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कहानी: कलह या नर्क

रोहित को पैंतीस साल के वैवाहिक जीवन के बाद घर छोड़ने का निर्णय लेना पड़ा था जिसका सबसे बड़ा कारण उनकी पतनी  चपला थी वह कलह प्रिय थी जबकि रोहित धीर गँभीर और शाँत प्रवृत्ति के इंसान थे यही कारण था कि उन्होंने पूरे पैंतीस वर्ष तक अपनी कलहप्रिय पत्नी के साथ रहकर नर्क से भी बदतर जिंदगी गुजारी थी। पिछले पाँच सालों से वे हरिद्वार में रह रहे थे पूजन सामग्री की बिक्री से वे अपना खर्च चला रहे थे अकेले रहकर वो अपने आपको ज्यादा खुश मानते थे।
पैंतीस वर्ष पूर्व जब उनकी चपला से शादी  हुई थी तो वह उसकी सुंदरता देखकर आकर्षित हो गए थे तब उन्हें इसका अहसास नहीं था कि इस सुंदरता के पीछे एक क्रूरता छिपी हुई है चपला एक ईर्षालु महिला थी उसे अपनी थाली के रसगुल्ला देखकर खुशी नहीं होती थी  बल्कि  दूसरे की थाली के बैंगन देखकर  जलन होती थी । और इसकी कसर वो रोहित से निकालती थी पैंतीस सालों में ऐसा कोई दिन नहीं गुजरा था जिसमें चपला ने उससे कलह न की हो रोहित जब शाम को घर की ओर आते तो काँप जाते थे घर उनके लिए सुकून की जगह नहीं थी बल्कि ये वो जगह थी जहाँ वे हर दम झुलसते रहते थे। इसी बीच उनके एक पुत्र तथा दो बेटी भी हो गई रोहित यही सोचते रहे कि बच्चों के होने से चपला के स्वभाव में परिवर्तन आ जाएगा पर ऐसा हुआ नहीं बच्चे बढे हो गए अपने पैरों पर खड़े भी हो गए। इधर रोहित को बुढ़ापे ने घेर लिया था एक दिन चपला ने रोहित जी से खूब झगड़ा किया रोहित ने शाँत रहकर स्थिति सँभालने की कोशिश की पर चपला ताने देकर तथा पुरानी बातें उखाड़कर उन्हें प्रताड़ित करती रही आखिर उसने कह ही दिया कि तुम्हारी हमारी अब निभेगी नहीं बेहतर यही रहेगा कि तुम हमें छोड़कर यहाँ से चले जाओ रोहित  चपला की बात सुनकर हक्के बक्के रह गए वे बुढ़ापे में कदम रख चुके थे उम्र के इस पढ़ाव पर उन्हें अपनी पत्नी और बच्चों की बेहद जरूरत थी और चपला उन्हें घर छोड़कर जाने का कह रही थी  आखिर एक दिन वे घर छोड़कर चल दिए। वे एक पत्र  लिखकर रख गए थे मैं जा रहा हूँ अब तुम सब खुश रहना  बच्चे तुम्हारा ख्याल रखेंगे अब मैं कभी नहीं आऊँगा वैसे भी अब मेरी किसी को जरूरत है नहीं मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि कोई मुझे ढूँढ़ने का प्रयास नहीं करेगा मकान जमीन जायदाद सब तुम्हारे नाम है रुपया पैसा रकम जेवर सब तुम्हारे पास है  जाते समय एक फूटी कौड़ी भी मेरे पास नहीं है  भगवान भरोसे जा रहा हूँ। पत्र रखकर  रोहित रेल्वे स्टेशन पर आ गए यहाँ उन्हें उनके बचपन के दोस्त जानकी प्रसाद मिल गए बातचीत का दौर चला ट्रेन आने में अभी समय था बातों ही बातों में  रोहित जी न् कहा कि मैं भी हरिद्वार जा रहा हूँ और मेरे पास फूटी कौड़ी भी नहीं है जानकी प्रसाद जी  एक पल में बहुत कुछ समझ गए उन्होंने  उनको बिल्कुल नहीं कुरेदा और हरिद्वार का टिकट लाकर उन्हें दे दिया फिर टिकट चैकर से बात कर तथा निर्धारित पैसे देकर अपने साथ स्लीपर कोच में रोहित जी को भी बर्थ दिलवा दी ट्रेन सुब्ह हरिद्वार पहुँची  जानकी प्रसाद जी दो दिन हरिद्वार रुके  उन्होंने रोहित जी को किराये का मकान दिलवाया खाने पीने की व्यवस्था की तथा चलते समय दो हजार रुपये उन्हें दे दिए रोहित जी भरे गले से बोले तुम अच्छी तरह जानते हो कि मैंने आज तक किसी का कर्ज नहीं खाया है तुम्हारी इस मदद को मैं कभी नहीं भूलूँगा और जब तक तुम्हारी पाई पाई नहीं चुका दूँगा तब तक मरने वाला भी नहीं हूँ जानकी प्रसाद जी ने उनके कंधे थपथपाए और उनसे विदा लेकर चल दिए रोहित ने जानकी प्रसाद जी के द्वारा दिए गए रुपयों से फूल और पूजन सामग्री खरीदी तथा कपड़ा बिछा कर छोटी सी दुकान लगा ली। दिन भर में उनको इतना लाभ हो गया  जिससे उनका गुजारा आराम से चलने लगा थोड़े बहुत पैसों की भी बचत हो गई जानकी प्रसाद जी का कर्ज उन्होंने छः महीने में ही चुकता कर दिया था।  अब वे आराम से रह रहे थे अधिकाँश समय वे भक्ति भाव में बिताते थे दुकान वे अपने गुजारे के लिए लगाते थे क्योंकि भीख माँगना उन्हें पसंद नहीं था। रोहित के घर छोड़कर जाने से किसी को कोई फर्क नहीं पढ़ा था सभी ने उनका पत्र पढ़कर किसी कोने भें रख दिया था। इन पाँच सालों में शायद ही किसी ने उनकी याद की हो ।  यही तो  दुनियादारी है जिसमें इंसान अपने आपको मिटा देता  है और उसके पल्ले कुछ भी नहीं पड़ता।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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