लगातार पचास लाख का कर्ज सिर पर चढ़ जाने से परेशान तथा अपनी पाँच एकड़ जमीन कर्ज में गँवा चुके किसान किशनलाल को रत्नपुर गाँव से पलायन किए हुए पूरे आठ साल हो जए थे।उसका किसी को अता पता नहीं चला था।
तीन साल फसल बर्बाद होने के कारण किशनलाल के ऊपर साहूकार लालाराम का बीस लाख रूपये का कर्ज था जबकि उसने तीन साल पहले तीन लाख रुपये कर्ज लिया था जो पाँच प्रतिशत मासिक ब्याज के कारण बढ़ते बढ़ते बीस लाख रुपये हो गए थे लालाराम की किराने की दुकान से उधार लिए गए सामान का कर्ज पाँच लाख रुपये था जिसपर लाला राम ने किशनलाल की पाँच एकड़ जमीन हथिया ली। थी इसके बाद भी उसके ऊपर पचास लाख का कर्ज और बाकी था।जो उसने समय समय पर और लोगों से लिया था किशनलाल के पास और कोई चारा नहीं था या तो पलायन करे या आत्महत्या किशनलाल ने पलायन का निर्णय लिया और रातोंरात परिवार सहित गाँव से पलायन कर गया था। किशन लाल ने मध्यप्रदेश से दूर बंगाल के सुदूर क्षेत्र में बसे गाँव बलराम पुर को अपना निवास बना लिया था सरकारी जगह पर झुग्गी बनाकर वो उसमें परिवार सहित रहा था किसान से मजदूर बना किशनलाल अब ज्यादा खुश नजर आ रहा था मजदंरी से घर का खर्च चल रहा था खेती थी नहीं तो फसल बर्बाद होने का डर भी उसे नहीं था। रत्नपुर के लेनदारों ने किशनलाल को दूर दूर तक खोजा जब वो कहीं पर भी नही॔ मिला तो गाँववालों ने उसकी खोज बंद कर दी थी । किशनलाल को झुग्गी का पट्टा मिल गया था जिसे उसने पी एम आवास योजना का लाभ उठाकर पक्के घर में बदल लिया था। आज उसके बड़े लड़के मोहन लाल को खेती की जमीन खरीदने से किशनलाल ने इंकार कर दिया था जब किशनलाल ने कारण बताया कि खेती लाभ का सौदा नहीं घाटे का सौदा है। यह बात मोहनलाल को भी समझ में आ गई थी इसलिए उसने अपनी जमापूँजी तथा बैंक लोन से हाइवे पर आधा एकड़ जमीन खरीदकर ढाबा खोलने का निर्णय ले लिया था।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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