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कहानी: गरीब की पढ़ाई

बचपन में पिता का साया सिर से हट जाने के बाद सौतेले पिता के साथ रहकर सरकारी स्कूल में पढ़ाई कर के रमन लाल आज शहर के माने हुए रईस थे। वहीं उनके बचपन  के दौर में सबसे अमीर पिता का पुत्र संदीप उनके  कारखाने में साधारण श्रमिक की तरह काम कर अपना जीवन यापन कर रहा था।
रमनलाल जब तीन वर्ष के थे तब उनके पिता दयाराम को साँप ने डंस लिया था जिससे उनकी मौत हो गई थी उस समय उनकी बहन राखी मात्र छः महीने की थी रमनलाल की माँ सुगन की उम्र मात्र तेइस वर्ष की थी। सुगन ने  जमींदार अवधेश प्रताप सिंह के खेतों में काम करने वाले  सुखलाल से शादी कर ली थी वो अपने साथ अपने दोनों बच्चे भी लाई थी। सुखलाल का जब सुगन से पुत्र पैदा हुआ उस समय रमनलाल की उम्र छः वर्ष थी रमन का नाम सरकारी स्कूल में लिखा दिया गया था। सौतेले भाई के जन्म के बाद सुखलाल का रवैया रमन के प्रति ठीक नहीं था वह उसकी पढ़ाई के भी खिलाफ था पर सुगन के कारण वो उसे पढ़ने से रोक नहीं पा रहा था रमन पढ़ाई मैं बहुत तेज थे जो किताबें सरकारी तौर पर उन्हें मिली थीं  वे उन्होंने छः महीने में ही पूरी पढ़ ली थीं रमन हर साल स्कूल में टॉप करते थे जिससे उन्हें छात्रवृत्ति मिलती रही और उनकी पढ़ाई जारी रही आई आई टी से एम टेक करने के बाद एम बी ए में भी रमनलाल ने टॉप किया था। प्लेसमेंट में उन्हें सात करोढ़ रुपये सलाना का पैकेज मिला था। दो साल में रमनलाल जी ने शेयर में पैसा लगाकर अपना रुपया कई गुना अधिक कर लिया था एक वक्त वो आया जब रमनलाल जी ने एक कंपनी के लगभग पूरे शेयर ही खरीद लिए। और अपनी नौकरी से इस्तीफा देकर बर्बादी के कगार पर खड़ी कंपनी को  सँभालने में जुट गए उनकी मेहनत रंग लाई चार साल की कड़ी मेहनत ने उनकी कंपनी को ऊँचाई पर पहुँचा दिया था। कंपनी की सूती मिल जो बंद होने वाली थी उसे उन्होंने घाटे से उबारकर लाभ में ला दिया था। उसी मिल में मजदूरी करता हुआ संदीप रमनलाल को मिला था अब संदीप एक मामूली हैसियत का इंसान था। वो रमनलाल से झेंप रहा था। जबकि रमनलाल कह रहे थे तुम्हारे पिता के खेतों में काम कर के ही तो हम पले बढ़े हैं। संदीप कुछ कहते इसके पहले मिल के मैनेजर राकेश बोल बैठे सर जी संदीप कोई पढ़े लिखे इंसान नहीं हैं और वो अपनी इस नौकरी से संतुष्ट हैं। जब रमन जी ने संदीप से पूछा तुम्हारी क्या राय है इसमें तब संदीप ने हाथ जोड़कर यही कहा कि वो इस नौकरी से संतुष्ट है और दूसरी बड़ी नौकरी वो करना नहीं चाहता। रमनलाल को संदीप का शानदार बचपन याद आ रहा था संदीप के पिता सेठ खेमचंद जमींदार ने संदीप को पढाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी पर संदीप अक्षर ज्ञान तक नहीं कर सका था। हारकर संदीप को सेठ जी ने अपनी दो सौ एकड़ जमीन  का प्रबंधन सौंप दिया था काम कुछ था नहीं बस कुर्सी पर बैठना भर था। बाकी अवधेश प्रताप जी के कर्मचारी सारी  व्यवस्था देख ही रहे थे। दुर्भाग्य से सेठ खेमचंद जी का आकस्मिक निधन हो गया था संदीप को दुनियादारी का अधिक ज्ञान था नहीं इसलिए संदीप को लोगों ने खूब लूटा खसोटा था। किसी की सलाह पर संदीप ने अपनी सारी जमीन जायदाद बेचकर पूरा रुपया शेयर बाजार में लगा दिया था। जिस शेयर बाजार से रमनलाल शहर के जाने माने रईस बने थे। उसी शेयर बाजार ने संदीप को पूरी तरह बर्बाद कर दिया था। नौबत यहाँ तक आ गई थी  कि अब वो दूसरों के यहाँ मजदूरी कर रहा था।


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रचनाकार 
प्रदीप कश्यप

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