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कहानी: दामाद

हरिमोहन जैसे दामाद के कारण आज ससुराल वाले सभी सुख से रह रहे थे वहीं हरिमोहन की पत्नी रजनी भी इस बात पर अपने पति पर गर्व करती थी हरिमोहन के सहयोग से जो दस एकड़ जमीनी खरीदी गई थी उसने ससुराल की काया पलट दी थी।
हरिमोहन की शादी रजनी से पन्द्रह साल पहले हुई थी तब रजनी के दादा राम किशन जीवित थे उनके पास चालीस एकड़ जमीन थी जिससे वे रतनपुर गाँव के संपन्न किसान समझे जाते थे हरिमोहन महुआ खेड़ी गाँव के रहने वाले थे उनकी गाँव में छोटी सी दुकान थी और उनके पिता के पास चार एकड़ जमीन थी हरिमोहन का एक छोटा भाई भी था जिसका नाम जगमोहन था। हरिमोहन के साले का नाम रामकिशोर था। तथा ससुर का नाम रूप नारायण था रूपनारायण एक गैर जिम्मेदार इंसान थे ज्यादतर समय वे दोस्तों में बिता देते थे और अनाप शनाप पैसा खर्च करते थे घर की जिम्मेदारियों का उन्हें कोई अहसास नहीं था हरिमोहन की शादी के एक साल बाद ही रजनी के दादाजी रामकिशन जी का हार्ट उटेक के कारण निधन हो गया था। तब हरिमोहन के साले की उम्र मात्र ग्यारह वर्ष की ही थी। रामकिशन के मरते ही रूपनारायण निरंकुश हो गए थे अब वे पूरी चालीस एकड़ जमीन के मालिक थे। पिता के निधन के बाद भी उनके रवैये में परिवर्तन नहीं आया था रजनी की माँ सरला का उन पर वश नहीं चलता  था अब उनकी मनमानियों पर अंकुश लगाने वाला कोई नहीं था। पिता के निधन के चार साल के भीतर रूपनारायण ने सारी जमीन जायदाद ठिकाने लगा दी थी दिन रात शराब के नशे में डूबे रहने के कारण रूपनारायण का लिवर खराब हो गया था और सब कुछ मिटाकर वे इस दुनिया से चल बसे थे। सरला के ऊपर घर चलाने की जिम्मेदारी थी और घर में ऐसा कुछ नहीं बचा था जिसे बेचकर वो अपनी गुजर बसर कर सकें। रामकिशोर की उम्र अभी सत्रह वर्ष की थी और इस साल वो बारहवीं कक्षा में आया था। एक तरफ जब रूपनारायण का परिवार बर्बादी की ओर जा रहा था वहीं दूसरी ओर हरिमोहन के ऊपर लक्ष्मी जी की कृपा बरस रही थी हाईवे पर उन्होंने जो रेस्टोरेन्ट खोला था वो चल निकला था उससे उन्हें खूब आमदानी हो रही थी इसके अलावा प्राॅपर्टी डीलिंग में भी वे खूब रुपया कमा रहे थे रूपनारायण का परिवार जहाँ हवेली से झोपड़ी में आ गया था वहीं हरिमोहन का मकान गाँव का सबसे आलीशान मकान बन गया था। रजनी अपने मायके वालों  की दुर्दशा देखकर दुखी रहती थी हरिमोहन ऐसे वक्त पर उनकी भरपूर मदद कर रहे थे रामिशोर की सारी पढ़ाई का खर्च वे ही उठा रहे थे इसके अलावा अन्य कई तरीकों से भी वे परिवार की मदद कर रहे थे। इस तरह पाँच वर्ष बीत गए थे रामकिशोर ने कृषि विज्ञान में बी एस सी कर ली थी वो नौकरी न करते हुए खेती करना चाहता था एक बार जब जगमोहन रजनी के साथ ससुराल आए तब  रामकिशोर ने अपने मन की बात उनसे कही इस पर जगमोहन बोले कि ठीक है इसमें मैं क्या मदद कर सकता हूं। तब रामकिशोर ने कहा राना साहू शहर में रहने लगे हैं उनकी दस एकड़ जमीन बिकाऊ है। जो वे बीस लाख रुपये में देने को तैयार हैं। यदि आप रुपयों की व्यवस्था कर दें तो वो जमीन खरीदी जा सकती है सुनकर जगमोहन बोले रुपयों की चिंता मत करो जमीन का सौदा कर लो। जगमोहन जी ने चार साल पहले पाँच हजार वर्गफीट का जो आवासीय भूखंड शहर में खरीदा था वो खरीदने के लिए बहुत से लोग उत्सुक थे वो भूखंड जगमोहन जी ने पच्चीस लाख रुपये में बेच दिया था  जमीन रजिस्ट्री खर्च जोड़कर तेइस लाख की पड़ी थी जब यह बात चली की जमीन की रजिस्ट्री किसके नाम हो तब जगमोहन ने हिचक के बोला जमीन की रजिस्ट्री रामकिशोर के नाम से कराई जाएगी मैं अच्छी तरह जानता हूं कि तुम एक होनहार तथा काबिल इंसान हो ये पच्चीस लाख रुपये में तुम्हें बिना ब्याज के आठ साल के लिए दे रहा हूँ मुझे पूरा भरोसा है तुम ये कर्ज इसके पहले ही चुका दोगे। रामकिशोर दोनों हाथ जोड़कर बोला जीजाजी आपने मेरी जिंदगी सँवार दी मैं आपका अहसान उम्र भर नहीं भूलूँगा। वे बोले अपनों पर कोई अहसान थोड़ी किए जाते हैं अपनों की तो मदद की जाती है जो मैंने की। रामकिशोर ने बचे हुए दो लाख रुपयों से नलकूप खनन कराया उसमें भरपूर मात्रा में पानी निकला था। रामकिशोर ने खेतों में दिन रात अथक परिश्रम कर  अच्छी फसल का उत्पादन किया था। रामकिशोर ने चार वर्ष के भीतर ही सारा कर्ज उतार दिया था अब वो जमीन  पूरी तरह रामकिशोर की हो चुकी थी। उनका पूरा परिवार खुशहाल था इस दीपावली पर रामकिशोर ने कार खरीदी थी मकान वो पहले ही पक्का बनवा चुका था। सरला का मजदूरी पर जाना अब पूरी तरह बंद हो गया था।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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