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कहानी: बचपन के दोस्त बुढ़ापे का सहारा

राजमल जी की अपने बचपन के मित्र हरीश से हरिद्वार  में अचानक  भेंट  पाँच साल पहले हुई थी ।वे पूरे पैंतालीस  साल बाद एक दूसरे से मिल रहे थे । तबसे वे दोनों एक ही घर में रह रहे  थे और एक दूसे के बुढ़ापे का सहारा बने हुए थे दोनों की उम्र इस समय पिचहत्तर वर्ष की थी।
आज शाम को जब दोनों मित्र साथ बैठकर बात कर रहे थे राजमल बोले  याद है हरीश पाँच साल पहले आज के दिन हम हरिद्वार में मिले थे हरीश बोले अच्छी तरह याद है  और यह भी याद है कि अगर उस समय तुमने मुझे सहारा न दिया होता तो मैं दर दर का भिखारी होकर रह जाता। राजमल ने कहा  ऐसा हुआ नहीं न ये बड़ी बात है। हरीश बोले जब हम एक साथ पढ़ते थे तब तुम कहते मैं तो सरकारी नौकरी करूँगा और मैं सरकारी नौकरी के खिलाफ था फिर तुम्हारी सरकारी नौकरी लग गई और तम मथुरा चले गए  मैंने इन्दौर में रहकर ही व्यापार शुरू कर दिया। फिर हम तीन साल बाद मिले थे तब मैंने तुमसे पूछा था  कितनी तनख्वाह मिलती है तुम्हें तब तुमने बताया था  आठ सौ रुपये तब मैंने कहा था  मैं व्यापार में बारह हजार रुपये तक एक महीने में शुद्ध मुनाफा काम लेता हूँ मेरी दुकान  पर तीन कर्मचारी काम करते हैं जिन्हें भैं पन्द्रह सौ रुपये महीने देता हूँ  फिर मैंने तुमसे कहा था आठ सौ रुपये परिवार का खर्च चल जाता है तब तुमने कहा था बड़े आराम से हम मध्यवर्गीय लोगों के लिए इतना रुपया काफी है इसके बाद हम फिर नहीं भिले थे न ही हमने एक दूसरे की खबर ली थी हरीश बोले  मैंने व्यवसाय में खूब रुपया कमाया बहुत बड़ा मकान बनवाया घर के लिए सारे सुखसाधन जुटाए  मेरा एक ही लड़का हुआ जिसका नाम ललित रखा गया था।  ललित को बुढ़ापे की लाठी समझकर मैंने उसे बहुत लाढ़ प्यार से पाला था।  उसी ने  मेरी पत्नी के मरने के  बाद  अपनी पत्नी से मिलकर मेरी सारी जमीन जायदाद पर  कब्जा कर लिया मेरे लिए इतने  बड़े घर में एक कोना भी नहीं था  जबकि वो मकान मेरे द्वारा  ही बनवाया गया था।  जब मेरे पास कुछ  नहीं बचा तब मेरे बहूबेटे ने मुझे घर से निकाल दिया था वो मुझे रेल में बिठाकर चला गया था फिर वो कभी नहीं आया  उसने मेरा हरिद्वार तक का टिकिट कटाया था पाँच साल पहले जब तुमसे भैंट हुई  तब मैं तीन दिन का  भूखा था। तुम मुझे देख के समझ गए  कि मेरी हालत ऐसी क्यों है ।तुम मुझे सीधे अपने घर ले,आए।  राजमल बोले मेरी कहानी कुछ यूँ है  मैने अपने बेटे को बड़े लाड़ से पाला पोसा  एम बी ए कराया । और वो मुझे  बुढ़ापे में अकेला  दुबई   अपनी पत्नी के साथ चला गया  वहाँ उसकी नौकरी  लग गई।  वहीं उसने शाँता  से शादी कर ली   और हमेशा  के लिए। परदेश में  बस गय। तबसे मैं इस घर मैं अकेला ही  रहा हूँ।  मुझे साठ हजार रुपये  महीने पैं पैंशन मिलती है। 
सरकारी नौकरी का यह एक  बड़ा लाभ सामने  आया। 
हरीश बोला सही कह रहे हो  मैंने करोड़ो  र
.पये कमाये काम नहीं आय और तुम्हारे पैन्सन के रुपये आज बड़े काम आ रहे हैं राजमल बात तो सही है।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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