जिले के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी वानखेड़े अपनी सख्ती के लिए विख्यात थे वे कईयों को सस्पेण्ड कर चुके थे कई कर्मचारियों की वेतनवृद्धियाँ उन्होंने रोक दी थीं। वे बुरी तरह डाँटते थे अधीनस्थों को अपमानित करने म उन्हें बड़ा मजा आता था वही सर एक माध्यमिक शाला के शाला प्रभारी देवीसिंह जी के सामने आज नत मस्तक हो रहे थे। दो दिन पहले उन्हें उन्होंने सस्पेणाड करने की धमकी दी थी एक दिन का वेतन काटने के निर्देश भी दिए थे तथा सबके सामने डाँटा था। वही वानखेडे जी आज सर जी गुरूजी चरण स्पर्श जैसी बात उनसे कर रहे थे उनके सामने विनम्रता की मूर्ति बने हुए थे। कह रहे थे सर जी मेरे होते हुए आपको कभी कोई परेशानी नहीं आएगी आप निश्चिंत रहिए।
देवीसिंह वानखेड़े जी के बदले हुए व्यवहार से थोड़े चकित थे पर इसका कारण उन्हें मालूम थे लेकिन उसके दो दिन पहले जो घटना घटी वो इस प्रकार है। हुआ यह कि उस दिन देवीहिंह जी के स्कूल में पाठ्यपुस्तक आने वाली थीं संकुल प्राचार्य के सख्त निर्देश थे कि जब पुस्तक लेकर ट्रक आए तब शाला प्रभारी उसे रिसीव करने लिए उपस्थित रहें नहीं तो उनके खिलाफ कार्यवाही की जाएगी ट्रक सुब्ह नौ बजे आने वाला था। साढे दस बजे देवीसिंह जी को जिला मुख्यालय पर डाइट में आयोजित बैठक में जाना था लेकिन ट्रक साढ़े दस बजे आया देवीसिंह जी ने पुस्तकें रिसीव की सूची से मिलान किया ड्राइवर ने दो सौ रुपये माँगे वो उन्होंने अपनी जेब से दिए जिसके कारण वे बैठक में बारह बजे पहुँचे वानखेड़े जी बैठक का निरीक्षण करने आए थे। उन्होंने देवीसिंह जी को देर से आने पर खूब लताड़ लगाई सबके सामने अपमानित किया एक दिन का वेतन काटने के साथ ही सस्पेण्ड करने की बात कही देवीसिंह जी को अपना पक्ष रखने का उन्होंने मौका ही नहीं दिया जबकि देवीसिह जी एक आदर्श शिक्षक थे पूरी ईमानदारी से अपना काम करते थे सब उनका बहुत आदर करते थे वे बड़ी सादगी से रहते सीधे सरल इतने थे कि लोगों को उनकी सरलता देखकर आश्चर्य होता था। डाईट के प्राचार्य सतेन्द्र,जी भी देवीसिंह जी का सम्मान करते थे । वानखेड़े जी तो चले गए पर प्राचार्य जी ने कहा सर आप दूसरे बेच में शामिल हो जाना मैं वानखेड़े जी से बात कर सारी स्थिति स्पष्ट कर दूँगा आपका अहित नहीं होगा। लेकिन शाम को जब वानखेड़े जी ने देवीसिंह जी की उपस्थिति लगी देखी तो वे प्रिंसीपल पर आग बबूला हो गए बोले इस व्यक्ति को हर हाल में सस्पेण्ड करना है और तुम उसे बचाना चाहते हो प्रिंसीपल साहब चुप हो गए क्योंकि वानखेड़े जी उनसे वरिष्ठ अधिकारी थे हाँलाकि उस सूची में पच्चीस नाम ऐसे भी थे जो कभी कोई बैठक में शामिल नहीं होते थे फिर भी उनका बाल बाँका नहीं होता था क्योंकि वे स्थानीय नेताओं का संरक्षण प्राप्त लोग थे। वानखेड़े जी को भी ये मालूम था पर वे तालाब की बड़ी मछली की तरह थे जो छोटी मछली को ही खा सकती है मगरमच्छ से वैर मोल नहीं ले सकती इसलिए वे चुप हो गए थे। दूसरे दिन देवीसिंह जी मुँह लटकाए बैठे हुए थे उन्हें पता चल गया था कि आज शाम तक उन्हें निलंबन का आर्डर मिलने वाला था तभी स्कूल के सामने गाड़ियों का काफिला रुका उसमें से जिला पंचायत अध्यक्ष शशिकांत जी उनकी तरफ बढ़े और उन्होंने देवीसिंह जी के पैर छुए और बोले सर आपने पहचाना मुझे आपने मुझे पढ़ाया है सर आपने मेरे बहुत कान उमेठे है। देवीसिंह जी अब शशिकाँत जी को पहचान गए थे। शशिकाँत जी बोले सर मुझसे गलती हो गई मुझे आपसे बहुत पहले मिलना था। फिर बोले इस गलती की मुझे सजा दीजिए आप वैसे ही मेरे कान मरोडिए जैसे आप मेरे बचपन में मरोडते थे । देवीसिंह झेंप गए तो शशिकाँत जी बोले कान तो पकड़ना पड़ेगा सर आपको। और देवीसिंह जी ने अपने शिष्य का मन रखने के लिए कान मरोड़ा भी। शशिकाँत जी तो चले गए पर किसी ने उनसे कह दिया कि सरजी को वानखेड़े जी बहुत परेशान कर रहे हैं। शायद आज शाम को उनका निलंबन भी होजाए शशिकाँत बोले ऐसा हरगिज नहीं होगा और उन्होंने वानखेडे जी को फोन लगाया फोन उठाते ही वे वानखेडे पर बरस पड़े बोले तुम्हें यहाँ रहना है कि नहीं वानखेड़े जी बोले सर क्या गलती हो गई । जब शशिकाँत जी ने देवी सिंह जी का नाम लिया और कहा उनके खिलाफ कार्यवाही मत करो नहीं तो तुम्हारी फाईलें खोलने में देर नहीं लगेगी और तुम्हे भी जेल जाना पड सकता है। वानखेड़े जी लताड़ सुनकर भीगी बिल्ली जैसे हो गए थे। बोले सर जी आपको शिकायत का मौका नहीं मिलेगा शशिकाँत जी ने फोन रख दिया था। इसके बाद ही तो उन्होंने देवीसिंह जी को फोन लगाकर उनसे नर्म लहजे में बात की थी।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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