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कहानी: सख्ती का नतीजा

सुरेश तिवारी जी को दो साल तक मुकद्दमा लड़ने के बाद माननीय अदालत ने आज बरी कर दिया था इसके साथ ही दो साल तक जो उन्होंने मानसिक प्रताड़नाएँ सामाजिक तिरस्कार तथा कदम कदम पर जो अपमान झेला था उससे उन्हें आज मुक्ति मिल गई थी आज वे अपने आपको हल्का महसूस कर रहे थे उनके लिए ये संतोष की बात थी कि रिटायरमेन्ट के नजदीक आते आते वे बरी हो गए थे।
सुरेश जी ढाई वर्ष पहले ग्राम बरखेड़ा के हाई स्कूल में
प्रिन्सीपल के पद पर पदोन्नत होकर आए थे मन में बहुत कुछ करने की तमन्ना थी वे अंग्रेजी के बहुत अच्छे व्याख्याता थे ईमानदार कर्त्व्यनिष्ठ एवं समय के पाबंद इंसान थे। यहाँ आकर पदभार ग्रहण करने के बाद उन्होंने स्टॉफ की मीटिंग ली और अपनी बात उनके सामने रखी जिसमें सभी से समय पर आने समय से जाने तथा बच्चों को अच्छे से पढ़ाने की बात कही गई थी सुरेश जी नकल के सख्त खिलाफ थे मीटिंग में उन्होंने शिक्षकों से जोर देकर कहा था कि आप अच्छे से पढ़ाओगे तो नकल कराने की नौबत ही नहीं आएगी। मीटिंग तो समाप्त हो गई पर पूरा स्टॉफ अंदर से सुरेश जी के प्रति नाराजगी रख रहा था। तिवारी जी दूसरे दिन दस बजे स्कूल पहुँच गए थे स्कूल का चपरासी सोहन पौने ग्यारह बजे स्कूल आया ग्यारह बजे अनिल सर मोटर सायकिल से स्कूल आए सवा ग्यारह बजे बस आई उससे बाकी का स्टॉफ आया वे ग्यारह पच्चीस पर स्कूल आए प्रार्थना होने के बाद सब कक्षाओं में चले गए सारे टीचर बीस मिनिट कक्षाओं में रुके हाजिरी ली और स्टॉफ रूम में आकर बैठ गए साढ़े बारह बजे लोकल शिक्षक दिनेश और सतीश स्कूल आए। बच्चे भी कक्षाओं से बाहर गए थे उनमें से अधिकाँश तो घर चले गए बाकी मैदान में खेलते रहे स्टॉफ रूम से शिक्षकों के ठहाकों की आवाजें आ रही थीं तिवारी जी हैरान थे कि कल के मीटिंग का किसी पर भी असर नहीं हुआ था। सब उनकी उपेक्षा कर रहे थे। तिवारी जी ने चपरासी सोहन को घंटी बजाकर बुलाया तथा इस विषय में बात की तो सोहन ने कहा यहाँ सब ऐसे ही चलता है किसी को कोई ऐतराज नहीं है मेरी मानो सर तो आप भी इनके रंग में रंग जाओ वरना आपके हित में अच्छा नहीं होगा। पर तिवारी जी हार मानने वाले इंसान नहीं थे। उन्होंने आदेश पुस्तिका निकाली तथा इस स्थिति पर असंतोष जाहिर कर सबको चेतावनी दी पर रवैया फिर भी नहीं बदला तिवारी जी ने देखा कि कुछ शिक्षक आते हैं और रजिस्टर में दस्तखत करके चले जाते हैं कोई न कोई शिक्षक बिना सूचना दिए स्कूल से अनुपस्थित रहते थे तथा दूसरे दिन अधिकारपूर्वक रजिस्टर पर दस्तखत कर रहे थे। तिवारी जी की बार बार की चेतावनियों का किसी पर कुछ असर नहीं हो रहा था। तिवारी जी ने बिना कारण बताए अनुपस्थित रहने वाले शिक्षकों का वेतन काट लिया उसमें ऐसा कोई शिक्षक बाकी नहीं रहा जिसका वेतन न कटा हो चपरासी का भी दो दिन का वेतन कटा था। इससे स्कूल में हंगामा खड़ा हो गया था सब तिवारी जी के खिलाफ हो गए थे सारे शिक्षक सोर्स वाले थे कोई सर्पंच का जमाई था तो कोई भाई कोई विधायक जी का रिश्तेदार था सब एक स्वर में तिवारी जी का विरोध कर रहे थे तिवारी जी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के पुत्र थे झुकने वालों में से नहीं थे उनकी सख्ती से मात्र दिन वे सब समय पर आए स्कूल भी पूरे समय लगा चौथे दिन गाँव का सरपंच शिवलाल आ गया उसने शिक्षकों से तो कुछ नहीं कहा उल्टे तिवारी जी को ही सबके सामने बुरी तरह लताड़ दिया तिवारी जी अपमान का कड़वा घूँट पीकर रह गए थे। दूसरे दिन बच्चों की परीक्षा थी उसमें सभी शिक्षक एक सिरे सबको नकल करा रहे थे। इस पर तिवारी जी ने सख्त नाराजगी जताई तथा कुछ छात्रों के नकल प्रकरण बनाए जिसका सभी ने विरोध किया  तिवारी जी ने सबकी तलाशी ली तो दो बोरे भरकर नकल साम्रग्री इकठ्ठा हुई जिसको परीक्षा समाप्त होने के बाद  कलेक्टर के पास ले गए उन्हें भी शिक्षकों का यह कृत्य अच्छा नहीं लगा जब यह बात शिक्षकों को पता चली तो सभी ने तिवारी जी के खिलाफ झूठी रिपोर्ट लिखा दी हालाँकि इसके पहले ही तिवारी अपनी रिपोर्ट थाने में दर्ज करा चुके थे पुलिस ने तिवारी जी को थाने में पूछताछ के लिए बुलाया था पर दलित से अपमान जनक बातें कहने का आरोप लगाकर पुलिस ने तिवारी जी को हिरासत में ले लिया हवालात की जमीन पर बैठे तिवारी जी बड़े दुखी थे। शाम को तिवारी जी से मिलने उनके साथी आए वे सभी सीधे सज्जन लोग थे पर पुलिस पर उनकी बातों का कोई असर नहीं पड़ रहा था। हारकर सब शहर के माने हुए वकील के पास गए वकील ने केस का अध्ययन करने के बाद तिवारी जी को जल्दी ही जमानत दिलाने की कार्रवाई की। कहीं दो दिन बाद तिवारी जी की जमानत  तो हो गई पर विभाग ने उनके सस्पेण्ड को खत्म नहीं किया वे दो साल तक सस्पेण्ड रहे आधी तनख्वाह से उन्होंने घर भी चलाया तथा मुकद्दमा भी लड़ा आज वे मुकद्दमा जीत पाए।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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