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कहानी: बरसात

सात दिनों तक लगातार जारी बरसात के बीच मजदूरी का काम करने पर सुंदरलाल को पूरे पाँच हज़ार रुपये मिले थे जिसमें दो हजार रुपये और मिलाकर उसने समूह से लिए कर्ज की किश्त अदा कर दी थी। इस किश्त को लेकर सुंदरलाल बहुत चिंतित था पिछले दिनों साले की लड़की निशा की शादी में उसके दस हज़ार रुपये खर्च हो गए थे जिससे उसका सारा बैलेन्स गड़बड़ा गया था किश्त की देय तिथि दस दिन बाद आने वाली थी और उसके पास सिर्फ दो हज़ार रुपये ही बचे थे ऐसे में यह काम मिल जाने से उसकी किश्त समय पर अदा हो गई।
पिछले सात दिनों से लगातार बारिश हो रही थी नदी नाले उफान में थे बारिश से जन जीवन प्रभावित हो रहा था। सुंदरलाल सोच रहा था ऐसी बरसात में वो काम ढूँढने जाएगा और कौन उसे मजदूरी पर रखेगा तभी उसके मोबाइल पर मिस्त्री जगमोहन का फोन आया मिस्त्री कह रहा था सदर बाजार के पास शारदा कॉलोनी में काम मिल रहा है एक मिस्त्री और दो मजदूर की जरूरत है। दिन भर के साढ़ सात सौ रुपये मिलेंगे अगर करना चाहते हो तो आ जाओ। यह सुनकर सुंदर लाल बोला कि ठीक है मैं आधे घंटे में पहुँच रहा हूँ जगमोहन ने फोन रखते रखते कहा अगर एक और मजदूर मिल जाए तो उसे भी लेते आना। यह सुनकर सुंदरलाल अपने पड़ोस में रहने वाले  रमेश के पास गया तो रमेश ने इस भारी बरसात में काम पर जाने से इंकार कर दिया सुंदरलाल कड़वा घूँट पीकर रह गया पर बोला कुछ नहीं। सदर बाजार पासे में ही था सुंदरलाल पच्चीस मिनट में वहाँ पहुँच गया था। जगमोहन उसे देखकर खुश हुआ दोनों दिन भर काम करते रहे रोज सुंदरलाल सौ रुपये लेकर घर जाता जिसमें वे अपनी गुजर करते बाकी पैसे उसने मालिक के पास ही रहने दिए थे इसके अलावा उसने ओवर टाइम भी किया था। उसके पैसे भी मालिक के पास जमा थे आखिरी दिन उसे पाँच हज़ार रुपये मिले थे। उसी दिन रमेश भी काम पर पहुँचा था लेकिन तब तक काम खत्म हो चुका था। रमेश निराश होकर लौट गया था अब पछतावे से होता क्या जो समय है वो तो निकल ही चुका था। रमेश को पता था बाज़ार में मजदूर के रेट चार सौ रुपये हैं यहाँ तो दोगुने मिल रहे थे जिसे उसने बारिश के कारण ठुकरा दिए थे। दूसरी ओर सुंदरलाल को मिस्त्री ने पलस्तर करना सिखा दिया था तथा एक हज़ार रुपये रोज पर दस दिन का काम और दिलवा दिया था जबकि रमेश तीन दिन तक लगातार काम की तलाश में चौराहे पर बैठ बैठ कर परेशान हो गया था पर उसे कहीं काम नहीं मिला था। तीन दिन बाद उसे तीन सौ रुपये की रोजनदारी पर काम मिला उसने इसी पर संतोष कर लिया था। रमेश को इस बात से जलन होती थी कि उसे खूब काम मिलता था उसने आवासीय भूखंड भी खरीद लिया था और अतिशीघ्र वो उस पर मकान बनाने वाला था। जबकि रमेश अभी तक किराये के मकान में ही रह रहे थे।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 

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