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कहानी: गरीब विधवा की बेटी की शादी

रोशनी की शादी हुए आठ वर्ष हो गए इन आठ वर्षों में उसने और उसके पति चैनसिंह ने घोर परिश्रम कर के अपने आपको गरीबी के दलदल से निकाल लिया था अब उनके पास खुद का बड़ा मकान था चार  पहिया वाहन था और घर में सुख सुविधा के सभी साधन मौजूद थे।
जब रोशनी की शादी हुई तब उसके पिता नबीलाल के निधन हुए पाँच वर्ष हो गए थे उस समय रोशनी कक्षा 6 में पढ़ रही थी उसके पिता नबीलाल जो मजदूर थे काम करते समय चौथी मंजिल से गिर गए थे जिससे उनका निधन हो गया था उनके निधन के बाद रोशनी की माँ सुखिया पर घर की सारी जिम्मेदारी आ गई थी रोशनी का भाई रवी अभी मात्र छः महीने का था जब सुखिया मजदूरी पर जाती तो रोशनी घर में रहकर  भैया की देखभाल करती इससे उसका स्कूल छूट गया वो छठी से आगे पढ ही  नहीं सकी थी  जब भैया तीन साल का हो गया और नर्सरी में उसका एडमीशन हो गया तब रोशनी भी माँ के साथ मजदूरी पर जाने लगी थी रोशनी जवान हो गई थी सुखिया को उसकी शादी की चिंता लगी रहती थी घर की हालत खराब थी शादी के लिए उनके पास रुपये भी नहीं थे ऐसे में रोशनी ने कंधे से कंधा मिलाकर काम किया  रोशनी को कम उम्र में ही यह पता चल गया था कि गरीबी में अपने भी  कन्नी काट कर निकल जाते हैं। माँ बेटी ने मजदूरी कर रुपये तो जोड़ लिए पर शादी के लिए  वर कैसे ढूँढे ऐसे में सुखिया की बहन सरिता ने उसकी मदद की   चैनसिंह तब होटल में काम करता था अच्छा लड़का था  रोशनी की शादी उससे तय हो गई थी इसके बाद शादी तो सादगी से संपन्न हो गई पर सुखिया ने अपनी बेटी को  दहेज खूब दिया  घर की जरूरत का सारा सामान  सुखिया ने दहेज में दिया था।  विदा होते समय रोशनी ने देखा कि उसकी माँ की हाथ की उँगली की  सोने की अँगुठी नही थी पता चला  की   माँ ने वो अँगूठी बेचकर रोशनी के कान के टाॅपस  नाक की लौंग खरीद ली थी।  शादी से चैनहिंह बहुत खुश था  रोशनी की खुशी की तो कोई सीमा ही नहीं थी रोशनी मैदा मिल में काम करती थी  चैनसिंह होटल में  हलवाई का  काम करता था 
एक दिन रोशनी ने चेन सिंह से कहा  कि अगर हम दो लाख रुपये  की राशि जुटा ले तो कैंटीन का  ठेका हमें मिल सकता  है रोशनी की बात चैनसिंह को जम गई उन्होंने पैसों की व्यवस्था की और वो ठेका उन्हैं मिल गया  इस ठेके ने उनकी सारी गरीबी दूर कर दी  चैनसिंह अब नौकर से कैंटीन का मालिक था रोशनी भी दुकान पर अपना पूरा समय देने लगी अड उनका समाज में भी मान सम्मान बढ़ गया था।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप


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