उनका समाज में खूब मान सम्मान भी होता है। ये बात उनकी नहीं है जो किसी की हत्या कर के छिप गए हैं ऐसे मुज़रिम भी पकड़ में आ जाते हैं। यह बात उनकी है जो टोना टोटका करके किसी मरीज को अस्पताल नहीं जाने देते और इलाज के अभाव में वो दम तोड़ देता है फिर भी ऐसे लोगों की प्रतिष्ठा पर कोई आँच नहीं आती। जो सर्पदंश से पीड़ित का टोने टोटके से इलाज करने का दावा करते हैं इस बीच मरीज की मौत हो जाती है तब भी ऐसे लोगों को कोई हत्या का दोषी नहीं ठहराता और ये और भी कई लोगों की असमय मौत का कारण बनते हैं। वे लोग भी बच जाते हैं जो फर्जी डिग्री के दम पर इलाज करके मरीजों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करते हैं और उनकी मौत का कारण बनते हैं। शिवलाल की पत्नी को ब्लीडिंग की प्राब्लम थी। उसने गाँव के फर्जी झोला छाप एम पी को दिखाया। उसकी दवा से आराम नहीं मिला तो एक निजी अस्पताल में ले गया। वहाँ जाँच से पता चला कि उसे बच्चेदानी में कैंसर है। ऑपरेशन में स...

व्यंग्य: चंदन के पेड़ पर लिपटे हुए साँप

ऐसा लोग मानते है कि चंदन के पेड़ की सुगंध और शीतल छाया के कारण उस पर कई विषधर साँप लिपटे होते हैं यह साथ तो रहते हैं लेकिन एक दूसरे के गुण अवगुण को कभी ग्रहण नहीं करते न चंदन की सोहबत से साँप के गुणधर्म बदलते न न साँप की सोहबत से चंदन के। फिर भी ये साथ रह लेते हैं इनकी यह सोहबत इन्हें कई अच्छे भले लोगों की संगति से दूर कर देती है।सामान्यतः लोग ऐसे वृक्ष के पास तक जाना पसंद नहीं करते जिस पर विषधर साँपों का वास हो । हाँलाकि चंदन का पेड़ तो अपनी खुश्बू बिना भेदभाव के सब पर लुटाता है। सभी को शीतल छाया भी प्रदान करता है । लेकिन साँप ऐसा नहीं होता उसके मुँह में विष दंत होते हैं उसकी जकड़ जानलेवा होती है वो किसी जीव को जिंदा ही निगल जाता है जिन्हें निगल नहीं पाता उन्हें डँसकर मार देता है यह साँप हर जगह रेंगकर अपना शिकार ढूँढते हैं और छिपकर डँसते हैं इनमें कुछ तो इतने विषैले होते हैं जिनका डँसा पानी तक नहीं माँग पाता और मर जाता है। लेकिन दुनिया में सबका समाधान हैं कुछ ऐसे भी हैं जो साँप को वश में कर के उसे पिटारी में बंद कर लेते हैं फिर उसे बीन पर नचाकर धन कमाते हैं । चंदन का पेड़ अपन...

व्यंग्य: कलह प्रिय लोगों का साथ नर्क का वास

कहने वाले कहते हैं कि दुनिया में अगर कहीं नर्क है तो वहाँ है जहाँ कलह प्रिय लोग रहते हों जो अहसान फरामोश हो ।जिन्हें सबमें गलतियाँ नजर आती है जो अपनी बड़ी से बड़ी गलती को भी गलती नहीं मानते और दूसरों की छोटी से छोटी गलती को भी हिमालय से बड़ी मानकर उसे कलह का मुद्दा बना लेते हैं। और सामने वाले का जीना हराम कर देते हैं। कलह करने वाला तो अपनी भड़ास निकालकर शाँत हो जाता है पर जिसके साथ कलह करता है उसकी हालत बहुत खराब हो जाती है ये वो यातना है जिसे रोकने वाला कोई नहीं है इन कलह प्रिय लोगों को कोई सजा भी नहीं देता। इनकी सेहत तो कलह करने से अच्छी हो जाती है पर यह बेचारे पीड़ित की सेहत बिगाड़ देते हैं। अगर परिवार में पति अथवा पत्नी में से कोई एक कलह प्रिय हो तो उस घर को नर्क में बदलते देर नहीं लगती और अगर पति पत्नी दोनों ही कलहप्रिय हों तो उनके बच्चे घोर नर्क की यातना भोग रहे होते हैं कलह प्रिय लोगों से पीड़ित की पीड़ा असाध्य होती है जिसे सहन करने के अलावा कोई चारा नहीं रहता।  सुरेश ने इस लिए शादी नहीं की क्योंकि उसकी माँ जबर्दस्त कलह प्रिय तथा झगड़ालू थी उसके पिताजी नितांत शाँति...

चर्चित अचर्चित रचनाकार का असल सत्य व्यंग्य

हर बड़े शहर में ऐसे रनाकार भी मिल जाएँगे जिनकी  हर दो तीन महीने में किताबे छफ रही हैं भव्य विमोचन समारोह आयोजित हो रहा है वक्ता उनकी रचनाओं को कालजयी बतला रहे कुछ खाए पिए अघाए स्वनामधन्य समीक्षक उनकी रचना की नामचीन रचनाकारों से तुलना कर  उनकी रचना को उनके समकक्ष बतला रहे हैं बल्कि घोषित कर रहे  हैं और उनकी किताब विमोचन के बाद ऐसी काल कोठरी में पहुँच जाती है जिसका नामलेवा कोई नही बचता। ऐसे ही एक रचनाकार की घटिया कविताओं का काव्य संग्रह प्रकाशित हुआ उसका भव्य विमोचन समारोह शहर के सबसे बड़े सभागार में आयोजित हुआ । इसका कारण यह था कि वे मंत्री जी के भतीजे थे  एक निजी कॉलेज के संचालक और बहुत पैसे वाले  थे अस्सी पेज की किताब उन्होंने खुद के खर्चे से छपवाई थी अच्छा कागज बढ्रिया जिल्द  तथा आकर्षक कवर था उसका उसकी कीमत उन्होंने  दो हजार  रुपये रखी थी । मंत्री जी आयोजन में आए थे उनके कारण सभागार ठसाठस भरा हुआ था  शहर के सबसे बड़े समीक्षक  ने अपनी समीक्षा में उन्हें कालजयी घोषित कर दिया क्योंकि कई दिनोंतक उनकी खूब खातिरदारी हुई थी शहर की फाइव ...

व्यंग्य: गलत हथकण्डे अपनाने वाले

वैसे तो लोग मेहनत में विश्वास करने वाले होते हैं पर जो गलत हथकण्डे अपनाकर सफलता प्राप्त करना चाहते हैं। एक दिन उनको इस के बुरे परिणाम भुगतने पड़ते हैं तब ये कहीं के नहीं रहते ।फिर ये ईमानदार निष्ठावान लोगों की तरक्की देखकर जलने लगते हैं तथार उन्हें मिटाने के लिए कथित तांत्रिकों के पास जाते हैं तथा कई तरह के टोने टोटके कराते हैं उसमें खूब पैसा भी खर्च करते हैं जब इसका कुछ नतीजा नहीं निचलता तो बौखला जाते हैं। बाज़ार में अच्छे ब्राण्ड की नकली चीजें कुछ दुकानों पर बिकती हुई मिल जाएँगी इनमें लेबल पैंकिंग सब हूबहू ब्राण्डेड कंपनी की नकल होता है पर सामान पूरा नकली होता है। एक दुकान पर चार सौ रुपये किलो देशी घी मिल रहा था और कुछ लोग सस्ते के लोभ में उसे खरीद रहे थे। जहाँ शुद्ध घी आठ सौ रुपये किलो से कम नहीं है वहाँ चार सौ रुपये किलो का घी कैसे शुद्ध होगा। सस्ते के फेर में लोग नकली चीजें खरीद लेते हैं। लेकिन जब उन्हें सच का पता चलता है तो वो दुकान ही छोड़ देते हैं एक दुकान पर ग्राहकों की हमेशा भीड़ लगी रहती थी जबकि उसके यहाँ चीजों के दाम थोड़े अधिक थे पर शुद्धता की पूरी गारंटी थी और यही का...

व्यंग्य: ऊँचे पद वाले घटिया लोग

आज की इस दुनिया में जहाँ मतलबी लोगों की संख्या बहुत अधिक है। वहाँ ऊँचा पद सारी विशेषताओं का धारक है अगर ऊँचे पद पर कोई घटिया विराजमान है तो वो भी महान है। कोई कहता है फलाने साहब के मार्गदर्शन में निर्देशन में यह प्रयास सफल हुआ है तो लोग उसे सही मान लेते हैं जिस छोटे आदमी ने सबसे ज्यादा मेहनत की जिसकी वजह से काम सफल हुआ उसका कोई नाम तक नहीं लेता बल्कि वो खुद सोचता है कि साहब अगर नाराज हो गए तो परेशानी खड़ी हो जाएगी। यह ऊँचे पद वाले घटिया लोगों अपने आपको बहुत बड़ा समझते हैं छोटे लोगों की इनकी निगाह में कोई कीमत नहीं होती यह कुछ करते धरते नहीं है । बस इनका एक ही काम रहता है हस्ताक्षर करना बाकी समय ये किसी को डराते हैं किसी को धमकाते हैं। किसी की इन्क्रीमेन्ट रोक लेते हैं किसी को सस्पेण्ड कर देते हैं। ये करते कुछ नहीं मगर रिश्वत की कमाई में सबसे बड़ा हिस्सा इन्हीं का होता है इनमें नौतिकता नहीं होती न इनका कोई धर्म ईमान होता है न इनमें सरलता सहजता होती है ये लोग ख़ुशामद पसंद होते हैं जिसका लाभ खुशामदी टाइप के लोग खूब उठाते हैं इनका बर्ताव व्यवहार ठीक नहीं रहता अपने छोटों के साथ ये बड़...

व्यंग्य: डींगे हाँकने वाले

कुछ लोग ऐसे होते हैं जो बातें तो बहुत बढ़ी बढ़ी करते हैं मगर किसी भी काम भें सफल नहीं होते ऐसे लोग अपनी जमा पूँजी भी गँवा देते हैं और फिर बड़ी डींग हाँकते हैं । ये लोग अपने आप को दुनिया का सबसे बुद्धिमान समझदार इंसान समझते हैं और अपनी हर असफलता का दोष किस्मत को देकर खुद को निर्दोष साबित कर देते हैं । ऐसे ही एक व्यक्ति हैं राम भरोस जी पचास साल की उम्र हो गई हैआजकल ताश और शतरंज खेलकर अपना समय काट रहे हैं उनका लड़का आशीष अठ्ठाइस साल का है उसकी किराने की दुकान है जो ठीक ठाक चलती है वो सब उसकी मेहनत की कमाई का है रामभरोस का उसमें कोई योगदान नहीं है । आशीष व्यवसाय के संबंध में अपने पिताजी से कोई सलाह मशविरा नहीं लेता ऐसा वो अपनी मम्मी के कहने पर करता है जो उसके पिता की फितरत को अच्छी तरह जानती है।  ऐसे लोग हर तरह का काम धंधा करते हैं पर किसी में भी सफल नहीं होते ऐसे लोग भी मिल जाएँगे जिन्होंने अपने पिता की जीवन भर की कमाई दौलत को पूरी तरह ठिकाने लगा दिया है और अब मुश्किल से अपना जीवन यापन कर रहे हैं। देखा जाए तो कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता काम करने वाला अगर सही हो तो वो काम...

रिश्वत के सुख में छिपे दुख (व्यंग्य)

जिस तरह साहूकार को मूल से ब्याज अधिक प्यारा होता है उसी तरह रिश्वतखोर को वेतन से अधिक रिश्वत प्यारी होती है। क्योंकि वेतन तो महीने में एक दिन मिलता है और रिश्वत तो रोज मिला करती है। इसलिए जो कामाऊ विभागों के कर्मचरारी हैं और अगर वे कुँवारे हैं तो उनके यहाँ बेटी का रिश्ता करने के इच्छुक लोगों की भीड़ लगी रहती है। वो लड़की अपने आपको खुशकिस्मत समझती है जिसे कमाऊ विभाग में काम करने वाला पति मिलता है। पति तो ऑफिस के काम में डूबा रहेगा उसकी कमाई पर आखिर उसे ही तो मौज करनी है। ये रिश्वतखोर लोग जब तक रिश्वत में अच्छे खासे रुपये न ले लें तब तक इन्हें चैन नहीं पड़ता। इनके घर के खर्च भी अनाप शनाप होते हैं। रिश्वत लेते समय इनका यही कहना होता है कि रिश्वत नहीं लेंगे तो वे अपने परिवार का भरण पोषण कैसे करेंगे। एक तरफ तो लोग दस हजार रुपये महीने की कमाई में अपना परिवार पाल रहे हैं और इन्हें दो लाख रुपये महीना वेतन मिल रहा है फिर भी बिना रिश्वत का इनका परिवार की भूख से मरने की संभावन इन्हें नजर आती है। आखिर ऐसा ये क्या खाते हैं जो इन्हें इतने सारे रुपयों की आवश्यकता पड़ती है। एक कमाऊ विभाग के रमेश बाबू ...

व्यंग्य: बिचौलियों की मौज

आज के इस दौर में अगर कोई सबसे अधिक सुखी है तो वो है बिचौलिया ये बिचौलिया वो है जिसकी न हींग लगे न फिटकरी और रंग चोखा मिल जाए। इनके पास से एक रुपया भी खर्च नहीं होता और लाभ पूरा का पूरा होता है ।ये बिचौलिए आपको हर डगह मिल जाएँगे इनके लिए कोई काम कठिन नहीं है रिश्वत खोरों को रिश्वत दिलाने में इनका बड़ा योगदान रहता है कुछ काम तो ऐसे होते हैं जो बिचौलियों की मदद के बिना संभव ही नही होते।  एक व्यक्ति को अपना मकान बेचना था उसने बिचौलिए से संपर्क किया । बिचौलिए ने कहा कितने में बेचना है वो बोला बीस लाख में बिचौलिया बोला बिकवे देंगे। मगर हमारा कमीशन एक लाख रुपया रहेगा। हम सौदा जितने में तय कराएँ उससे आपको कोई मतलब नहीं आपको अपने पैसे पूरे मिल जाएँगे आपको इससे मतलब रखना है वो बोला ठीक है। वो मकान जिसे कोई ग्राहक नहीं मिल रहा था उसका ग्राहक बिचौलिया दुसरे दिन ले आया। उसने ग्राहक को मकान की कीमत चौबीस लाख बताई खूब भावताव के बाद सौदा बाइस लाख में तय हुआ। दो लाख रुपये बिचौलिए ने ग्राहक से झटके और एक लाख रुपये मकान बेचने वाले से और मिठाई मुफ्त में खाई एक झटके में बिचौलिए ने तीन लाख रु...

रिश्वत की कमाई का बँटवारा (व्यंग्य)

कोई माने यह न माने पर इसका अंदाजा तो लग ही जाता है कि रिश्वत की जड़ें बहुत मजबूत हैं। जिन्हें उखाड़ पाना संभव नहीं। ऐसी जेसीबी मशीन ही नहीं बनी जो रिश्वतों की जड़ों को पूरी तरह उखाड़कर नष्ट कर दे और न ही कोई ऐसा खरपतवार नाशक बना है जो रिश्वत के पौधे को उगने ही न दें। रिश्वत का लेन देन तब तक चलता रहेगा जब तक सूरज चाँद रहेंगे। जिनके पास रिश्वत लेने के अघोषित अवैध अधिकार नहीं हैं। वे रिश्वत नहीं ले सकते। लेकिन रिश्वत देना उनकी मजबूरी हो। शायद ही कोई ऐसा विरला होगा जिसने आज तक कभी किसी को रिश्वत का एक पैसा तक नहीं दिया है। अगर रिश्वत लेना और देना दोनों जुर्म है और इसे साबित करने में आसानी हो तो शायद देश में कोई विरेले ही बचेंगे जिन्हें सजा न मिले। एक दुकानदार ने बताया कि अगर हमें रिश्वत न देना पड़े तो बीस प्रतिशत कीमत तो वैसे ही कम हो जाए। हम क्या जेब से रिश्वत देंगे। जो देते हैं वो भाव बढ़ाकर वसूल कर लेते हैं। एक होटल वाला साफ सुथरे मग को ट्रे में रखकर दो लोगों को चाय सर्व कर रहा था। उनके लिए नाश्ता भी साफ सुथरी मँजी क्राकरी में लगाया गया था। होटल मालिक वेटर का काम कर रहा था साथ ...