सोहनलाल जो रेल्वे में बुकिंग क्लर्क के पद से तीन साल पहले रिटायर हुए थे खेती करने का शौक रखने के कारण पाँच एकड़ जमीन खरीदने तथा लगातार उसमें नुक्सान उठाने के बाद उसे बेचकर फिर से शहर आ गए थे और आज वो अपने आपको काफी हल्का फुल्का महसूस कर रहे थे।
सोहनलाल जी को किसान बनने की बड़ी चाह थी जब वे रेल्वे की नौकरी करते थे तो हरे भरे लहलहाते खेत उन्हें खूब आकर्षित करते थे उन्हें किसान के भाग्य से ईर्ष्या होती थी वो सोचते काश वो भी किसान होते तो कितना अच्छा रहता उनकी पत्नी अनीता भी इसी तरह के ख्याल रखती थी। जब वह रिटायर हुए तो रिटायरमेन्ट के बाद उन्होंने पाँच एकड़ जमीन शहर से सत्तर किलोमीटर दूर स्थित शेरपुर गाँव से लगी हुई खरीद ली जमीन उन्होंने पचास लाख रुपये में उसी गाँव के किसान रेशम लाल से खरीदी थी। रेशमलाल ने उन रुपयों से शहर में एक डुप्लेक्स खरीद लिया था उसमें वे अपनी पत्नी के साथ सुखपूर्वक रहने लगे। इधर सोहनलाल जी और उनकी पत्नी अनीता भी जमीन खरीदकर बड़े खुश थे उन्हें अपने सपने साकार करने का अवसर मिल गया था जमीन गाँव के एकदम पास थी उस जमीन में ही मकान भी बना हुआ था उस मकान को भी रेशमलाल ने जमीन के साथ ही सोहनलाल जी को बेच दिया था सोहनलाल उसी घर में अपनी पत्नी के साथ रहने आ गए थे सोहनलाल जी ने कभी खेती तो की नहीं इसलिए उनके पास कोई अनुभव तो था नहीं सारे ख्याली पुलाव थे। शुरू शुरू में तो सोहनलाल जी ने बड़े उत्साह से काम किया सोयाबीन बोने से लेकर फसल की थ्रेशिंग करने में उनके पचास हजार रुपये खर्च हो गए बदले में सोयाबीन कुल तीस हजार में बिकी उन्हें उस में बीस हजार रुपये का घाटा हुआ यही हाल गेहूं की फसल का हुआ वह भी अपेक्षा के उनुरूप नहीं हुई अनीता को भी शुरू में गाँव की पगडंडियाँ खपरैल वाले घर अच्छे लगे लेकिन फिर वो जल्दी ही उनसे ऊब गई गाँव में लाईट की समस्या थी। सोहनलाल जी की अनुभवहीनता का फायदा ग्रामवासी उठा रहे थे। गांव अब पहले से नहीं रहे थे वे सारे गाँव संवेदना विहीन हो गए थे कोई उनको मदद करने को तैयार नहीं था। फिर भी उन्होंने गाँव में रहकर तीन साल जैसे तैसे निकाले उन्हें पंद्रह लाख रुपये खर्च करना पड़े थे। पर फसलें बारह लाख की ही बिक पाई थी तीन लाख का उन्हें घाटा हुआ था घर में दिन साँप बिच्छू निकलते रहते थे। जो अनीता सोहनलाल जी को जमीन खरीदने के लिए उकसाया करती थी वही अब कह रही थी की जल्दी से जल्दी यह जमीन बेचो वापस शहर चलते हैं गाँव में कोई बड़ा अस्पताल भी नहीं था। सोहनलाल जी दमे के मरीज थे कभी-कभी उन्हें दौरे आते थे। उन्होंने भी जमीन बेचने का इरादा कर लिया था। आखिर में उन्होंने पैंतीस लाख में वो जमीन बेच दी। और शहर में फ्लेट खरीद लिया था तथा उसमें वे आज शिफ्ट हो गए थे।
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प्रदीप कश्यप
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