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कहानी: करोड़पति पिता की कंगाल औलाद

मंशाराम सत्तर वर्ष की आयु में घोर गरीबी में अपना जीवन यापन कर रहे थे। हालात ये थे कि बस्ती के घरों से उनके लिए टिफिन में खाना आता था जबकि उनके पिता सेठ धनीराम रतन गढ़ कस्बे के नगर सेठ माने जाते थे उनके पास अकूत धन संपत्ति थी जब वे दुनिया छोड़कर गए तब खूब दौलत अपने बेटे मंशाराम को सौंपकर गए थे। वो दौलत कई पीढ़ियों तक खत्म नहीं होने वाली थी जिसे मंशाराम ने दस वर्षों में पूरी तरह चौपट कर दिया और अब खाने के वावे पड़े हुए थे आज टिफिन जरा देर से आया था मंशाराम का भूख से बुरा हाल हो गया था पर वे देर से टिफिन लाने वाले को कुछ भी नहीं कह सकते थे क्यूंकि वे सब उनकी मुफ्त सेवा कर रहे थे।
मंशाराम को अच्छी तरह याद है पचपन वर्ष पहले का वो समय जब उनकी हवेली रतनगढ़ की सबसे बड़ी और पक्की हवेली थी। उनके पास चार सौ एकड़ जमीन थी दो दर्जन यात्री बसे थीं। बहुत सारे मकान थे जो किराये पर दिए हुए थे। उस समय मंशाराम के भी बड़े जलवे थे सब उन्हें छोटे सरकार कहते थे वो भी अपने आपको किसी से कम नहीं समझते थे लेकिन जब बीस वर्ष की आयु होने के बाद भी मंशाराम हायर सेकेण्डरी पास नहीं कर पाए थे तो उनके पिता सेठ धनीराम जी ने उन्हें कारोबार के गुर सिखाने शुरू किए लेकिन जब कोई नतीजा नहीं निकला तो धनीराम जी दुखी हो गए आखिर नौकरों के भरोसे कब तक कोई रहेगा लेकिन मंशाराम को इसकी कोई परवाह नहीं थी उस जमाने में वह हर रोज हजारों रूपये खर्च कर दिया जाते थे। जबकि लोग उस जमाने में सौ रूपये में  परिवार का पूरा खर्च चल जाता था पर मंशाराम को पैसे की कोई कमी महसूस नहीं हो पाती थी। युवावस्था में सेठ धनीराम और मंशाराम के बीच इतने मतभेद हो गए थे कि दोनों ने आपस में बात करना भी बंद कर दिया था मंशाराम खुलेआम सेठ धनीराम की बुराई करता था कहता था क्या काम की है ऐसी दौलत पिताजी ने अपनी जिंदगी खपा दी क्या मिला। मंशाराम ने एक धेला भी अपनी कमाई का अपने पिताजी के हाथ में नहीं रखा था। जबकि खर्च करने में मंशाराम कभी पीछे नहीं हटता था। सेठानी को गुजरे दस वर्ष हो गए थे फिर भी सेठ धनीराम ने अपने आपको घर और बाहर दोनों तरफ के कामों में सँभाल रखा था पर मंशाराम उनके काबू से बाहर हो गया था जो काम पिताजी धनीराम करते थे उसका जरा सा भी काम मंशाराम नहीं करता था। धनीराम का अचानक  स्वास्थ्य खराब हो गया। उन्हें हार्ट अटेक आ गया वे दुनिया छोड़कर चले गए थे। उनके जाने के बाद मंशाराम  की बाँछे खिल गई थी। इसके बाद उन्होंने सेठ धनीराम की अकूत संपत्ति दस साल में ही मिटा दी और अब वो दूसरों के रहमो करम पर जी रहे थे।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप


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