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कहानी: मुफ़लिसी

आज भी राकेश को कोई काम नहीं मिला था वो बड़ी मिन्नत कर के चक्की वाले से आटा उधार लेकर आया था बच्चे सुब्ह से भूखे थे और उसका इंतजार कर रहे थे जब उन्होंने राकेश का हाथ में आटे की थैली देखी तो उन्हें बड़ी खुशी हुई चलो कम से कम आज तो भरपेट खाना मिल जाएगा राकेश की ,पत्नी शा॔ता कहीं से भाजी तोड़ लाई थी वो भाजी उसने चूल्हे पर कड़ाई रखकर उस पर बनने रख दी फिर आटा गूँथा सबने रात के दस बजे तक खाना खाया आज तो गनीमक रही की खाना जल्दी मिल गया कल तो बच्चे भूखे ही सो गए थे कल राकेश साढ़े ग्यारह बजे रात को तो आटा लेकर आया था खाना बनाते खाते रात को एक बज गई थी शांता ने बच्चों को नींद से जगाकर खाना खिलाया था। 
परसों राकेश को आटा नहीं मिल सका था उस दिन बच्चे और वह तथा शाँता भूखे ही सो गए थे दोनों बच्चों ने तो दोपहर में स्कूल में मध्यान्ह भोजन कर लिया था पर उस दिन शा॔ता और राकेश को एक निवाला तक हासिल नहीं हुआ था। दरअसल जो आटा चक्की का मालिक रमेश साहू था वो कहीं रिश्तेदारी में चला गया था। चक्की पर उसका भतीजा रोहित था राकेश ने उससे आटा उधार माँगा तो उसने पुरानी उधारी का हवाला देते हुए आटा देने से मना कर दिया वह चक्की के बंद होने तक इस आशा में बैठा रहा कि शायद रोहित को उस पर तरस आ जाए और वो उसे कुछ नहीं तो थोड़ा सा ही आटा उधार दे दे पर रोहित को जरा भी तरस नहीं आया उसके अगले दिन भर पानी बरसता रहा जिससे राकेश मजदूरी की तलाश में नहीं जा सका शाम को फिर वो आटा उधार मिलने की आशा में चक्की की दुकान पर पहुँच गया आज भी रोहित चक्की चला रहा था उसने राकेश से कहा पैसे लाए हो राकेश के मना करने पर उसने कहा कोई यहाँ खैरात बँट रही है ।जो लेने आ गए ।बिना पैसे दिए आटा नहीं मिलेगा राकेश फिर भी उम्मीद लिए दुकान के बाहर बैठा रहा वो सोच रहा था आज तो रविवार है आज बच्चे स्कूल भी नहीं गए आज तो बच्चों को मध्यान्ह भोजन भी नहीं मिला वो बैबसी से रोहित की तरफ देख रहा था पर रोहित का दिल फिर भी नहीं पसीज रहा था तभी चक्की बंद होने के कुछ देर पहले चक्की का मालिक रमेश साहू आ गया उसे देखकर राकेश को बड़ी राहत मिली। रमेश साहू ने राकेश को चुपचाप आटा तौल कर दे दिया तथा उसके खाते में उधारी की एन्ट्री कर दी। राचेश के जाने के बाद रोहित ने कहा ये क्या चाचाजी आपने ये भी नहीं देखा कि उसने कई महीनों से उधारी नहीं चुकाई है फिर उसे आटा उधार दे दिया पर रमेश बोला तुझे नहीं मालूम बच्चे वो तीन महीने बीमार रहा बब अस्पताल से छुट्टी हुई तो डॉक्टर ने उसे भारी काम करने से मना कर दिया था हल्के काम मिल नहीं रहे मैं यह सोचकर इसे आटा दे देता हूँ कम से कम आज यह और इसका परैवार रात को सूखा तॅ नहीं सोएगा। राचेश को चार महोने पहले असहनीय पेट दर्द हुआ था पत्नी उसे सरकारी अस्पताल में ले गई वहाँ डॉक्टरों राकेश को भर्ती कर लिया दो हजार रुपये की दवाएँ पर्चे पर लिख दीं और कहा कि मेडीकल स्टोर से ले आओ शाँता ने मेडीकर स्टोर वाले से उधार में दवा देने का आग्रह किया पर मेडिकल के मालिक ने उधार देने से मना कर दिया तभी दुकान की एक ग्राहक कमला उसे नुक्कड़ के मेडिकल स्टोर पर ले गई वहाँ राकेश मुफ्त में सारी दवाएँ मिल गईं। उस दुकान को कुछ दानदाता दान में रुपये देते थे गरीबों को मुफ्त दवाएँ प्रदान करने के लिए । उसी पैसे से शाँता को ये दवाएँ मिल सकीं थीं इसके बाद शाँता ने सारी दवाएँ उस मेडिकल दुकान से मुफ्त में लीं राकेश की बीमार पूरे तीन माह में ठीक हुई थी। अभी भी उसे कमजोरी थी शाँता चक्की से आटा उधार लाचर बच्चों का पेट भरती रही थी। एक माह ये और आटा उधार लेते लेते गुजर रहा था। आज का दिन भी उधार के आटे के सहारे ही बीता था।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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