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कहानी: अटेचमेन्ट

दो साल पहले तक अपने सहकर्मी ज्ञान प्रकाश शिक्षक वरिष्ठ कार्यालय में अटेच रहने से परेशान शिक्षक रमेश चँद्र जी को जबसे उनके स्थान पर आए शिक्षक सतीश  से उन्हें काफी राहत मिली थी स्कूल की पढ़ाई अच्छी होने से छात्र सँख्या बढ़ी थी जिससे एक और मेडम कुसुम वर्मा की पदस्थापना भी हो गई थी वे भी अच्छा पढ़ा रही थीं संग्रामपुर गाँव के ग्रामीण भी स्कूल की व्यवस्थाओं पर खुश थे। 
दो साल पहले जो शिक्षक ज्ञान प्रकाश विद्यालय में पदस्थ थे वे कभी स्कूल आते ही नहीं थे कभी डी पी सी तो कभी डी इ ओ, बी इ ओ ऑफिस में ही अटेच रहते थे। इससे रमेशचँद्र जी को बड़ी परेशानी होती थी पहली से पाँचवी तक के पैंसठ बच्चों को पढ़ाने वाले वे एकमात्र शिक्षक थे फिर सरकारी काम करने बैठकों में जाना सर्वे करना ऐसे पचासों काम उन्हें करना पड़ता था। शाला खाली भी नहीं छोड़ सकते थे जनशिक्षक दिनेश भी कोई दूसरे शिक्षक की व्यवस्था करने में असमर्थ थे एक बार जब इस बात को रमेश जी ने आगे तक पहुँचाई तो एक दिन ज्ञान प्रकाश ने उन्हें धमकी देते हुए कहा सर मेरे पीछे मत पड़ो अगर पीछा नहीं छोड़ा तो आपको लेने के देने पड़ जाएँगे।  मेरी बड़े-बड़े नेताओं और अधिकारियों से अच्छी पहचान है वो जो भी करेंगे मेरे पक्ष में ही करेंगे ज्ञान प्रकाश की धमकी से रमेश चंद्र जी घबरा गए थे। फिर वे चुप हो गए,  कुछ बोले नहीं रमेश जी बैठक आदि में जाते तो अपनी पत्नी विमला को स्कूल में छोड़कर जाते थे। और वे कर भी क्या सकते थे। वो तो एक दिन अचानक कलेक्टर साहब का संग्रामपुर जाना हुआ तो वे स्कूल का निरीक्षण करने भी आ गए रमेश जी को पता नहीं था कि यही कलेक्टर हैं उन्होंने तो अपने विभाग का कोई अधिकारी समझ कर अपने मन की बात सारी कह दी थी कलेक्टर साहब ने इसका तुरंत संज्ञान लिया बी ई ओ जी को फोन कर तत्काल ज्ञान प्रकाश जी को कार्यमुक्त कर विद्यालय भेजने के निर्देश दिए। दूसरे दिन ज्ञान प्रकाश जी स्कूल तो आ गए पर आते ही उन्होंने धमकी देते हुए कहा ये कलेक्टर साहब तो जाने वाले हैं फिर देखना सर मैं क्या करता हूँ। यह बात कलेक्टर साहब तक पहँच गई थी कलेक्टर साहब ने इसका तोड़ ये निकाला कि ज्ञान प्रकाश जी को उन्होंने डी पी सी कार्यालय में पदस्थ करा दिया था। तबसे ही रमेश जी को बड़ी राहत थी।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप


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